भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

२७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास से हुआ तथा उस (सामन्तसिंह) की राठोड़ राणी मेड़तणी के उदर से चिमनकुंवरी नामक पुत्री हुई, जिसका विवाह लूणावाड़ा के सोलंकी महा- राणा फ़तहसिंह से वि० सं० १८७८ (ई० स० १८२१) में हुआ¹। महारावत सामन्तसिंह के दीर्घ शासन-काल में देवलिया के राज- महलों में कई प्रकार का सुधार हुआ। इसी प्रकार प्रतापगढ़ में भी कई [हाशिया: महारावत के समय के बने हुए] मकान और महल बने। उसकी माता कुंदनकुंवरी [हाशिया: देवालय आदि] ने देवलिया में विष्णु आदि के पांच मंदिर बनवाकर बावड़ी बनवाई एवं उन मंदिरों तथा बावड़ी की प्रतिष्ठा के अवसर पर तुलादान भी किया। महारावत ने स्वयं देवलिया में रघुनाथ-द्वारा नामक मंदिर बनवाकर वि० सं० १८४६ (ई० स० १८०२) में बड़े समारोह के साथ उसकी प्रतिष्ठा की। प्रतापगढ़ राज्य के राजकीय देवालयों में आय की दृष्टि से रघुनाथ-द्वारा विशेष स्थान रखता है²। उसकी पुत्री चिमनकुंवरी ने देवलिया में चंद्रशेखर का शिव-मंदिर (१) लूणावाड़ा राज्य की ख्यात; पत्र ८०, पृ० १। (२) देवलिया के रघुनाथ-द्वारे का वि० सं० १८४६ (ई० स० १८०२) में महारावत सामन्तसिंह ने बड़े समारोहपूर्वक प्रतिष्ठा-महोत्सव कर निम्बार्क सम्प्रदाय के साधु रामकृष्णदास को, जो बर्दवान (कलकत्ता) की तरफ़ से आया हुआ भगवद्भक्त था, महन्त बनाकर उक्त देवालय का सारा प्रबन्ध उसको सौंप दिया। फिर उसका शिष्य पोखरदास वहां का महन्त हुआ, जिसने देवलिया के राजप्रासाद के पीछे 'रघुनाथ सागर' नामक जलाशय बनवाया, जो सार्वजनिक दृष्टि से देवलिया के जलाशयों में बड़ा उप- योगी है। पोखरदास के पीछे क्रमशः केशवदास, उदयदास और मनोहरदास वहां के महन्त हुए। वर्तमान महन्त बालमुकुंददास वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में वहां की गद्दी का स्वामी हुआ, जो सरल-चित्त और संतोषी पुरुष है। इस देवालय को भुवांसा, कोलवी और दोतड़ गांव प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से भेंट में दिये गये हैं और सब मिलाकर यहां की आय पांच सहस्र रुपये वार्षिक मानी जाती है। दशहरे के अवसर पर जब महारावत की सवारी रावण-वध के लिए देवलिया जाती है, तब रघुनाथद्वारे से रामचन्द्र आदि की मूर्तियां भी धूम-धाम से सवारी में स्वयं महारावत साथ रहकर ले जाते हैं और फिर वहां रावण-वध की लीला का प्रदर्शन होता है।

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ) · पृष्ठ 333, कुल 534 में से · BharatKosha