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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 534 में से

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महारावत रघुनाथसिंह ३१५ ईसरदान और मेहडू चारण गुलाबसिंह को पैर में स्वर्णाभूषण पहनने का सम्मान देकर उसने उनकी प्रतिष्ठा-वृद्धि की थी¹। उसके राज्य-समय में प्रतापगढ़ राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया, जिसका कारण उसकी विलासिता की तरफ़ प्रवृत्ति होना भी बतलाया जाता है। वि० सं० १६२५ (ई० सं० १८६८) के भयंकर अकाल में उसने जो उदारता दिखलाई थी, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। वह पूर्ण आस्तिक और धर्म-प्रेमी राजा था। लोकोपकार की तरफ़ सदा उसकी भावना रहती थी। वि० सं० १६२६ (ई० स० १८७२) में उस- (महारावत) ने पुष्कर-यात्रा भी की थी। भील और मीणों से, जो गायों को मारकर खा जाते थे, उक्त महारावत ने इक़रार लिखवाकर उक्त पशु की हिंसा बन्द करवाई और भविष्य में ऐसा कार्य करनेवालों को कठोर दंड देने का शिलालेख खुदवाकर देवलिया में लगवा दिया²। प्रतापगढ़ राज्य में सती-प्रथा और राजपूताने में होनेवाली कन्या-वध की प्रथा उसके ही समय से बंद होना मानना चाहिये। उसका वर्ण गौर, बदन भरा हुआ, क़द मंझला, चेहरा गोल, आंखे बड़ी-चड़ी, भुजदंड विशाल, वक्षस्थल चौड़ा और ललाट उन्नत था। उसके चेहरे से राजपूती आभा टपकती थी। रघुनाथसिंह महारावत रघुनाथसिंह, अरणीद के महाराज खुशहालसिंह (कुशल- सिंह) का पुत्र था। उसका जन्म वि० सं० १६१५ पौष वदि १० जन्म और गद्दीनशीनी (ई० स० १८५८ ता० २६ दिसंबर) को हुआ था। वह प्रारम्भ से ही पितृप्रेम से वंचित हो गया था, जिससे उसके बाल्यजीवन का अधिकांश भाग आसींद (मेवाड़) के रावत खुम्माणसिंह के यहां व्यतीत हुआ, जहां उसकी माता की ननसार थी। इस कारण वह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका और तत्कालीन शैली के (१) वंशभास्कर; तृतीय भाग, पृ० ५४ (भूमिका)। (२) वि० सं० १६४१ भाद्रपद सुदि ११ (ई० स० १८८४ ता० ३१ अग- स्त) रविवार का देवलिया के बोहरे की दूकान के सामने का शिलालेख।