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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

३१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

स्वर्णजयंती मनाना निश्चित हुआ। तदनुसार महारावत महारानी विक्टोरिया की 'स्वर्ण जयन्ती का उत्सव ने भी अपने यहां दरबार कर स्वर्ण जयन्ती-महोत्सव मनाया जाना मनाया और इस शुभ दिवस के स्मरणार्थ राजधानी प्रतापगढ़ में आबादी से पूर्व की तरफ़ मंदसोर जाने- वाले मार्ग में एक नाले पर पक्का पुल बनवाया । उसी वर्ष महारानी विक्टोरिया के तृतीय शाहज़ादे ड्यूक ऑव् महारावत का नीमच जाकर कनाट का नीमच में आगमन हुआ । उस अवसर ड्यूक ऑव् कनाट से मुलाक़ात पर महारावत ने नीमच जाकर उक्त शाहज़ादे से करना मुलाक़ात की । महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १६२४ ( ई० स० १८६७ ) में प्रतापगढ़ में रोगियों की चिकित्सा के लिए डिस्पेंसरी खोली गई¹ । शीतला रोग से बचने के लिए उक्त महारावत के महारावत के अन्य प्रमुख कार्य समय वि० सं० १६२७ ( ई० स० १८७० ) में टीका लगवाने की व्यवस्था हुई²। बालकों की शिक्षा के लिए वि० सं० १६३२ ( ई० स० १८७५ ) में वहां पाठशाला की स्थापना की गई³ । स्टांप और कोर्ट फ़ीस का क़ायदा बनाया जाकर वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में वहां जारी किया गया । उसने अपने यहां सेना को बाक़ायदा क़वायद सिखलाने की भी व्यवस्था की थी⁴ । बांसवाड़ा राज्य और प्रताप- गढ़ राज्य के सीमा संबंधी मुक़द्दमे भी उसके समय में तय हुए, जिससे झगड़े मिट गये । पुलिस और गिराई की भी उसके समय में वहां कुछ-कुछ व्यवस्था हुई और वि० सं० १६४१ ( ई० स० १८८४ ) में वहां अंग्रेज़ी डाक- खाना भी खोला गया⁵ ।

( १ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २२१ । ( २ ) वही; पृ० २२१ । ( ३ ) वही; पृ० २२० । ( ४ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ( ५ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २१२ ।

महारावत उदयसिंह ३१३ केवल कुछ दिनों की बीमारी के पीछे वि० सं० १९४६ फाल्गुन वदि ११ (ई० स० १८९० ता० १५ फ़रवरी) को लगभग ४१ वर्ष की आयु में महारावत का परलोकवास महारावत उदयसिंह का निःसंतान परलोकवास हो गया । उसकी असामयिक मृत्यु से प्रजा में गहरी उदासी छा गई, क्योंकि वह प्रजा-प्रिय राजा था । महारावत उदयसिंह के तीन विवाह हुए थे । उनमें से एक राणी नामली के ठाकुर तख्तसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी थी । गद्दी बैठने के बाद महारावत की राणियां उसके दो विवाह सैलाना के राजा दुलहसिंह की कुंवरियों—जुहारकुंवरी और फूलकुंवरी—से हुए थे¹ । उनमें से एक विवाह वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में हुआ था² । महारावत के छब्बीस वर्ष के शासन में प्रतापगढ़ राज्य में बहुत कुछ लोकोपयोगी कार्य हुए, जिनमें से प्रतापगढ़ की धर्मशाला महारावत के लोकोपयोगी कार्य मुख्य है। उसके समय में प्रतापगढ़ के क़िले में कई मकान बने, जिनमें उदयविलास महल उल्लेखनीय है। अपने निवास के प्रतापगढ़ के नवीन बंगले के निकट राम- चंद्रजी का मंदिर बनवाकर उसने उस मंदिर के पूजन व्यय के लिए अमलावद और सींगपुरिया गांव में जागीर निकालकर अच्छी व्यवस्था कर दी थी। उदयसिंह वीर, प्रबंध-कुशल, प्रजा-प्रिय और उदार राजा था । वह शिकार का प्रेमी अवश्य था, परंतु उधर उसकी अधिक आसक्ति होना महारावत का व्यक्तित्व पाया नहीं जाता । राज्य के शासन-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य मानता था । उसकी प्रजा उससे सदा प्रेम करती थी, जिसका परिचय तत्कालीन पोलिटिकल एजेंटों को भी उसके राज्य में दौरा करते समय प्रजा से पूछ-ताछ करने पर ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । सूवेनीर हिस्ट्री ऑव् सैलाना स्टेट; पृ० ३६-७ । ( २ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ४०

३१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हुआ था¹। प्रजा की प्रार्थनाओं को वह स्वयं सुनकर यथाशक्ति उनके कष्टों को मिटाने का यत्न करता था। उसका चोर और डाकुओं पर भी आतंक था, जिससे उसके राज्य-काल में प्रतापगढ़ राज्य में उनके उपद्रव कम हो गये। जब कभी वह अपने राज्य में चोरी और डाकों की ख़बर सुनता तो भोजन करता हुआ भी उठ खड़ा होता था। इससे उसके इलाके का फ़ौजदारी सीग़े का इंतज़ाम अच्छा रहा, जिसकी पोलिटिकल अफ़सरों ने भी सराहना की²। उसकी अंग्रेज़ अफ़सरों तथा आस-पास के राजाओं से सदा मेल की नीति रही और थोड़ी ही आयु में उसने काफ़ी प्रसिद्धि पाई। वह अपने कर्मचारियों के कार्यों की पूरी देख-भाल करता और समय- समय पर उनकी सेवाओं की कद्र कर उन्हें पुरस्कृत करता था। विद्वान् और कवि लोगों को वह संदा आश्रय देकर अपने पास रखता एवं उनको जागीरें आदि देकर उनका सम्मान बढ़ाता था। सरदारों का भी वह पूरा आदर और मान रखता था। उसने कितने ही सरदारों से वसूल होनेवाले खिराज में कमी और कई सरदारों के सम्मान में वृद्धि की थी। न्याय की वह अवहेलना नहीं करता था। अपने कर्मचारियों को उसकी पूरी ताकीद थी कि वे प्रजा को प्रसन्न रखें तथा उनके साथ अन्याय न करें और न अनुचित रूप से उनसे धन लें। धमोतर के ठाकुर हमीरसिंह को जब जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह ने एक चंवर रखने का सम्मान दिया तो महारावत ने उसको अपनी तरफ़ से दूसरा चंवर रखने का सम्मान देकर अपनी नीति-कुशलता का परिचय दिया। उसकी काव्य- साहित्य की ओर रुचि थी, इसलिए अयोध्या (कनकभवन) के महंत जानकीप्रसाद (रसिकविहारी), प्रसिद्ध साहित्यसेवी स्वामी गणेश- पुरी और बाठरडा (मेवाड़ राज्य) के रावत दलेलसिंह के लघु भ्राता गुमानसिंह को (जो काव्य का ज्ञाता और योगी पुरुष था) आदर-पूर्वक अपने यहां रखकर गुण-ग्राहकता का परिचय दिया था। उसने बारहठ (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६२। (२) वही; जि० १, पृ० ५६२ ।

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महारावत सर रघुनाथसिंह, के. सी. आई. ई.

महारावत रघुनाथसिंह ३१५ ईसरदान और मेहडू चारण गुलाबसिंह को पैर में स्वर्णाभूषण पहनने का सम्मान देकर उसने उनकी प्रतिष्ठा-वृद्धि की थी¹। उसके राज्य-समय में प्रतापगढ़ राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया, जिसका कारण उसकी विलासिता की तरफ़ प्रवृत्ति होना भी बतलाया जाता है। वि० सं० १६२५ (ई० सं० १८६८) के भयंकर अकाल में उसने जो उदारता दिखलाई थी, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। वह पूर्ण आस्तिक और धर्म-प्रेमी राजा था। लोकोपकार की तरफ़ सदा उसकी भावना रहती थी। वि० सं० १६२६ (ई० स० १८७२) में उस- (महारावत) ने पुष्कर-यात्रा भी की थी। भील और मीणों से, जो गायों को मारकर खा जाते थे, उक्त महारावत ने इक़रार लिखवाकर उक्त पशु की हिंसा बन्द करवाई और भविष्य में ऐसा कार्य करनेवालों को कठोर दंड देने का शिलालेख खुदवाकर देवलिया में लगवा दिया²। प्रतापगढ़ राज्य में सती-प्रथा और राजपूताने में होनेवाली कन्या-वध की प्रथा उसके ही समय से बंद होना मानना चाहिये। उसका वर्ण गौर, बदन भरा हुआ, क़द मंझला, चेहरा गोल, आंखे बड़ी-चड़ी, भुजदंड विशाल, वक्षस्थल चौड़ा और ललाट उन्नत था। उसके चेहरे से राजपूती आभा टपकती थी। रघुनाथसिंह महारावत रघुनाथसिंह, अरणीद के महाराज खुशहालसिंह (कुशल- सिंह) का पुत्र था। उसका जन्म वि० सं० १६१५ पौष वदि १० जन्म और गद्दीनशीनी (ई० स० १८५८ ता० २६ दिसंबर) को हुआ था। वह प्रारम्भ से ही पितृप्रेम से वंचित हो गया था, जिससे उसके बाल्यजीवन का अधिकांश भाग आसींद (मेवाड़) के रावत खुम्माणसिंह के यहां व्यतीत हुआ, जहां उसकी माता की ननसार थी। इस कारण वह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका और तत्कालीन शैली के (१) वंशभास्कर; तृतीय भाग, पृ० ५४ (भूमिका)। (२) वि० सं० १६४१ भाद्रपद सुदि ११ (ई० स० १८८४ ता० ३१ अग- स्त) रविवार का देवलिया के बोहरे की दूकान के सामने का शिलालेख।

अनुसार ही उसने हिंदी भाषा का आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया। वह कुछ वर्ष तक महाराणा शंभुसिंह के समय उदयपुर भी रहा था और जब उक्त महा- राणा वि० सं० १६२७ (ई० स० १८७०) में भारत के तत्कालीन वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल लॉर्ड मेयो से मुलाक़ात करने के लिए अजमेर गया, उस समय वह (रघुनाथसिंह) भी उसके साथ विद्यमान था। महारावत उदयसिंह का वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में अपुत्र देहांत होने से प्रतापगढ़ राज्य के सरदारों और राज-कर्मचारियों को बड़ी चिंता हुई; क्योंकि बिना किसी को उत्तराधिकारी निर्वाचित किये राज्य-प्रबन्ध में गड़बड़ी होने की संभावना थी और भूतपूर्व महारावत ने किसी को अपना उत्तराधिकारी नियत नहीं किया था। प्रतापगढ़ राज्य में महारावत के देहावसान होने पर गद्दी ख़ाली नहीं रहती और तत्काल नये महारावत के नाम की दुहाई फेरी जाती है। इस बात को दृष्टिकोण में रखकर धमोतर के ठाकुर तथा अन्य सरदारों एवं कामदार शाह रत्नलाल पाडलिया ने अरणीदं के महाराज रघुनाथसिंह को (जो समीपी बांधव था) हक़दार होने से गद्दी बिठलाने की राय स्थिर की। तदनन्तर उन्होंने अन्तःपुर की ड्योढ़ी पर जाकर परलोकवासी महारावत की राणियों से यह बात निवेदन करवाई, जिस-पर उन्होंने शाह कपूरचंद ख़ासगीवाले तथा लक्ष्मीराम नागर के द्वारा महाराज रघुनाथसिंह को गद्दी बिठलाने की स्वीकृति भेजी। फलस्वरूप उपस्थित सरदारों और प्रतिष्ठित कर्मचारियों ने महारावत उदयसिंह की राणियों के आदेशानुसार महाराज रघुनाथसिंह को राजगद्दी पर बिठला कर, उसको अपना स्वामी घोषित किया और राज्य में भी उसके नाम की दुहाई फेर दी। तदनन्तर उसकी गद्दीनशीनी की सूचना बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेन्ट पोलिटिकल ऑफ़िसर को दी जाने पर कप्तान पिन्हे ने स्वयं प्रतापगढ़ जाकर भूतपूर्व महारावत की राणियों से दर्याफ़्त कराया, तो उन्होंने रघुनाथसिंह को अपनी इच्छानुसार गद्दी बिठलाना स्वीकार किया। इसके पीछे मेवाड़ के रेज़िडेंट कर्नल पिकॉक ने भी प्रतापगढ़ जाकर

महारावत रघुनाथसिंह ३१७ परलोकवासी महारावत की राणियों से पूछताछ कराई तो उन्होंने पूर्ववत् ही उत्तर दिया। अन्त में रेज़िडेंट मेवाड़ की तरफ़ से रघुनाथसिंह को भूतपूर्व महारावत का दत्तक स्वीकार करने की मंज़ूरी होने की बाबत सदर में रिपोर्ट की, तब महाराणियों की इच्छानुसार अंग्रेज़ सरकार ने उस (रघुनाथसिंह) की गद्दीनशीनी को स्वीकार कर प्रतापगढ़ सूचना दी। इसपर महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १९४७ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १८६० ता० ४ मई) को तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड लैंसडौन के पास महारावत उदयसिंह के परलोकवास होने और अपनी गद्दीनशीनी का खरीता भेजा। राज्यारोहण के समय महारावत की आयु ३१ वर्ष की थी और वह स्वयं समझदार था तथा उसके कार्यकर्ता अनुभवी थे। इसलिए उस समय रीजेंसी कौंसिल निर्माण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और मुख्य-मुख्य कार्यों में बांसवाड़ा एवं प्रतापगढ़ के असिस्टैंट पोलिटिकल एजेंट का परामर्श लेना निश्चित होकर बाक़ी सारा कार्य पूर्ववत् महारावत की आज्ञानुसार चलता रहा। वि० सं० १९४७ पौष वदि ३० (ई० स० १८६१ ता० १० जनवरी) को महारावत के लिए गद्दीनशीनी के सम्बन्ध में उपर्युक्त वाइसरॉय का [हाशिया: अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से] खरीता और अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी [हाशिया: गद्दीनशीनी की ख़िलअत] की ख़िलअत लेकर राजपूताने का एजेंट गवर्नर [हाशिया: पहुंचना] जनरल कर्नल ट्रेवर प्रतापगढ़ गया और उसने एक बड़े दरबार में महारावत को गद्दीनशीनी की ख़िलअत देकर वाइसरॉय का ई० स० १८६० ता० २२ दिसम्बर (वि० सं० १९४७ मार्गशीर्ष सुदि ११) का खरीता पढ़कर सुनाया, जो नीचे लिखे अनुसार है— "मेरे मित्र, आपका ई० स० १८६० ता० ४ मई का लिखा हुआ कृपापत्र, जिसमें महारावत उदयसिंह के देहांत का समाचार था, मुझको मिला। इस ख़बर के सुनने से मुझे बड़ा शोक हुआ। यह लिखकर अब मैं आपको सूचित करता हूं कि मैंने आपकी गद्दीनशीनी को स्वीकृत

३१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया है। विश्वास है कि आपकी हुकूमत का युग दीर्घकाल तक उन्नति- शील बना रहेगा। आप मेरी मित्रता का पूरा भरोसा रखें। प्रत्येक समय मेरे राजपूताने के एजेंट तथा बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेंट पोलि- टिकल एजेंट आपका पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे। मैं आपके उत्तम स्वभाव और योग्यता की बात सुन चुका हूं, इसलिए मैं राज्याभिषेकोत्सव के दिन से ही आपको शासन के पूरे अधिकार सौंपता हूं। विश्वास है कि आप हर कार्य में शुभ अनुष्ठान करते हुए अपने को योग्य शासक सिद्ध करेंगे।" मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा पर सीतामाता नामक पवित्र और प्राचीन स्थान है। महारावत उदयसिंह के पिछले समय में उसके लिए एक नया विवाद खड़ा हो गया और उक्त [सीमा संबंधी झगड़े तय] स्थान को मेवाड़ राज्य अपनी सीमा में तथा प्रता- [होना] पगढ़ राज्य अपनी हद के अन्दर बतलाने लगा। कप्तान पिन्हे (असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्य) झगड़े के फ़ैसले के लिए नियत हुआ। उभय पक्ष की तरफ़ से उक्त स्थान अपने-अपने राज्य में होने के कई प्रमाण पेश किये गये और वहां अपना स्वत्व जमाने की दोनों तरफ़ से चेष्टाएं की गईं; परंतु उक्त कप्तान ने ई० स० १८७८ (वि० सं० १९३५) में प्रतापगढ़ राज्य के मोतमिद शाह रतनलाल-द्वारा पेश किये गये एक पत्र के आधार पर, जो पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ की ओर से महाराणा सज्जनसिंह के उधर आगमन के अवसर पर सरबराह के प्रबंध के लिए लिखा गया था, वह स्थान प्रतापगढ़ राज्य के अन्तर्गत होना मानकर ई० स० १८९१ ता० २५ जून (वि० सं० १९४८ आषाढ वदि ४) को अपना फैसला दिया। उसी समय मेवाड़ राज्य और प्रतापगढ़ राज्य के बीच के सीमा सम्बन्धी और भी कुछ फ़ैसले हुए, जिससे दोनों राज्यों के बीच का सीमा सम्बन्धी विवाद मिट गया। उन्हीं दिनों महारावत ने मथुरा के नागर ब्राह्मण पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या को, जो उदयपुर में महन्द्राज सभा का सेक्रेटरी तथा

महारावत रघुनाथसिंह ३१६ पंडित मोहनलाल पंड्या का कामदार नियत होना दीवानी अदालत का हाकिम रह चुका था, अपना कामदार नियत किया। वह नवीन शैली की कार्य-प्रणाली का अच्छा परिचय रखता था, इसलिए शासन-शैली में बहुत कुछ फेर-फार होकर उसके कार्यकाल में कई लोकोपयोगी कार्यों की नींव दी गई। महारावत ने, जो स्वयं लोकोप- योगी कार्यों में अनुराग रखता था और व्यवस्थित रूप से शासन प्रणाली को चलाना चाहता था, ऐसे कार्यों में बड़ी रुचि दिखलाई, जिससे शीघ्र ही वहां कई आवश्यक कार्य हुए, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है। राजधानी प्रतापगढ़ में महारावत उदयसिंह के समय ही अस्पताल की स्थापना हो गई थी, परंतु उसका निजी कोई भवन नहीं था; रघुनाथ हॉस्पिटल का निर्माण होना अतएव महारावत ने राजधानी प्रतापगढ़ में क़िले के बाहर अस्पताल के लिए वि० सं० १९५० (ई० स० १८९३) में नवीन भवन बनवाकर उसका उद्घाटन राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जेनरल कर्नल ट्रेवर के हाथ से कर- वाया और उसका नाम 'रघुनाथ हॉस्पिटल' रखा तथा रोगियों के इलाज की अच्छी व्यवस्था कर अशक्त रोगियों के लिए वहां ही रहकर चिकित्सा करवाने का यथोचित प्रबंध करवा दिया। देवलिया में चिकित्सा का कुछ भी साधन न था, जिससे वहां के निवासी बीमारी के समय पूर्ण कष्ट का अनुभव करते थे। वि० सं० १९५२ (ई० स० १८९५) में महारावत ने वहां भी चिकित्सालय स्थापित करवा दिया। प्रतापगढ़ में सफ़ाई, रोशनी आदि का कोई प्रबन्ध न होने से म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना वि० सं० १९५० (ई० स० १८९३) में वहां पर म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना हुई, जिससे वहां सफ़ाई, रोशनी आदि का समुचित प्रबन्ध हो गया। सायर की लागत, पहले ठेके पर दी जाकर ठेकेदारों द्वारा वसूल होती थी, जिससे आय पूरी नहीं होती थी और व्यापारियों आदि को कष्ट

३२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सायर के महक्मे की होता था । महारावत ने वि० सं० १९५१ ( ई० स० स्थापना १८९४ ) से सायर की आय ठेके पर देना बन्द कर दिया और एक अलग महक्मा स्थापित कर सायर के महसूल का क्रम भी एकसा निर्धारित कर दिया । उसी वर्ष व्यापारी-वर्ग को सुविधा पहुंचाने के लिए महारावत ने प्रतापगढ़ में तारघर और प्रतापगढ़ में पोस्ट ऑफ़िस खुलवाने के विषय में देवलिया में डाकखाना अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ीकर डाकखाने के खुलना शामिल तारघर भी खुलवा दिया । इसके दूसरे वर्ष ( वि० सं० १९५२ में ) देवलिया में भी डाकख़ाना खोल दिया गया । गमनागमन के प्रायः सारे मार्ग कच्चे थे और सबसे नज़दीकी रेल्वे स्टेशन मंदसोर राजधानी प्रतापगढ़ से २० मील दूर होने से जनता को वहां पहुंचने में पूरी असुविधा होती थी । प्रतापगढ़ से मंदसोर तक पक्की सड़क मंदसोर जाने के मार्ग की अधिकांश भूमि काली बनना होने से वर्षा ऋतु में मार्ग दुर्गम हो जाता था। इस- लिए महारावत ने अपने राज्य की सीमा में मंदसोर के मार्ग में पक्की सड़क बनाने का विचार कर वि० सं० १९५१ ( ई० स० १८९४ ) में इस सड़क का कार्यारम्भ करा दिया, जिससे १३ मील तक इस राज्य की सीमा में पक्की सड़क बन गई और ७ मील तक अपनी सीमा में ग्वालियर राज्य ने सड़क बनवा दी, जिससे प्रतापगढ़ से मंदसोर तक का मार्ग सरल हो गया । अपनी गद्दीनशीनी के एक वर्ष पीछे तक महारावत ने प्रतापगढ़ में ही अपना निवास रखा। तत्पश्चात् उसने वहां की पुरानी राजधानी देवलिया में अपना निवास रखना पसन्द किया; परन्तु देव- देवलिया के राज-महलों लिया के राज-महल सब जीर्ण हो रहे थे । अतएव का जीर्णोद्धार होना उसने उनके जीर्णोद्धार का कार्य कराया । ये महल अब भी वहां की सौन्दर्य-वृद्धि कर रहे हैं। देवलिया-निवास के समय राजकीय अदालतें प्रतापगढ़ में ही रहीं। राज्य-शासन में किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इस दृष्टि से वहां से प्रतापगढ़ तक टेलीफ़ोन लगा दिया गया ।

महारावत रघुनाथसिंह ३२१ शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ज़िलाबंदी कर प्रतापगढ़, कनौरा, बजरंगगढ़, सागथली और मगरा नामक पांच ज़िले बनाये [ज़िलाबंदी होना] जाकर वहां के हाकिमों को माल तथा न्याय संबंधी आवश्यक अधिकार दिये गये। इससे राज्य-प्रबंध में आसानी हुई और जनता के लिए भी, अपने साथ अन्याय होने पर अपील का अधिकार प्राप्त होकर, अपनी फ़रियाद क्रमशः उच्चाधिकारियों और महारावत तक पहुंचाने का मार्ग खुल गया। प्रतापगढ़ राज्य के बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों के दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के फ़ैसले करते थे, जिसकी ठीक व्यव- [सरदारों को न्याय सम्बन्धी अधिकार मिलना] स्था न थी। ठिकानेदारों के किये हुए फ़ैसलों की अपील सुनने का भी कोई साधन न था, जिससे वहां की प्रजा बहुधा न्याय से वंचित रहती थी। वि० सं० १६५१ (ई० स० १८६४) में महारावत ने न्याय-विभाग का कार्य व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए अपने राज्य के प्रथम वर्ग- धमोतर, झांतला, वरडिया, रायपुर, कल्याणपुर, आंवीरामा, अचलावदा, अरणोद और सालिमगढ़—के सरदारों के दीवानी तथा फ़ौजदारी अधि- कार निर्दिष्ट कर निम्नलिखित शर्तें स्थिर कीं- (१) अपने पट्टे के अन्दर आसामियों के दीवानी मुक़दमों में तुमको अख्तियार समाअत तो तादाद बेहद तक का होगा, मगर अख्तियार एक हज़ार तक के दावे के फ़ैसले का ही होगा और इससे अधिक तादाद के सब मुक़दमे, मिसल की तरतीब और तकमील होने के बाद मय अपनी राय के अदालत सदर दीवानी में आख़िरी फ़ैसले के वास्ते तुमको बाज़ाब्ते चालान करने होंगे। उनमें से जो मुक़दमे अदालत सदर दीवानी के द्वारा फ़ैसला करने लायक़ होंगे, उनको तो अदालत मौसूफ़ खुद फ़ैसल करेगी और जो उसके अख्तियार के बाहर होंगे, उनको वो अपनी तजवीज़ के साथ आख़िरी फ़ैसले के वास्ते राजेश्री महकमा खास में भेजेगी। (२) हर क़िस्म के फ़ौजदारी मुक़दमे के समाअत करने का ४१

३२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास अख्तियार तो तुमको होगा, मगर फ़ैसला करने का अख्तियार सिर्फ़ उन जुर्मों के मुक़दमों का ही होगा, जिनकी सज़ा छः महीने क़ैद और तीन सौ रुपये जुरमाना तक है और इससे अधिक सज़ा के सब मुक़दमे तर- तीब और तकमील मिसल होने के बाद मय अपनी राय के फ़ैसले के वास्ते तुमको वाज़ाब्ते अदालत सदर फ़ौजदारी में चालान करने होंगे। उनमें से जो मुक़दमे अदालत सदर फ़ौजदारी-द्वारा फ़ैसला करने के होंगे, उनको तो अदालत मौसूफ़ खुद फ़ैसल करेगी और जो उसके अधिकार के बाहर होंगे, उनको वो अपनी तजवीज़ के साथ आख़िरी फ़ैसले के वास्ते राजेश्री महकमा खास में भेजेगी। ( ३ ) जिन फ़ौजदारी मुक़दमों में मुद्दई खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी दूसरी रियासत का होगा और मुद्दालह तुम्हारे पट्टे का होगा या कोई मुजरिम खालसे या किसी दूसरी जागीर या किसी रियासत गैर का तुम्हारे पट्टे में कहीं पनाह लेगा तो ऐसे मुक़दमे ज़िले के हाकिम की अदालत में दायर होंगे और माल तथा मुजरिम तुमको अदालत मौसूफ़ के सुपुर्द करने होंगे। ( ४ ) जिन दीवानी मुक़दमों में मुद्दई तो खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी रियासत गैर का होगा और मुद्दालह तुम्हारे पट्टे का आसामी होगा वे ज़िला हाकिम की अदालत में दायर होंगे। ( ५ ) जिन दीवानी व फ़ौजदारी मुक़दमों में मुद्दई तो तुम्हारे पट्टे का होगा और मुद्दालह खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी रियासत गैर का होगा वे ज़िले की अदालत में दायर होंगे। ( ६ ) जिन दीवानी या फ़ौजदारी मुक़दमों में तुम खुद मुद्दई या मुद्दालह होंगे, उनके सुनने और फ़ैसला करने का अख्तियार तुमको न होगा, बल्कि ऐसे मुक़दमे श्रीदरवार की अदालत में दायर और फ़ैसल होंगे। ( ७ ) जिन दीवानी या फ़ौजदारी मुक़दमों के फ़ैसल करने का अख्तियार तुमको क़लम' एक व दो में दिया गया है, उनमें तुम्हारी

महारावत रघुनाथसिंह ३२३ तजवीज़ के ख़िलाफ़ अपील सदर दीवानी व फ़ौजदारी अदालत में होगी और उनके फ़ैसले की अपील राजेश्री महक्मा खास में होगी । ( ८ ) जो दीवानी व फ़ौजदारी मुक़दमे तुम्हारे अख्तियार से बाहर हैं, उनकी जो तजवीज़ अदालत ज़िला करेगी उनके ख़िलाफ़ अपील अदालत सदर में होगी । उनकी तजवीज़ की अपील राजेश्री महक्मा खास में होगी । ( ६ ) जो दीवानी मुक़दमे अपने पट्टे के आसामियों के, हस्ब मंशा क़लम एक तुम फ़ैसल करोगे, उनकी प्रारम्भिक कार्रवाई अदालत श्री दरवार ने तुमको बख़्शी है । तुम्हारे फ़ैसल किये इन मुक़दमों की अपील की रसूम अदालत तुमको नहीं मिलेगी और उसी तरह बाक़ी और सब क़िस्म के दीवानी मुक़दमों की, जिनको फ़ैसल करने का तुमको हक़ नहीं है, रसूम अदालत भी तुमको नहीं मिलेगी । ( १० ) जो फ़ौजदारी मुक़दमे अपने पट्टे के आसामियों के हस्ब मंशा क़लम दो तुम फ़ैसल करोगे, उनका जुरमाना तो तुमको मिलेगा और जो क़ैद की सज़ा तजवीज़ होगी वह यदि तुम्हारे यहां के जेलखाने का बन्दोवस्त रियासत हाज़ा के क़ायदे के मुताबिक़ होगा तो वहां भुगताई जावेगी, नहीं तो श्रीदरवार के जेलखाने में भुगताई जावेगी और ऐसे क़ैदियों की खुराक वग़ैरा का खर्चा तुमको देना होगा । तुम्हारे फ़ैसल किये हुए इन मुक़दमों की अपील की रसूम अदालत तुमको नहीं मिलेगी और उसी तरह बाक़ी अन्य सब क़िस्म के फ़ौजदारी मुक़दमों का, जिनके फ़ैसल करने के तुम अधिकारी नहीं हो, जुरमाना तुमको नहीं मिलेगा । ( ११ ) रसूम सरकारी याने दस्तावेज़ लिखने के लिए जो स्टांप के काग़ज़ तुम्हारे पट्टे की रियाया ख़रीदेगी, उसकी क़ीमत रियासत हाज़ा के ख़ज़ाने में जमा होगी । ( १२ ) आसामियों की तलबी के लिए किसी अदालत रियासत हाज़ा से माक़ूल मियाद देकर तीन बार लिखे जाने पर भी यदि हुक्म की तामील न होगी, तो आसामियों को तलब करनेवाली अदालत को अधिकार

३२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास होगा कि उनको परभारी तलब या गिरफ़्तार कर लेवे। (१३) जो क़ानून क़ायदे श्रीदरबार की आज्ञानुसार हाल में जारी हुए हैं या भविष्य में तमाम राज देवगढ़-प्रतापगढ़ के लिए बनाकर जारी किये आवेंगे, उनके मुताबिक़ तुमको अपने पट्टे में बखूबी अमल रखना होगा। (१४) तुमको अपने पट्टे की रियाया को आराम देने और इंसाफ़ करने के लिए अदालत और जेलखाने वगैरह का, रियासत हाज़ा के जारी किये हुए क़ानून के मुताबिक़, अच्छा इन्तज़ाम रखना होगा। (१५) अगर तुम अपने पट्टे की रियाया को हर सूरत आराम पहुंचाओगे और इन्साफ़ के साथ कार्यवाही करोगे तथा श्रीदरबार तुम्हारे चाल-चलन, व्यवहार और अच्छे इंतज़ाम से खुश होंगे, तो तुम्हारे अख़्ति- यार और भी बढ़ाये जा सकेंगे। (१६) जो नक्शेज़ात तुम्हारे यहां राजेश्री महक्मा खास से हमेशा भेजे जावेंगे, उनको सही-सही भरकर निश्चित समय पर महक्मा खास में भेजना होगा। (१७) विलायती, मकरानी, बलोची और अरब आदि क़ौम के लोगों को तुम अपने पट्टे में हरगिज़ नहीं रख सकोगे। अगर उनमें से कोई तुम्हारे पट्टे में गिरफ़्तार होकर सरहद पर भेजा जावेगा, तो उसका खर्चा तुमको देना होगा। (१८) मोघिये आदि जरायम पेशा क़ौमें, जो तुम्हारे पट्टे में हों, उनको मोघियों के क़ानून की मंशा के बमूजिब तुमको अपने पट्टे में आबाद करना होगा और इंतज़ाम भी रखना होगा। अगर तुम इंतज़ाम और आबाद न कर सकने की वजह से उनको श्रीदरबार की क़ायम की हुई आबादी में आबाद करने के लिए भेजोगे तो उसका खर्चा वगैरह तुमको देना होगा। (१९) जो संगीन वारदात तुम्हारे पट्टे में कहीं होगी, उसकी इत्तिला अविलम्ब राजेश्री महक्मा खास में तुमको देनी होगी तथा उसकी तहक़ी- क़ात ऐन वक़्त और मौक़े पर करके राजेश्री महक्मा खास को परिणाम

महारावत रघुनाथसिंह ३२५ से सूचित करना होगा और जो हुक्म महक्मा मौसूफ़ से उस बारे में दिया जावेगा उसकी तामील बखूबी करनी होगी। (२०) तुमको अपने ठिकाने की तरफ़ से एक वकील देवगढ़-प्रताप- गढ़ में हमेशा हाज़िर रखना होगा, जो तुम्हारे ठिकाने के ताल्लुक़ का कुल काम हर एक महक्मे और अदालत में हाज़िर रहकर किया करे। (२१) जो आज्ञाएं राजेश्वरी महक्मा ख़ास से समय-समय पर जारी होंगी या जो मुक़दमे श्रीदरबार की अदालतों से फ़ैसल होकर तामील के लिए तुम्हारे यहां भेजे जायेंगे, उनकी तुमको पूरी-पूरी तामील करनी होगी। उसी वर्ष महारावत ने अपने राज्य में स्टांप और कोर्ट फ़ीस के क़ायदे में संशोधन कर उसे जारी किया, जिससे ठिकानों में मनमानी बंद हो गई और ख़ालसे तथा ठिकानों में एक ही प्रकार के क़ायदे चालू हो गये। महारावत ने अपने कामदार पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या का पूरा सम्मान किया। उसको गुरु की उपाधि, ताज़ीम का सम्मान और दो गांव भी प्रदान किये; किन्तु उसने थोड़े ही दिनों पारसी फ्रामजी भीकाजी को बाद महारावत की कृपा खो दी। फिर उस स्थान पुनः कामदार नियत करना पर पारसी फ़्रामजी भीकाजी नियत हुआ, जो पहले इस पद का कार्य कर चुका था। उन्हीं दिनों महारावत ने अपने पुराने कामदार मिर्ज़ा मुहम्मददीबेग की, जिसने भूतपूर्व महारावत उदयसिंह तथा उस (रघुनाथसिंह) के समय अच्छी सेवा की थी, एक हज़ार रुपये वार्षिक पेंशन नियत कर दी। गद्दीनशीनी के पूर्व महारावत की राजकुमारी वल्लभकुंवरी का जन्म हुआ था। महारावत ने उसका संबंध बीकानेर के वर्तमान महाराजा सर राजकुमारी वल्लभकुंवरी का गंगासिंहजी के साथ स्थिर किया। वि० सं० १९५४ महाराजा बीकानेर के साथ आषाढ़ सुदि ६ (ई० स० १८९७ ता० ८ जुलाई) विवाह होना को उक्त राजकुमारी का विवाह उपर्युक्त महाराजा के साथ बड़ी धूमधाम से हुआ। इस विवाह का समग्र व्यय लगभग पांच लाख रुपये के हुआ।

३२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १६५५ मार्गशीर्ष सुदि ५ (ई० स० १८६८ ता० १८ दिसम्बर) को महारावत का अपने जामाता महाराजा सर महारावत का बीकानेर जाना गंगासिंहजी के आग्रहवश बीकानेर जाना हुआ। तथा कामदार पद पर ठाकुर महाराजा साहब के स्नेहपूर्ण व्यवहार और सम्मान रघुवीरसिंह का नियत होना तथा वहां के शासन में जिन सुधारों का आरंभ हुआ था, उनको देखकर महारावत को पूर्ण संतोष हुआ। इन्हीं दिनों उसने शासन-कार्य चलाने के लिए बीकानेर से ठाकुर रघुवीरसिंह को बुलाकर अपने यहां का कामदार नियत किया। उसी वर्ष (वि० सं० १६५५ = ई० स० १८६८ में) महारावत ने अपने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने का निश्चय कर अजमेर के रायबहादुर ⸴| सेठ सोभागमल ढड्ढा को सेठ सोभागमल ढड्ढा की, जिसकी व्यापारी-जगत् ख़ज़ांची बनाना में अच्छी साख थी और ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों में कई स्थानों पर बड़ी-बड़ी दुकानें थीं, अपने यहां दुकान खुलवाई तथा उसको प्रतापगढ़ राज्य का ख़ज़ांची नियत किया। उन्हीं दिनों महारावत ने न्याय-विभाग को सुचारु रूप से चलाने के लिए महक्मा खास से उसका संबंध तोड़ दिया और न्याय सम्बन्धी न्याय-विभाग को पृथक् कर अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च अदालत "राजसभा" राजसभा की स्थापना नियत की, जिसकी दो शाखाएं-एक इजलास करना कामिल और दूसरी इजलास मामूली-बनाई गईं। इस राजसभा के सदस्य सरदारों और कर्मचारियों में से योग्यता का विचारकर महारावत-द्वारा नियुक्त होते थे। इजलास कामिल में उक्त सभा के सदस्यों के साथ महारावत स्वयं बैठकर मुक़द्दमों को सुनता और उन- पर उनकी सम्मति लेकर अपना हुक्म देता था। इजलास मामूली में पेश होनेवाले मामलों का निर्णय स्वयं उक्त सभा के सदस्य कर मंज़ूरी के लिए उन्हें महारावत के पास भेज देते थे। नीचे की अदालतों के फ़ैसले की अपील सुनना और नीचे की अदालतों के फ़ैसले की निगरानी की मंज़ूरी

महारावत रघुनाथसिंह ३२७

देना एवं उनके अधिकार के बाहर के मुक़दमों को तय करना भी उक्त सभा के ही कार्य थे इस प्रकार न्याय-विभाग पृथक् हो जाने से महकमा ख़ास के सुपुर्द शासन संबंधी आर्थिक और प्रबंध विभाग के कार्य ही रह गये। उस समय नीचे की अदालतों के न्याय संबंधी अधिकार निश्चित नहीं हुए थे। इसलिए न्याय संबंधी कार्य को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए महारावत ने वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) में अपने कामदार रघुवीरसिंह की सम्मति के अनुसार नीचे की अदालतों के निम्नलिखित अधिकार स्थिर किये— ( १ ) हाकिम अदालत फ़ौजदारी क्रिमिनल जज कहलावेगा और उसको मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल के अधिकार होंगे। वह दो साल क़ैद, एक हज़ार रुपये जुरमाना और एक दर्जन बेंत तक की सज़ा दे सकेगा। ( २ ) हाकिम अदालत दीवानी सिविल जज कहलावेगा। वह नक़द रुपये के दावे एक हज़ार तक के सुन सकेगा। हक़ के मुक़दमों में एक सौ रुपये के मूल्य के दावे सिविल जज के यहां दायर होंगे। फ़ैसला सिविल जज राजसभा की मंज़ूरी से जारी होगा। ( ३ ) हाकिम ज़िला केवल ढाई सौ रुपये के दावे सुन सकेगा और हक़ के मुक़दमे पच्चीस रुपये तक के उसके पास दायर हो सकेंगे। वह अपने यहां के मुक़दमे सिविल जज के द्वारा राजसभा में भेजेगा और उनकी अपील का हक़ न होगा। ( ४ ) हाकिम ज़िला को तीसरे दर्जे के मजिस्ट्रेट का अख्तियार दिया जाता है। वह एक मास तक क़ैद और पचास रुपये तक जुरमाने की सज़ा अपने अधिकार से दे सकेगा। उसी वर्ष वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६००) में अल्प वर्षा होने से राजपूताने में भयङ्कर अकाल पड़ा और प्रतापगढ़ राज्य में केवल ग्या- संवत् १६५६ का भयङ्कर रह इंच ही वर्षा हुई, जिनसे अन्न और घास की अकाल पैदावारी कम हुई। इस अवसर पर महारावत ने अपने राज्य में मदद के कई कार्य जारी किये,

३२८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जिससे लोगों को बड़ा सहारा मिला। बच्चों और अशक्त क्षुधातुर व्यक्तियों के लिए जगह-जगह खैरातखाने खोले गये और वहां से उनको भोजन मिलने की व्यवस्था हुई। अकाल के समय राज्य ने उदारतापूर्वक लगान माफ़ कर दिया। बाहर से अन्न मंगवाया गया, जिससे लोगों को सस्ते भाव से अन्न मिलने लगा। फिर वर्ष समाप्त होने पर सुवर्षा हुई तब जिन लोगों के पास बीज और बैल न थे, उनको बीज तथा बैल आदि राज्य से दिलाये जाकर कृषि-कर्म में लगाया गया। इस भयङ्कर अकाल के समय महारावत ने लगभग पौने दो लाख रुपये व्यय किये, जिसके लिए अंग्रेज़ सरकार से रुपये कर्ज़ लेने पड़े। इसमें संदेह नहीं कि अकाल के समय महारावत ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की, परंतु ग्रीष्म काल में हैज़े की भयानक व्याधि हुई और वर्षा ऋतु के पीछे ज्वर और पेचिश की व्या- धियां उत्पन्न हो गईं, जिनसे सहस्रों मनुष्य मर गये। इसी प्रकार घास की कमी के कारण सहस्रों पशु मर गये, जिससे राज्य की बड़ी क्षति हुई। गद्दीनशीनी के पूर्व महारावत के दो राजकुमार विद्यमान थे। उनमें से ज्येष्ठ प्रतापसिंह और छोटा मानसिंह था। महारावत के सिंहासनारोहण के समय प्रतापसिंह उत्तराधिकारी माना गया और कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म राजकुमार मानसिंह के नाम पर अरणोद का और उसको अरनोद की ठिकाना रहा। महारावत की गद्दीनशीनी के थोड़े जागीर मिलना ही दिनों बाद (वि० सं० १९५७ द्वितीय भाद्रपद सुदि ५ = ई० स० १८९० ता० १६ सितम्बर को) प्रतापसिंह परलोक सिधारा। इसके लिए राज्य के उत्तराधिकारी पद पर महाराजकुमार मानसिंह स्थिर हुआ फिर वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) शुक्रवार को महारावत की खवास ठिकानेवाली तीसरी महाराणी के उदर से छोटे महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितम्बर) को महारावत ने गोवर्धनसिंह

महारावत रघुनाथसिंह ३२६ को अरणोद की जागीर प्रदान की और उसकी उपाधि "महाराज" हुई । प्रतापगढ़ राज्य का वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) के अकाल से तो छुटकारा ही नहीं हुआ था कि वि० सं० १६५८ ( ई० स० अकाल का पुनः आक्रमण १६०१) में पुनः अकाल के लक्षण दिखाई पड़े । उस वर्ष वर्षा औसत से आधी ही हुई, जिससे पैदावार थोड़ी हुई । राज्य ऋणग्रस्त था तथापि महारावत ने उस समय अपनी स्वाभाविक उदारता में अन्तर न आने दिया । प्रजा के निर्वाह के लिए इमदादी काम और निर्धन तथा अशक्त व्यक्तियों के लिए अन्नक्षेत्र खोले गये, जिससे पका-पकाया भोजन उनको मिलने लगा । बाइस हज़ार रुपये तकावी में बांटे गये और वर्षा होने पर बैल खरीदने तथा बीज बांटने में भी बहुत कुछ सहायता दी गई । उसी वर्ष महाराजा बीकानेर-द्वारा बुलाये जाने पर ठाकुर रघुवीर- ठाकुर रघुवीरसिंह का काम- सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा पेश किया । तब दार-पद से पृथक् होना महारावत ने उसके स्थान में अजमेर के बाबू गौरी- शंकर वर्मा, बार-एट-लॉ को, जो महाराजकुमार मानसिंह का शिक्षक रह चुका था, कामदार नियत किया । उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह की आयु सत्रह वर्ष के ऊपर हो गई थी । उसका विवाह-संबंध खेतड़ी ( जयपुर ) के विद्याप्रेमी नरेश राजा महाराजकुमार मानसिंह का अजीतसिंह शेखावत की विदुषी राजकुमारी चांद- खेतड़ी में विवाह होना कुंवरी (चंद्रकुमारी) के साथ होना स्थिर हुआ था। तद्नुसार वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०३ ) में उक्त राजकुमारी का पाणिग्रहण संस्कार महाराजकुमार मानसिंह के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । इस अवसर पर वहां के स्वामी जयसिंह की आयु केवल १० वर्ष थी तथापि बरात की अभ्यर्थना में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई । महाराजकुमारी और महाराजकुमार के विवाह तथा वि० सं० १६५६ और १६५८ ( ई०स० १८६६-१६०० एवं १६०१-२ ) के अकालों के कारण ४२