राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रघुनाथसिंह ३१७ परलोकवासी महारावत की राणियों से पूछताछ कराई तो उन्होंने पूर्ववत् ही उत्तर दिया। अन्त में रेज़िडेंट मेवाड़ की तरफ़ से रघुनाथसिंह को भूतपूर्व महारावत का दत्तक स्वीकार करने की मंज़ूरी होने की बाबत सदर में रिपोर्ट की, तब महाराणियों की इच्छानुसार अंग्रेज़ सरकार ने उस (रघुनाथसिंह) की गद्दीनशीनी को स्वीकार कर प्रतापगढ़ सूचना दी। इसपर महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १९४७ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १८६० ता० ४ मई) को तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड लैंसडौन के पास महारावत उदयसिंह के परलोकवास होने और अपनी गद्दीनशीनी का खरीता भेजा। राज्यारोहण के समय महारावत की आयु ३१ वर्ष की थी और वह स्वयं समझदार था तथा उसके कार्यकर्ता अनुभवी थे। इसलिए उस समय रीजेंसी कौंसिल निर्माण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और मुख्य-मुख्य कार्यों में बांसवाड़ा एवं प्रतापगढ़ के असिस्टैंट पोलिटिकल एजेंट का परामर्श लेना निश्चित होकर बाक़ी सारा कार्य पूर्ववत् महारावत की आज्ञानुसार चलता रहा। वि० सं० १९४७ पौष वदि ३० (ई० स० १८६१ ता० १० जनवरी) को महारावत के लिए गद्दीनशीनी के सम्बन्ध में उपर्युक्त वाइसरॉय का [हाशिया: अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से] खरीता और अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी [हाशिया: गद्दीनशीनी की ख़िलअत] की ख़िलअत लेकर राजपूताने का एजेंट गवर्नर [हाशिया: पहुंचना] जनरल कर्नल ट्रेवर प्रतापगढ़ गया और उसने एक बड़े दरबार में महारावत को गद्दीनशीनी की ख़िलअत देकर वाइसरॉय का ई० स० १८६० ता० २२ दिसम्बर (वि० सं० १९४७ मार्गशीर्ष सुदि ११) का खरीता पढ़कर सुनाया, जो नीचे लिखे अनुसार है— "मेरे मित्र, आपका ई० स० १८६० ता० ४ मई का लिखा हुआ कृपापत्र, जिसमें महारावत उदयसिंह के देहांत का समाचार था, मुझको मिला। इस ख़बर के सुनने से मुझे बड़ा शोक हुआ। यह लिखकर अब मैं आपको सूचित करता हूं कि मैंने आपकी गद्दीनशीनी को स्वीकृत