राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ -प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इसके थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६२२ पौष वदि १४ (ई० स० १८६५ ता० १७ दिसंबर) को राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल कर्नल एजेंट गवर्नर-जेनरल का गद्दी- ईडन ने मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल निक्सन नशीनी की ख़िलअत लेकर के साथ प्रतापगढ़ जाकर अंग्रेज़ सरकार की ओर जाना से महारावत को गद्दीनशीनी की खिलअत दी और उसी अवसर पर सरकारी तौर से राज्या- धिकार सौंपने की रस्म भी अदा की गई१ । महारावत ने राज्यासीन होते ही शासन-कार्य लगन के साथ करना आरंभ किया। सर्वप्रथम उसने भील, मीणों आदि का दमन करने का निश्चय किया, जो लूट-खसोट कर जनता को कष्ट भील और मीणों को दंड पहुंचाते थे२ । महारावत जहां कहीं अपने राज्य में देना लूट-खसोट का समाचार सुनता, तत्काल घोड़े पर सवार होकर अपने राजपूत सवारों से पहले वहां जा पहुंचता३ और उनसे मुक़ाबला कर उनको ऐसा दंड देता कि वे फिर कभी ऐसा कार्य करने का साहस न करते। उसकी इस तत्परता को देख प्रतापगढ़ राज्य के भील, मीणे आदि उसके नाम से कांपने लगे और अधिकांश ने लूट-खसोट करना बन्द कर दिया, जिससे राज्य में चारों तरफ़ शांति स्थापित हो गई और राज्य की आबादी तथा आय बढ़ने लगी। व्यापार एवं गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने मालवा की ओर रेल्वे लाइन निकालने का विचार किया और उस समय प्रतापगढ़ राज्य की कोई भूमि यदि रेल्वे निकालने के संबंध में रेल्वे के लिए आवश्यक हो तो देने के लिए महा- अंग्रेज़ सरकार की महारावत रावत से प्रस्ताव किया। इसपर वि० सं० १६२२ से बातचीत (ई० स० १८६५) में महारावत ने कुछ शर्तों के (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २५६ । (२) वही; जि० १, पृ० ५६० । (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६६-७ ।