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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भंवर केसरीसिंह का ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह का असमय २६ वर्ष की देहावसान युवावस्था में निःसंतान देहांत हो गया। महारावत के शरीर पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। वृद्धावस्था में युवा पुत्र एवं पौत्र की मृत्यु के कठोर दुःख को सहन करना बड़ा कठिन था, फिर भी इन दैविक आपत्तियों को सहन कर उसने धैर्य न छोड़ा और वह राज्य-कार्य बराबर चलाता रहा। वृद्धावस्था, शारीरिक स्थिति की निर्बलता तथा दैविक विपत्तियों के कारण महारावत अपने पिछले समय में राज्य-कार्य में पूर्ण रूप से ध्यान न दे सका। इससे समय-समय पर कुछ शासन में अव्यवस्था होना अव्यवस्था भी उत्पन्न हुई और भील, मीणों, ठगों तथा अन्य जरायम-पेशा लोगों ने अपना धंधा जारी कर दिया, पर राज्य की आर्थिक स्थिति में इससे कुछ अन्तर नहीं हुआ और महारावत के उत्तम आचरण से अंग्रेज़ सरकार ने उसको हर प्रकार से सहायता देकर शासन-व्यवस्था में बाधा न पड़ने दी¹। महारावत सामंतसिंह के छोटे पुत्र दलपतसिंह को डूंगरपुर के महा- रावल जसवतसिंह-द्वारा दत्तक लेने की स्वीकृति अंग्रेज़ सरकार से प्राप्त होने पर वह वहां चला गया था; फिर भी पितृ-प्रेम महारावत का डूंगरपुर से से प्रेरित होकर वि० सं० १८८१ माघ वदि ५ दलपतसिंह को बुलाकर (ई० स० १८२५ ता० ६ जनवरी) को महारावत ने शासन-कार्य सौंपना उसको वार्षिक २४००० रुपये की आय का कल- थाणा का पट्टा प्रदानकर वि० सं० १८८७ (ई० स० १८३०) से उसका खिराज एक हज़ार रुपये लेना स्थिर किया²। प्रारम्भ में दलपतसिंह और महारावल के बीच मेल रहा, परन्तु फिर महारावल के साथ उसकी नहीं निभी। वि० सं० १८८१ (ई० स० १८२४) में वहां भीलों का उपद्रव हो गया, (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ३५८ । (२) महारावत सामन्तसिंह का भंवर दलपतसिंह के नाम का वि० सं० १८८१ माघ वदि ५ (ई० स० १८२५ ता० ६ जनवरी) का परवाना ।