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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया है। विश्वास है कि आपकी हुकूमत का युग दीर्घकाल तक उन्नति- शील बना रहेगा। आप मेरी मित्रता का पूरा भरोसा रखें। प्रत्येक समय मेरे राजपूताने के एजेंट तथा बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेंट पोलि- टिकल एजेंट आपका पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे। मैं आपके उत्तम स्वभाव और योग्यता की बात सुन चुका हूं, इसलिए मैं राज्याभिषेकोत्सव के दिन से ही आपको शासन के पूरे अधिकार सौंपता हूं। विश्वास है कि आप हर कार्य में शुभ अनुष्ठान करते हुए अपने को योग्य शासक सिद्ध करेंगे।" मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा पर सीतामाता नामक पवित्र और प्राचीन स्थान है। महारावत उदयसिंह के पिछले समय में उसके लिए एक नया विवाद खड़ा हो गया और उक्त [सीमा संबंधी झगड़े तय] स्थान को मेवाड़ राज्य अपनी सीमा में तथा प्रता- [होना] पगढ़ राज्य अपनी हद के अन्दर बतलाने लगा। कप्तान पिन्हे (असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्य) झगड़े के फ़ैसले के लिए नियत हुआ। उभय पक्ष की तरफ़ से उक्त स्थान अपने-अपने राज्य में होने के कई प्रमाण पेश किये गये और वहां अपना स्वत्व जमाने की दोनों तरफ़ से चेष्टाएं की गईं; परंतु उक्त कप्तान ने ई० स० १८७८ (वि० सं० १९३५) में प्रतापगढ़ राज्य के मोतमिद शाह रतनलाल-द्वारा पेश किये गये एक पत्र के आधार पर, जो पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ की ओर से महाराणा सज्जनसिंह के उधर आगमन के अवसर पर सरबराह के प्रबंध के लिए लिखा गया था, वह स्थान प्रतापगढ़ राज्य के अन्तर्गत होना मानकर ई० स० १८९१ ता० २५ जून (वि० सं० १९४८ आषाढ वदि ४) को अपना फैसला दिया। उसी समय मेवाड़ राज्य और प्रतापगढ़ राज्य के बीच के सीमा सम्बन्धी और भी कुछ फ़ैसले हुए, जिससे दोनों राज्यों के बीच का सीमा सम्बन्धी विवाद मिट गया। उन्हीं दिनों महारावत ने मथुरा के नागर ब्राह्मण पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या को, जो उदयपुर में महन्द्राज सभा का सेक्रेटरी तथा