राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत उदयसिंह ३१३ केवल कुछ दिनों की बीमारी के पीछे वि० सं० १९४६ फाल्गुन वदि ११ (ई० स० १८९० ता० १५ फ़रवरी) को लगभग ४१ वर्ष की आयु में महारावत का परलोकवास महारावत उदयसिंह का निःसंतान परलोकवास हो गया । उसकी असामयिक मृत्यु से प्रजा में गहरी उदासी छा गई, क्योंकि वह प्रजा-प्रिय राजा था । महारावत उदयसिंह के तीन विवाह हुए थे । उनमें से एक राणी नामली के ठाकुर तख्तसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी थी । गद्दी बैठने के बाद महारावत की राणियां उसके दो विवाह सैलाना के राजा दुलहसिंह की कुंवरियों—जुहारकुंवरी और फूलकुंवरी—से हुए थे¹ । उनमें से एक विवाह वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में हुआ था² । महारावत के छब्बीस वर्ष के शासन में प्रतापगढ़ राज्य में बहुत कुछ लोकोपयोगी कार्य हुए, जिनमें से प्रतापगढ़ की धर्मशाला महारावत के लोकोपयोगी कार्य मुख्य है। उसके समय में प्रतापगढ़ के क़िले में कई मकान बने, जिनमें उदयविलास महल उल्लेखनीय है। अपने निवास के प्रतापगढ़ के नवीन बंगले के निकट राम- चंद्रजी का मंदिर बनवाकर उसने उस मंदिर के पूजन व्यय के लिए अमलावद और सींगपुरिया गांव में जागीर निकालकर अच्छी व्यवस्था कर दी थी। उदयसिंह वीर, प्रबंध-कुशल, प्रजा-प्रिय और उदार राजा था । वह शिकार का प्रेमी अवश्य था, परंतु उधर उसकी अधिक आसक्ति होना महारावत का व्यक्तित्व पाया नहीं जाता । राज्य के शासन-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य मानता था । उसकी प्रजा उससे सदा प्रेम करती थी, जिसका परिचय तत्कालीन पोलिटिकल एजेंटों को भी उसके राज्य में दौरा करते समय प्रजा से पूछ-ताछ करने पर ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । सूवेनीर हिस्ट्री ऑव् सैलाना स्टेट; पृ० ३६-७ । ( २ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ४०