राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत उदयसिंह २६६ साथ अपने राज्य की भूमि बिना मूल्य रेल्वे लाइन निकालने के लिए अंग्रेज़ सरकार को देना स्वीकार किया; परंतु फिर प्रतापगढ़ राज्य में होकर अंग्रेज़ सरकार ने रेल्वे लाइन निकालने का विचार स्थगित कर दिया, इसलिए अंतिम लिखा-पढ़ी नहीं हुई' । इसके दूसरे वर्ष वि० सं० १६२३ (नवंबर ई० स० १८६६) में भारत के तत्कालीन वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल, लॉर्ड लॉरेंस का आगरे में आगमन हुआ। उस अवसर पर महारावत उदय- सिंह भी उक्त वाइसरॉय से मुलाक़ात करने के लिए आगरे गया², जहां वाइसरॉय ने महारावत से मिलकर प्रसन्नता प्रकट की। इस सफ़र से उस(महारावत) को अंग्रेज़ी अमलदारी में होनेवाली उन्नति का हाल ज्ञात हुआ। आगरा से लौटने के बाद युवक महारावत ने भी अपने राज्य में लाभदायक काम करने चाहे; परंतु कई बाधाएं उपस्थित हो गईं, जिससे उसके विचार कार्यरूप में परिणत न हो सके । देवलिया का जलवायु अस्वास्थ्यकर होने से महारावत ने प्रताप- गढ़ क़स्बे की, जो स्वास्थ्य-प्रद है, उन्नति करने का विचार कर आबादी से एक मील दूर पूर्व की तरफ़ खुले मैदान में वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) में अंग्रेज़ी तर्ज़ का बंगला बनवाकर वहां रहना आरंभ किया, जिससे देवलिया की आबादी घटने लगी और वि० सं० १६३२ (ई० स० १८७५) में वहां के कई महल खाली हो गये । फलस्वरूप उसके समय से ही प्रतापगढ़ इस राज्य की राजधानी हुई और भूतपूर्व महारावत रघुनाथ- सिंह, महाराजकुमार मानसिंह और वर्तमान महाराजकुमार सर रामसिंहजी ने वहां कई इमारतें बनवाकर उसकी बहुत कुछ उन्नति की है ।
(१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स ऐंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४३ (पांचवां संस्करण)। (२) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० ३, पृ० ५५६।