राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 354, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंको शिकस्त खाकर भागा¹। इस लड़ाई में बागियों के बहुत से आदमी पकड़े तथा मारे गये और उनके हाथी, घोड़े आदि छीन लिये गये। तांतिया टोपी मंदसोर होता हुआ जीरापुर पहुंचा। वहां कर्नल बेंसन से उसकी पराजय हुई; किंतु इसी अवसर पर दो हज़ार आदमियों के साथ बागी फ़ीरोज़शाह उससे जा मिला, जिससे वह माघ सुदि १५ (ई० स० १८५६ ता० १७ फ़रवरी) को फिर मेवाड़ होता हुआ कांकरोली चला गया; पर ब्रिगेडियर सॉमरसेट तथा कप्तान शॉवर्स के पहुंच जाने से उसके वहां पैर न टिके और पहाड़ों में होता हुआ वह पुनः बांसवाड़े के क़रीब जा पहुंचा। ब्रिगेडियर सॉमरसेट उसका पीछा करता हुआ वहां भी गया और उसने बागियों को रास्ते में ही जा दबाया। बागियों के कई सरदार फ़ीरोज़शाह, अबुलशतरखां, पीर हज़ूरअली आदि ने आत्मसमर्पण किया। तांतिया टोपी पेरोन के जंगल में जा छिपा। ता० ७ अप्रेल (वि० सं० १९१६ चैत्र वदि ४) को वहां पकड़ा जाकर वह सिप्री लाया गया, जहां उसे फांसी दी गई²। उपर्युक्त सिपाही-विद्रोह का प्रभाव भारत में लगभग दो वर्ष के ऊपर बना रहा। अंग्रेज़ अधिकारियों की कार्यतत्परता और स्फूर्ति तथा भारत के नरेशों के सहयोग से उसका दमन शीघ्र हो गया। ग़दर के अंतिम दिनों में भारत का शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से स्वर्गीय महाराणी विक्टोरिया ने अपने हाथ में लेकर भारत के तत्कालीन गवर्नर जेनरल को शासन-कार्य के लिए अपना वाइसरॉय (प्रतिनिधि) बनाया। भारतीय नरेशों और प्रजा वर्ग में संतोष की वृद्धि के लिए महाराणी की ओर से ई० स० १८५८ ता० १ नवम्बर (वि० सं० १९१५ कार्तिक बदि ११) को शाही घोषणापत्र जारी किया गया, जिसमें भारतीय नरेशों की मान मर्यादा बनी रहने, उनके स्वत्वों एवं धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का
(१) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑफ़ इंडियन म्यूटिनी; पृ० १४०-१। ज्वालासहाय; दि लॉयल राजपूताना; पृ० २४२-३। (२) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑफ़ इंडियन म्यूटिनी; पृ० १४३- ४६। ज्वालासहाय; दि लॉयल राजपूताना; पृ० २५२-३।