राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
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३१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
स्वर्णजयंती मनाना निश्चित हुआ। तदनुसार महारावत महारानी विक्टोरिया की 'स्वर्ण जयन्ती का उत्सव ने भी अपने यहां दरबार कर स्वर्ण जयन्ती-महोत्सव मनाया जाना मनाया और इस शुभ दिवस के स्मरणार्थ राजधानी प्रतापगढ़ में आबादी से पूर्व की तरफ़ मंदसोर जाने- वाले मार्ग में एक नाले पर पक्का पुल बनवाया । उसी वर्ष महारानी विक्टोरिया के तृतीय शाहज़ादे ड्यूक ऑव् महारावत का नीमच जाकर कनाट का नीमच में आगमन हुआ । उस अवसर ड्यूक ऑव् कनाट से मुलाक़ात पर महारावत ने नीमच जाकर उक्त शाहज़ादे से करना मुलाक़ात की । महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १६२४ ( ई० स० १८६७ ) में प्रतापगढ़ में रोगियों की चिकित्सा के लिए डिस्पेंसरी खोली गई¹ । शीतला रोग से बचने के लिए उक्त महारावत के महारावत के अन्य प्रमुख कार्य समय वि० सं० १६२७ ( ई० स० १८७० ) में टीका लगवाने की व्यवस्था हुई²। बालकों की शिक्षा के लिए वि० सं० १६३२ ( ई० स० १८७५ ) में वहां पाठशाला की स्थापना की गई³ । स्टांप और कोर्ट फ़ीस का क़ायदा बनाया जाकर वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में वहां जारी किया गया । उसने अपने यहां सेना को बाक़ायदा क़वायद सिखलाने की भी व्यवस्था की थी⁴ । बांसवाड़ा राज्य और प्रताप- गढ़ राज्य के सीमा संबंधी मुक़द्दमे भी उसके समय में तय हुए, जिससे झगड़े मिट गये । पुलिस और गिराई की भी उसके समय में वहां कुछ-कुछ व्यवस्था हुई और वि० सं० १६४१ ( ई० स० १८८४ ) में वहां अंग्रेज़ी डाक- खाना भी खोला गया⁵ ।
( १ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २२१ । ( २ ) वही; पृ० २२१ । ( ३ ) वही; पृ० २२० । ( ४ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ( ५ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २१२ ।