राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया। प्रजा से वह प्रेम रखता और उससे अन्यायोचित ढंग से द्रव्य लेना बुरा समझता था। इसलिए भविष्य में बिना किसी अपराध के दण्ड न लेने का पाषाण लेख खुदवाकर उसने प्रतापगढ़ में लगवाया। उसके समय में वि० सं० १८४० (ई० स० १८३३) में प्रतापगढ़ राज्य में अकाल पड़ा और दैवी प्रकोप से महामारी की व्याधि उत्पन्न होकर सहस्रों मनुष्य काल- कवलित हो गये। उस समय उसने प्रजा-पालकता का परिचय देकर वहां के निवासियों को धैर्य बंधाया। वह ईश्वर-भक्त, निरभिमानी और मितव्ययी होने के साथ ही शुद्ध हृदयवाला था। अपनी प्रजा, सामंतवर्ग तथा अन्य राज्यों के साथ उसका व्यवहार अच्छा रहा। दैवी विपत्तियों, मरहटों, सरदारों आदि के उपद्रवों के समय वह कभी विचलित नहीं होता और धैर्य- पूर्वक उनको निवारण करने की चेष्टा करता था। राज्य-वृद्धि की लालसा उसमें न थी। स्वात्माभिमान भी उसमें विद्यमान था, इससे उदयपुर के महा- राणाओं के अधीन सामन्तभाव से रहकर उसने धरियावद के परगने का उपभोग करना अपमानजनक समझ, उसे त्याग दिया। उसके एकमात्र कुंवर दीपसिंह ने कई पुरुषों को मार डाला। इस बात को सुनते ही उस- (महारावत) ने अंग्रेज़ अफ़सरों की राय से उस (दीपसिंह) को अधिकार- च्युत् कर देवलिया में रहने की आज्ञा दी, परन्तु कुंवर ने अपना आचरण नहीं सुधारा एवं प्रतापगढ़ में जाकर फिर उपद्रव करने लगा। तब उसने पुत्र-मोह त्यागकर अंग्रेज़ी सेना-द्वारा उसको दबाकर बंदी करवा दिया, जो उसकी न्याय-वृत्ति का द्योतक है। वह विनम्र, प्रसन्न-चित्त और मृदुभाषी होने के साथ ही शांति-प्रिय शासक था। अंग्रेज़ अफ़सर भी उसका पूरा सम्मान करते थे। उस (सामंतसिंह) का शरीर पतला, क़द लंबा, वर्ण गौर और मुंह गोल था।