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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 534 में से

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पृष्ठ 376

महारावत उदयसिंह ३११ इंदौर नरेश से मुलाक़ात के लिए महारावत का नीमच जाना | तुकोजीराव होल्कर ( द्वितीय ) भी गया हुआ था। वहां उपर्युक्त नरेश से उसकी कई मुलाक़ातें हुईं। फिर महाराजा के वहां से लौटने पर महा- रावत अपनी राजधानी में दाख़िल हुआ । वि० सं० १९४३ ( ई० स० १८८६ ) में महारावत ने मन्त्री पद पर पारसी फ़्रामजी भीकाजी को नियत किया, जिसने कई वर्षों तक अंग्रेज़ सरकार के राजनैतिक विभाग में दायित्वपूर्ण पदों महारावत का पारसी फ़्रामजी भीकाजी को कामदार बनाना | पर रहकर सेवाएं की थीं तथा मेवाड़ के पोलि- टिकल एजेंट के असिस्टेंट के पद पर रहकर बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्यों के बीच होनेवाले सीमा संबंधी झगड़ों को निपटाया था। उसके और महारावत के बनी नहीं, जिससे उसकी जगह मिर्ज़ा मुहम्मदी बेग वहां का कामदार बनाया गया । उसी वर्ष फाल्गुन सुदि ६ ( ई० स० १८८७ ता० १ मार्च) मंगलवार को सैलानेवाली मंझली महाराणी जुहारकुंवरी के उदर से महाराजकुमार अर्जुनसिंह का जन्म हुआ । महारावत के प्रथम महारावत की सैलानेवाली महाराणी से कुंवर उत्पन्न होना | राजकुमार का परलोकवास हो जाने के पीछे १७ वर्ष तक कोई संतान न होने से उत्तराधिकारी के विषय में वहां की प्रजा चिंतित थी । अतएव राजकुमार का जन्म होने से उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा । महारावत ने उक्त राजकुमार के उत्पन्न होने की प्रसन्नता में सहस्रों रुपये व्यय किये और अपने सगे संबंधी नरेशों में से सैलाना और सीतामऊ के राजाओं तथा कानोड़, आसींद (मेवाड़ राज्य) और कुशलगढ़ के सरदारों को अपने यहां निमंत्रित कर पुत्र-जन्मोत्सव मनाया; किंतु वह राजकुमार केवल डेढ़ वर्ष की आयु में ही काल कवलित हो गया, जिसका उक्त महारावत के शरीर पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा और संसार से उसको एकबार ही विरक्ति हो गई। वि० सं० १९४४ में महाराणी विक्टोरिया को शासन-सूत्र हाथ में लिये पचास वर्ष पूरे हो गये, जिसके उपलक्ष्य में इंग्लैंड और भारत में

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