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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 534 में से

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महारावत सामन्तसिंह २७७ बनवाया। उसकी राणी मेड़तणी दौलतकुंवरी ने देवलिया में युगलकिशोर का विष्णु मंदिर बनवाया। महारावत के समय के शिलालेख, दानपत्र आदि पर्याप्त संख्या में महारावत के समय के शिला- मिलते हैं, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उनमें से लेख और दानपत्र आदि कुछ ही महत्त्वपूर्ण हैं, जिनका सारांश नीचे दिया जाता है— ( १ ) वि० सं० १८३८ माघ सुदि ५ (ई० स० १७८२ ता० १८ जनवरी) शुक्रवार की देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें हूंबड़ जाति और पाडलिया गोत्र के गोविंद आदि का आदिनाथ का प्रासाद बनवाकर उसकी प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है। ( २ ) वि० सं० १८४६ आषाढ वदि १३ ( ई० स० १७६६ ता० १ जुलाई ) का प्रतापगढ़ के बाज़ार का शिलालेख, जिसमें प्रतापगढ़ के निवासियों से विना अपराध के दण्ड न लेने का उल्लेख है। ( ३ ) वि० सं० १८५६ माघ सुदि १३ (ई० स० १८०३ ता० ४ फ़रवरी) का ब्राह्मण वेणीराम के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें रघुनाथद्वारे की प्रतिष्ठा के अवसर पर गांव अमलावद में १० बीघा ज़मीन पुण्य करने का उल्लेख है। ( ४ ) वि० सं० १८७३ ज्येष्ठ सुदि ४ ( ई० स० १८१६ ता० ३० मई ) सोमवार का द्वारिका के लक्ष्मी, सत्यभामा और राधिका के मंदिरों के पुजारी बालकृष्ण, जयदेव और भंडारी जगन्नाथ के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत की द्वारिका की यात्रा के समय राणी चौहान पूरबणी का अपनी जागीर का चाचाखेड़ी गांव उक्त मंदिरों की भोग सामग्री के लिए भेंट करने और कुंवर दीपसिंह के कथन से उक्त ताम्रपत्र होने का उल्लेख है। ( ५ ) वि० सं० १८७४ द्वितीय श्रावण सुदि १५ ( ई० स० १८१७ ता० २६ अगस्त ) भौमवार का ताम्रपत्र; जिसमें ज्येष्ठ वदि ३० को सूर्य पर्व के समय अपने राज्य में ब्राह्मणों पर, जो "टंकी" की लागत लगती थी, उसके छोड़ने का संकल्प अमलावद के पंडित तारा के नाम होने का उल्लेख है¹। ( १ ) श्रीमन्महाराजाधिराज महारावतजी श्रीसामन्तसिंहजी वचनात्

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