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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 534 में से

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पृष्ठ 379

३१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हुआ था¹। प्रजा की प्रार्थनाओं को वह स्वयं सुनकर यथाशक्ति उनके कष्टों को मिटाने का यत्न करता था। उसका चोर और डाकुओं पर भी आतंक था, जिससे उसके राज्य-काल में प्रतापगढ़ राज्य में उनके उपद्रव कम हो गये। जब कभी वह अपने राज्य में चोरी और डाकों की ख़बर सुनता तो भोजन करता हुआ भी उठ खड़ा होता था। इससे उसके इलाके का फ़ौजदारी सीग़े का इंतज़ाम अच्छा रहा, जिसकी पोलिटिकल अफ़सरों ने भी सराहना की²। उसकी अंग्रेज़ अफ़सरों तथा आस-पास के राजाओं से सदा मेल की नीति रही और थोड़ी ही आयु में उसने काफ़ी प्रसिद्धि पाई। वह अपने कर्मचारियों के कार्यों की पूरी देख-भाल करता और समय- समय पर उनकी सेवाओं की कद्र कर उन्हें पुरस्कृत करता था। विद्वान् और कवि लोगों को वह संदा आश्रय देकर अपने पास रखता एवं उनको जागीरें आदि देकर उनका सम्मान बढ़ाता था। सरदारों का भी वह पूरा आदर और मान रखता था। उसने कितने ही सरदारों से वसूल होनेवाले खिराज में कमी और कई सरदारों के सम्मान में वृद्धि की थी। न्याय की वह अवहेलना नहीं करता था। अपने कर्मचारियों को उसकी पूरी ताकीद थी कि वे प्रजा को प्रसन्न रखें तथा उनके साथ अन्याय न करें और न अनुचित रूप से उनसे धन लें। धमोतर के ठाकुर हमीरसिंह को जब जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह ने एक चंवर रखने का सम्मान दिया तो महारावत ने उसको अपनी तरफ़ से दूसरा चंवर रखने का सम्मान देकर अपनी नीति-कुशलता का परिचय दिया। उसकी काव्य- साहित्य की ओर रुचि थी, इसलिए अयोध्या (कनकभवन) के महंत जानकीप्रसाद (रसिकविहारी), प्रसिद्ध साहित्यसेवी स्वामी गणेश- पुरी और बाठरडा (मेवाड़ राज्य) के रावत दलेलसिंह के लघु भ्राता गुमानसिंह को (जो काव्य का ज्ञाता और योगी पुरुष था) आदर-पूर्वक अपने यहां रखकर गुण-ग्राहकता का परिचय दिया था। उसने बारहठ (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६२। (२) वही; जि० १, पृ० ५६२ ।