राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें. महारावत सामन्तसिंह २७५ जिसको महारावल दबा नहीं सका, इसलिए महारावल से अंग्रेज़ सरकार ने शासन-कार्य अपने हाथ में ले लिया । फिर कुछ वर्षों बाद दलपतसिंह की योग्यता का अनुभव कर सब अधिकार उसको सौंप दिये गये । दलपतसिंह ने शासनाधिकार पाकर पट्टे परवानों पर पहले तो महारावल के नाम के साथ अपना नाम लिखना आरम्भ किया, फिर वह केवल अपना ही नाम लिखने लगा। इससे भी दोनों में द्वेष की वृद्धि हुई और यह वैमनस्य यहां तक बढ़ा कि महारावल डूंगरपुर छोड़कर गढ़ी ठिकाने में जा बैठा । ऐसे में प्रतापगढ़ राज्य के स्वत्वाधिकारी केसरीसिंह का, जो दलपतसिंह का ज्येष्ठ भ्राता था, देहांत हो गया । उस समय महारावत सामंतसिंह ने दलपतसिंह को प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी बनाने का विचार- कर उस (दलपतसिंह) को वहां बुलवा लिया और देवलिया में रहते हुए वह डूंगरपुर का शासन-कार्य भी करता रहा । फिर अंग्रेज़ सरकार ने भी महारावत की इच्छा स्वीकार कर दलपतसिंह को प्रतापगढ़ राज्य का भावी महारावत मान लिया । वि० सं० १६०० पौष सुदि १५ (ई० स० १८४४ ता० ५ जनवरी) को महारावत का देहांत महारावत सामन्तसिंह का ७० वर्ष राज्य करने के पश्चात् ७६ वर्ष की आयु में परलोकवास हो गया । महारावत सामन्तसिंह के आठ विवाह हुए थे, जिनसे उसके पद्मसिंह, दीपसिंह और सरदारसिंह नामक तीन कुंवर और प्राणकुंवरी, अजबकुंवरी, रानियां और संतति आदि चिमनकुंवरी, चंदनकुंवरी, तख्तकुंवरी एवं रत्न- कुंवरी नामक छः पुत्रियां हुईं १ । महारावत का एक विवाह किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी से हुआ था२, जिसके उदर से एक कुंवर और प्राणकुंवरी नामक कुंवरी हुई । प्राणकुंवरी का विवाह ईडर के स्वामी गंभीरसिंह के ज्येष्ठ कुंवर उम्मेदसिंह ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ६-१० । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १३-४ । ( २ ) बांकीदास; ऐतिहासिक बातें; संख्या १३१३ ।