राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तथा उसके सहायक तांतिया टोपी ने विद्रोहियों का नेतृत्व कर ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ई० स० १८५८ के जुलाई (वि० सं० १६१५ आषाढ) मास में सर ह्यूरोज़ ने उनको वहां से निकाल दिया। तब वे पांच हज़ार बागियों के साथ मेवाड़ के पूर्वी भाग में जालिंधरी के घाटे के मार्ग से मांडलगढ़, रतनगढ़ तथा सींगोली होते हुए रामपुरे की ओर रवाना हुए; किंतु ब्रिगेडियर पार्क तथा मेजर टेलर ने उस ओर का रास्ता रोक लिया, तब वे वरल्योवास होते हुए भीलवाड़ा पहुंचे। ता० ६ अगस्त (श्रावण वदि ३०) को सांगानेर के पास कोटेश्वरी नदी के किनारे जेनरल रॉबर्ट्स की सरकारी सेना से उनका मुक़ाबला हुआ, जिसमें वे हारकर भागे और मेवाड़ के पश्चिम की तरफ़ चल दिये। अंग्रेज़ी सेना ने उनका पीछा किया और नाथद्वारा के पास कोठारिया के समीप ता० १४ अगस्त (श्रावण सुदि ६) को बागियों का सरकारी सेना से मुक़ाबला हुआ, जिसमें वे हारकर वहां से भी भागे। अनन्तर आकोला के मार्ग से चित्तोड़ से दक्षिण की तरफ़ होकर जाट और सींगोली को लूटते हुए वे झालावाड़ पहुंचे। वहां भी ब्रिगेडियर पार्क ने उनका पीछा न छोड़ा। तब वे छोटा उदयपुर पहुंचे, जहां उक्त ब्रिगेडियर ने उनको परास्त किया। राव- साहब, देवगढ़ बारिया से पृथक् हो गया था, परंतु तांतिया टोपी कुशलगढ़ के रास्ते से बांसवाड़ा पहुंचा। इधर से कप्तान लियरमाउथ फ़ौज समेत वहां जा पहुंचा, जिससे तांतिया टोपी वहां से भागकर सलूंबर होता हुआ, भींडर की तरफ़ बढ़ा। उसका इरादा उदयपुर जाने का था, किंतु उधर का मार्ग रुका हुआ होने तथा सरकारी सेना-द्वारा नाकेबंदी हो जाने से वह पहाड़ी मार्ग-द्वारा प्रतापगढ़ की तरफ़ बढ़ा। उस समय तीन-चार हज़ार भील भी तांतिया के शामिल हो गये थे। प्रतापगढ़ के महारावत-द्वारा बाग़ी- दल के मुखिया क़ासिमअली आदि के मारे जाने से तांतिया टोपी प्रतापगढ़ के क़स्बे को, जो संपन्न था, लूटना चाहता था; परंतु ठीक समय पर सरकारी सेना के साथ मेजर रॉक वहां पहुंच गया, जिससे बागी दल प्रतापगढ़ को न लूट सका और वहां से वह पौष वदि ३ (ई० स० १८५८ ता० २३ दिसंबर)