राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उस समय तक प्रतापगढ़ राज्य की अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से सलामी की तोपों की संख्या नियत न थी। दि० अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से सं० १९२४ (ई० स० १८६७) में अंग्रेज़ सरकार ने प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी की इस राज्य की सलामी की पन्द्रह तोपें स्थायी रूप सलामी की तोपें नियत होना से नियत कीं१। वि० सं० १९२५ (ई० स० १८६८) में राजपूताना में भयंकर अकाल पड़ा, जिससे प्रतापगढ़ राज्य भी बचा न रहा। थोड़ी वर्षा होने के कारण वहां उस साल नाज तथा घास कम पैदा हुई और वि० सं० १९२५ के अकाल फिर मारवाड़ आदि अन्य स्थानों से हज़ारों मनुष्य में महारावत की उदारता भूख-प्यास से व्याकुल हो अपने पशुधन को लेकर मालवा में चले गये। प्रतापगढ़ राज्य मालवा के निकट होने से वहां भी अकाल-पीड़ित व्यक्तियों के झुंड के झुंड जाने लगे। उस अवसर पर महारावत ने अपने राज्य की प्रजा और पशुओं की रक्षा करने के अतिरिक्त बाहर से आये हुए मनुष्यों एवं पशुओं की रक्षा करना भी अपना कर्त्तव्य समझा। इस कार्य के लिए बाहर से गल्ला मंगवाकर सस्ते भाव से बेचने की व्यवस्था की गई; ग़रीबों के लिए ख़ैरातखाने खोले गये, कई स्थानों पर सहायक कार्य जारी कर जागीरदारों को भी अकाल-पीड़ित व्यक्तियों को काम में लगाने के लिए आज्ञाएं जारी की गईं, बाहर से आनेवाले गल्ले आदि सामान पर सायर का महसूल माफ़ किया गया तथा ता० १३ दिसंबर ई० स० १८६८ (वि० सं० १९२५ पौष वदि ३०) को इस सम्बन्ध में नीचे लिखा इश्तिहार जारी किया गया— “वर्षा न होने से मारवाड़ तथा अन्य स्थानों में घास और नाज उत्पन्न नहीं हुआ है। इस वास्ते वहां के लोग पशुओं को बड़ी संख्या में लेकर मालवा में आये हैं। वहां अनाज तथा घास-पानी का अभाव होना स्पष्ट है। ईश्वर उनकी रक्षा करे। अकाल वर्ष के आरंभ से ही है और आगामी वर्ष की फ़सल शुरू होने तक रहेगा। अतएव आवश्यकता है कि (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एंड सनदज़; जि० ३, पृ० ४५३।