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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 534 में से

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पृष्ठ 383

अनुसार ही उसने हिंदी भाषा का आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया। वह कुछ वर्ष तक महाराणा शंभुसिंह के समय उदयपुर भी रहा था और जब उक्त महा- राणा वि० सं० १६२७ (ई० स० १८७०) में भारत के तत्कालीन वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल लॉर्ड मेयो से मुलाक़ात करने के लिए अजमेर गया, उस समय वह (रघुनाथसिंह) भी उसके साथ विद्यमान था। महारावत उदयसिंह का वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में अपुत्र देहांत होने से प्रतापगढ़ राज्य के सरदारों और राज-कर्मचारियों को बड़ी चिंता हुई; क्योंकि बिना किसी को उत्तराधिकारी निर्वाचित किये राज्य-प्रबन्ध में गड़बड़ी होने की संभावना थी और भूतपूर्व महारावत ने किसी को अपना उत्तराधिकारी नियत नहीं किया था। प्रतापगढ़ राज्य में महारावत के देहावसान होने पर गद्दी ख़ाली नहीं रहती और तत्काल नये महारावत के नाम की दुहाई फेरी जाती है। इस बात को दृष्टिकोण में रखकर धमोतर के ठाकुर तथा अन्य सरदारों एवं कामदार शाह रत्नलाल पाडलिया ने अरणीदं के महाराज रघुनाथसिंह को (जो समीपी बांधव था) हक़दार होने से गद्दी बिठलाने की राय स्थिर की। तदनन्तर उन्होंने अन्तःपुर की ड्योढ़ी पर जाकर परलोकवासी महारावत की राणियों से यह बात निवेदन करवाई, जिस-पर उन्होंने शाह कपूरचंद ख़ासगीवाले तथा लक्ष्मीराम नागर के द्वारा महाराज रघुनाथसिंह को गद्दी बिठलाने की स्वीकृति भेजी। फलस्वरूप उपस्थित सरदारों और प्रतिष्ठित कर्मचारियों ने महारावत उदयसिंह की राणियों के आदेशानुसार महाराज रघुनाथसिंह को राजगद्दी पर बिठला कर, उसको अपना स्वामी घोषित किया और राज्य में भी उसके नाम की दुहाई फेर दी। तदनन्तर उसकी गद्दीनशीनी की सूचना बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेन्ट पोलिटिकल ऑफ़िसर को दी जाने पर कप्तान पिन्हे ने स्वयं प्रतापगढ़ जाकर भूतपूर्व महारावत की राणियों से दर्याफ़्त कराया, तो उन्होंने रघुनाथसिंह को अपनी इच्छानुसार गद्दी बिठलाना स्वीकार किया। इसके पीछे मेवाड़ के रेज़िडेंट कर्नल पिकॉक ने भी प्रतापगढ़ जाकर