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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत सामन्तसिंह २७६ महारावत सामन्तसिंह वीर, उदार और बुद्धिमान राजा था। उसके समय में भी अन्य राज्यों की भांति मरहटों का उपद्रव रहा। कभी-कभी [महारावत का व्यक्तित्व] उसके अधीनस्थ राजपूत सरदार भी वहां पारस्प- रिक वैमनस्य के कारण सिर उठाकर बखेड़ा मचाते और भील, मीणे आदि भी अपना पेशा जारी कर देते थे, पर वह उनके बखेड़े को साम, दाम, दंड और भेद नीति का प्रयोग कर बढ़ने नहीं देता था। मरहटे सरदारों को भी वह कुछ दे-दिलाकर चुप करता था और वे भी उसकी सरलता के कारण उसका मान रखते थे। मरहटों के उपद्रव और भीतरी कलह से उसके समय देश ऊजड़ होकर आबादी कम हो गई, जिससे आय के साधन बन्द होकर समृद्धि घट गई, तो भी उसने अपनी स्वाभाविक उदारता में कमी न आने दी। राज्य-रक्षा के लिए पर्याप्त सैनिक शक्ति की आवश्यकता होती है, पर उस समय आर्थिक स्थिति ठीक न होने से महा- रावत अच्छी सेना नहीं रख सकता था तथापि जागीरदारी प्रथा का प्रचार रहने से उसके राज्य की रक्षा के योग्य वहां लड़ाकू राजपूत सेना का अभाव न था। महारावत की सहृदयता से उसके अधीनस्थ राजपूतों को उसपर पूरा विश्वास था और वे उक्त राज्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देते थे। वह अपने सरदारों, राजकर्मचारियों, भृत्यों आदि को समय-समय पर जागीर, इनाम आदि देकर सम्मानित करता रहता था, जिससे राज्य-व्यवस्था में कोई अन्तर नहीं होने पाया और न उसके राज्य की सीमा में कमी हुई, जब कि कई पुराने और प्रतिष्ठित राज्य नष्ट हो गये। ऐसे समय में उसकी दयालुता और उदारता ने ही उसकी कीर्ति को दूर-दूर तक फैलाया। तीर्थ-यात्रा का प्रेमी होने के कारण उसने द्वारिका की यात्रा के समय वहां अपनी राणी के द्वारा भोग सामग्री के लिए गांव भेंट कराया और वहां अपनी तरफ़ से नियमित रूप से पुण्य होते रहने के लिए सदाव्रत जारी रख तीन गांव दिये। उसके राज्य-काल में देवलिया के राज्य-महलों में सुधार हुआ और वहां कई देवालय भी बने। धार्मिक भावना से प्रेरित होकर उसने रघुनाथ द्वारे की प्रतिष्ठा के समय तुलादान भी