राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत दलपतसिंह २८६ फिर उसने दो हज़ार आदमियों के साथ जाकर ता० ७ सितंबर (आश्विन वदि ४) को मंदसोर पर आक्रमण किया, जिसमें वहां का सूबेदार मारा गया और वहां उसका अधिकार हो गया। फिर निम्बाहेड़ा (वर्त्तमान टोंक राज्य का क़स्बा) का मुसलमान हाकिम नीमच ज़िले के जीरण गांव पर मंदसोर के बाग़ियों को चढ़ा लाया । जब यह ख़बर नीमच पहुंची, तब बाग़ियों का सामना करने के लिए ता० २३ अक्टोवर (कार्तिक सुदि ५) को कप्तान लॉयड, कप्तान सिम्पसन आदि ११ अफ़सरों, चारसौ सिपाहियों और दो तोपों के साथ जीरण पहुंचे, परंतु वहां अंग्रेज़ी सेना की हार हुई । फिर बाग़ी- दल जीरण लूटकर मंदसोर चला गया । ता० ८ नवम्बर (मार्गशीर्ष वदि ७) को उनका नीमच पर आक्रमण हुआ। वहां अंग्रेज़ी सेना से लड़ाई होने पर अंग्रेज़ सैनिक क़िले में चले गये। कप्तान शॉवर्स ने उदयपुर की सेना के साथ बाग़ियों का मुक़ाबला किया, किन्तु सायंकाल हो जाने से लड़ाई बंद हो गई और कप्तान शॉवर्स उदयपुर की सेना के साथ दारू गांव (वर्त्तमान ग्वालियर राज्य) में होता हुआ केसूंदा गांव (मेवाड़ राज्य) में चला गया। दूसरे दिवस बाग़ियों ने छावनी को लूटकर जला दिया। इसके उपरान्त जावद, रतनगढ़, सींगोली आदि नीमच के समीपवर्ती गांवों और क़स्बों में भी विद्रोह हो गया। ज्योंही यह समाचार कप्तान शॉवर्स को मिला, वह तत्काल लेफ्टिनेंट फ़र्क़हर्सन को लेकर वहां से चला और बगाणा तथा निक्सनगंज में बाग़ियों के ठहरने की ख़बर पाकर वहां पहुंचा। फिर बाग़ियों से उसकी लड़ाई हुई, जिसमें बहुत से विद्रोही मारे गये और शेष तितर-बितर हो गये । इस घटना के अनन्तर मालवे की ओर से मध्य भारत का एजेंट गवर्नर-जनरल कर्नल ड्यूरेंड महू के सिपाहियों को साथ लेकर मंदसोर पहुंचा। वहां विद्रोहियों से उसका मुक़ाबला हुआ, जिसमें फ़ीरोज़ तो हारकर भाग गया, पर उसके बहुत से साथी और सिपाही पकड़े गये । मंदसोर से वह (ड्यूरेंड) नीमच गया। उसके पहुंचते ही वहां से भी बागी भाग गये¹। नवम्बर ई० स० १८५७ (मार्गशीर्ष वि० सं० १९१४) में (१) सी० एल० शॉवर्स; ए मिसिंग चैप्टर ऑव् इंडियन म्युटिनी; पृ० ११६-२०। ३७