राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इससे प्रकट है कि वि० सं० १८७४ (ई० स० १८१७.) में महारावत ने द्वारिका की यात्रा की थी और उक्त संवत् के ज्येष्ठ वदि ३० (ता० १६ मई) शुक्रवार को ब्राह्मणों को दी हुई ज़मीन आदि की आय पर टंकी नामक लागत, जो प्रति रुपया एक आना के हिसाब से लगती थी, शंखोद्धार तीर्थ पर छोड़ देने अर्थात् नहीं लेने का संकल्प किया। यह ताम्रपत्र महारावत के कुंवर दीपसिंह के आज्ञा देने पर मेहता वेचरलाल ने लिखा। (६) वि० सं० १८८२ (प्रथम) श्रावण सुदि १५ (ई० स० १८२५ ता० २६ जुलाई) शुक्रवार का भचूंडला, पिपरोड़ा का खेड़ा और माताखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उपर्युक्त तीनों गांव द्वारिका में सदाव्रत के लिए कृष्णार्पण करने का उल्लेख है। (७) वि० सं० १८४२ आषाढ सुदि २ (ई० स० १८३५ ता० २६ जून) चन्द्रवार का सेमलखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें राणी मेड़तणी के बनवाये हुए मंदिर को गांव सेमलखेड़ी भेंट करने का उल्लेख है। कांठलदेश ना समस्त ब्राह्मणां जोग्य अप्रंच श्रीद्वारिकानाथजी नी जात्रा कीदी जदी श्रीबेट शंखोद्धार में ज्येष्ठ विदि ३० अमावस्या रे दिन सूर्य पर्व मध्ये त्राम्वा पत्रिक सर्व ब्राह्मणा ने टंकी लागती हती ते गाम अमलावद नो पंडित तारा साथे हतो तेने हाते श्रीकृष्णार्पण करी दीधी आचन्द्रार्क यावत् उदक अघाट करी सारी लागत वलगट सहित निर्दोष करे दीधी तेनी हमारा वंसनो थई ने ब्राह्मणां थी चोलण करे नहीं चोलण करे जणी ने चित्तोड़ नो पाप छे । अत्र दान वाक्य भूमिं दत्वा भाविनो भूमिपालान् भूयो भूयो याचते रामचंद्रः । सामान्योऽयं दानधर्मो नृपाणां स्वे स्वे काले पालनीयो भवद्भिः ॥ १ ॥ स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् षष्टि वर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः । २ । हुकम श्री हजूर नो । दुवे महाराजकुंवरजी श्रीदीपसिंहजी लिखितं मेता वेचर- लाल संवत् १८७४ रा वर्षे मास द्वितीय श्रावण सुदि १५ भौमवासरे। मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से।