राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत दलपतसिंह २६५ की लिखित वाइसरॉय लॉर्ड कैनिङ्ग के हस्ताक्षर-सहित यह सनद् पहुंची, जो नीचे लिखे अनुसार है— “श्रीमती महाराणी विक्टोरिया की यह इच्छा है कि भारत के राजाओं तथा सरदारों का अपने-अपने राज्यों पर अधिकार तथा उनके वंश की जो प्रतिष्ठा एवं मान-मर्यादा है, वह हमेशा बनी रहे; इसलिए उक्त इच्छा की पूर्ति के लिए मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि वास्तविक उत्तरा- धिकारी के अभाव में यदि आप या आपके राज्य के भावी शासक हिंदू धर्मशास्त्र और अपनी वंश-प्रथा के अनुसार दत्तक लेंगे तो वह जायज़ समझा जायगा । “आप यह निश्चय जानें कि जब तक आपका घराना सरकार का खैरख्वाह रहेगा और उन अहदनामों, सनदों तथा इक़रारनामों का पालन करता रहेगा, जिनमें अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसके कर्त्तव्य दर्ज हैं, तब तक आपके साथ के इस इक़रार में कोई बात बाधक न होगी” । ˙ महारावत दलपतसिंह का वि० सं० १६२० चैत्र वदि ७ ( ई० स० १८६४ ता० ३० मार्च ) को परलोकवास हुआ । उसके चार राणियां थीं [पार्श्व टिप्पणी: महारावत का परलोकवास और राणियां आदि] जिनके नाम प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में नामली ( रतलाम राज्य ) के सोनिगरा ठाकुर फ़तहसिंह की कुंवरी दौलतकुंवरी, कुशलगढ़ (बांस- वाड़ा राज्य ) के राठोड़ राव ज़ालिमसिंह की पुत्री मोतीकुंवरी एवं उसी ज़ालिमसिंह की पौत्री और हम्मीरसिंह की पुत्री केसरकुंवरी तथा वांसणा ( गुजरात ) ठिकाने के केरणा गांव के राठोड़ ठाकुर दौलतसिंह की पुत्री कल्याणकुंवरी दिये हैं²। उसके केवल एक ही पुत्र महाराजकुमार ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२ तथा पृ० ३५ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक ख्यात में उक्त महारावत के चार ही राणियां लिखी हैं; परन्तु उनके नामों में अन्तर है । वहां उसकी दूसरी राणी कुशलगढ़वाली का नाम केसरकुंवरी और उसका राव