राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किसी भी उपद्रव में सम्मिलित न हुए और वे शांतिप्रिय बने रहे । श्रीमती महाराणी विक्टोरिया ने भारत का राज्याधिकार अपने हाथ में लेने के पीछे "सम्राज्ञी" (Empress of India) पदवी धारण की । दिल्ली दरबार के उपलक्ष्य में महारावत को झंडा मिलना उस सम्बन्ध में ई० स० १८७७ ता० १ जनवरी (वि०सं० १९३३ माघ वदि २) सोमवार को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल और वाइसरॉय लॉर्ड लिटन ने दिल्ली नगर में एक बृहत् दरबार करना निश्चित किया । इस अवसर पर भारत के नरेशों को भी दरबार में सम्मिलित होने के लिए निमन्त्रण पत्र भेजे गये । तदनुसार भारत के कई नरेश दिल्ली जाकर उक्त दरबार में सम्मिलित हुए । कारण विशेष से महारावत उदयसिंह दरबार में सम्मिलित नहीं हुआ, अतएव उसके लिए वाइसरॉय लॉर्ड लिटन ने शाही झंडा (निशान) भेजना स्थिर किया, जो वि० सं० १९३६ (ई० स० १८७९) में मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट मेजर टी० केडिल प्रतापगढ़ लेकर गया और एक बड़े दरबार में वह महारावत को दिया गया । वि० सं० १९३७ (ई० स० १८८१) के शीतकाल में इस राज्य में प्रथम बार मनुष्य-गणना हुई । इस अवसर पर उदयपुर राज्य में भीलों प्रतापगढ़ राज्य में प्रथम बार मनुष्य-गणना होना का उपद्रव हो गया था । प्रतापगढ़ राज्य, मेवाड़ राज्य से मिला हुआ है और वहां के अधिकांश निवासी भील, मीणे हैं, जिससे वहां भी उपद्रव हो जाने की आशंका हुई; परन्तु महारावत के उत्तम प्रबन्ध से प्रतापगढ़ राज्य में ऐसा उपद्रव न हुआ और शांतिपूर्वक मनुष्य गणना का कार्य होकर वहां की जन संख्या में ७६५६८ व्यक्तियों की गणना हुई१ । इसके दो वर्ष पीछे वि० सं० १९३९ (ई० स० १८८३) में महारावत नीमच की छावनी गया, जहां उस समय इंदौर का भूतपूर्व महाराजा (१) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २०१ ।