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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 534 में से

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राजपूताने का इतिहास-तीसरी जिल्द, तीसरा भाग प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पहला अध्याय भूगोल सम्बन्धी वर्णन प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी राजधानी देवलिया होने से पहले यह राज्य देवलिया (देवगढ़) राज्य कहलाता था। उक्त राज्य के अधीन का प्रदेश कांठल नाम से प्रसिद्ध है। देवलिया का नाम क़सबा पहाड़ी प्रदेश में होने तथा वहां का जलवायु आरोग्यप्रद न होने के कारण महारावत प्रतापसिंह ने समान भूमि में घोघे- रिया खेड़ा (डोडेरिया का खेड़ा) के स्थान पर प्रतापगढ़ नगर बसाया, जहां राजधानी स्थिर होने से इसका नाम प्रतापगढ़ राज्य हुआ। प्रतापगढ़ राज्य राजपूताने के दक्षिणी भाग में २३°२२' और २४°१८' उत्तर अक्षांश तथा ७४°२६' और ७५° पूर्व देशान्तर के बीच स्थित है। स्थान और क्षेत्रफल इस राज्य का क्षेत्रफल अनुमान ८८६ वर्ग मील है। (१) संस्कृत के 'कंठ' या 'कंठिका' शब्द से कांठा शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ समुद्र, नदी अथवा किसी निश्चित सीमा के किनारे का प्रदेश होता है। यथा 'मही कांठा' = 'मही के तट का प्रदेश'; 'रेवा कांठा' = 'रेवा(नर्मदा)के तट का प्रदेश' आदि। प्रतापगढ़ राज्य से मालवा राज्य की सीमा मिलती है। इस कारण से उक्त राज्य 'कांठा' अर्थात् सीमा के तट का प्रदेश कहलाने लगा, जिसका परिवर्तित रूप 'कांठल' है।

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