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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

२६६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उदयसिंह था, जिसका जन्म कुशलगढ़वाली राणी के उदर से हुआ था¹ । महारावत दलपतसिंह, प्रतापगढ़ राज्य में नीतिकुशल राजा हुआ है। उसमें राज्य प्रबंध की अच्छी योग्यता थी, अतएव उसने डूंगर- पुर और प्रतापगढ़ राज्य का प्रबंध कुशलतापूर्वक महारावत का व्यक्तित्व | किया । वह मित्रता का निबाहनेवाला राजा था। सिपाही-विद्रोह में स्वयं उसने अपनी सेना के साथ भाग लिया था। वह गुणवानों का सम्मान कर उन्हें पुरस्कृत करता और अपने कार्यकर्त्ता मंत्रियों आदि को पुरस्कार, जागीर आदि देकर सदा उत्साहित करता था। उसकी अपनी प्रजा के साथ गहरी सहानुभूति थी । उसके समय में राज्य-कोप परिपूर्ण था। प्रतापगढ़ राज्य में जो वैभव है, उसका अधिकांश श्रेय उसी को है। उसने देवलिया में सोनेलाव तालाव बनवाकर दलपत- निवास नामक महल बनवाया था। उसकी प्रतिष्ठा के अवसर पर उसने बारहठ चारण लखमणदान को दो गांव और हाथी तथा महाराजकुमार उदयसिंह के जन्म के अवसर पर पांच हाथी, दो सौ घोड़े और पांचसौ सिरोपाव दिये थे एवं उसी अवसर पर उसने लाख पसाव में उपर्युक्त लखमणदान को एक गांव, हाथी, घोड़ा, वस्त्राभूषण और दस सहस्र रुपये देकर उसको अपना कविराज बनाया था। सरदारों आदि के साथ उसका व्यवहार सदा अच्छा रहा। उसके मन्त्री शाह जड़ावचन्द, शाह निहालचंद (खासगीवाला), जोधकरण पाडलिया आदि कार्यनिपुण व्यक्ति थे, जिससे उक्त महारावत के समय प्रजा की आबादी बढ़ी और राज्यश्री में भी वृद्धि हुई। नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को डूंगरपुर के हमीरसिंह की पुत्री होना दिया है तथा उसी के उदर से कुंवर उदयसिंह का जन्म होना बतलाया है। इसी प्रकार तीसरी राणी कठाणा के पंवार बख़्तावरसिंह की पुत्री भवान- कुंवरी और चतुर्थ राणी भी कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह की पुत्री लालकुंवरी लिखी है। इन दोनों राणियों का तो बड़वे की ख्यात में कुछ भी उल्लेख नहीं है। एक स्थान पर उसके छः राणियें भी लिखी हैं और दो विवाह डूंगरपुर में रहते हुए होने का उल्लेख है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० १४।