राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
३१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया है। विश्वास है कि आपकी हुकूमत का युग दीर्घकाल तक उन्नति- शील बना रहेगा। आप मेरी मित्रता का पूरा भरोसा रखें। प्रत्येक समय मेरे राजपूताने के एजेंट तथा बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेंट पोलि- टिकल एजेंट आपका पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे। मैं आपके उत्तम स्वभाव और योग्यता की बात सुन चुका हूं, इसलिए मैं राज्याभिषेकोत्सव के दिन से ही आपको शासन के पूरे अधिकार सौंपता हूं। विश्वास है कि आप हर कार्य में शुभ अनुष्ठान करते हुए अपने को योग्य शासक सिद्ध करेंगे।" मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा पर सीतामाता नामक पवित्र और प्राचीन स्थान है। महारावत उदयसिंह के पिछले समय में उसके लिए एक नया विवाद खड़ा हो गया और उक्त [सीमा संबंधी झगड़े तय] स्थान को मेवाड़ राज्य अपनी सीमा में तथा प्रता- [होना] पगढ़ राज्य अपनी हद के अन्दर बतलाने लगा। कप्तान पिन्हे (असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्य) झगड़े के फ़ैसले के लिए नियत हुआ। उभय पक्ष की तरफ़ से उक्त स्थान अपने-अपने राज्य में होने के कई प्रमाण पेश किये गये और वहां अपना स्वत्व जमाने की दोनों तरफ़ से चेष्टाएं की गईं; परंतु उक्त कप्तान ने ई० स० १८७८ (वि० सं० १९३५) में प्रतापगढ़ राज्य के मोतमिद शाह रतनलाल-द्वारा पेश किये गये एक पत्र के आधार पर, जो पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ की ओर से महाराणा सज्जनसिंह के उधर आगमन के अवसर पर सरबराह के प्रबंध के लिए लिखा गया था, वह स्थान प्रतापगढ़ राज्य के अन्तर्गत होना मानकर ई० स० १८९१ ता० २५ जून (वि० सं० १९४८ आषाढ वदि ४) को अपना फैसला दिया। उसी समय मेवाड़ राज्य और प्रतापगढ़ राज्य के बीच के सीमा सम्बन्धी और भी कुछ फ़ैसले हुए, जिससे दोनों राज्यों के बीच का सीमा सम्बन्धी विवाद मिट गया। उन्हीं दिनों महारावत ने मथुरा के नागर ब्राह्मण पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या को, जो उदयपुर में महन्द्राज सभा का सेक्रेटरी तथा
महारावत रघुनाथसिंह ३१६ पंडित मोहनलाल पंड्या का कामदार नियत होना दीवानी अदालत का हाकिम रह चुका था, अपना कामदार नियत किया। वह नवीन शैली की कार्य-प्रणाली का अच्छा परिचय रखता था, इसलिए शासन-शैली में बहुत कुछ फेर-फार होकर उसके कार्यकाल में कई लोकोपयोगी कार्यों की नींव दी गई। महारावत ने, जो स्वयं लोकोप- योगी कार्यों में अनुराग रखता था और व्यवस्थित रूप से शासन प्रणाली को चलाना चाहता था, ऐसे कार्यों में बड़ी रुचि दिखलाई, जिससे शीघ्र ही वहां कई आवश्यक कार्य हुए, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है। राजधानी प्रतापगढ़ में महारावत उदयसिंह के समय ही अस्पताल की स्थापना हो गई थी, परंतु उसका निजी कोई भवन नहीं था; रघुनाथ हॉस्पिटल का निर्माण होना अतएव महारावत ने राजधानी प्रतापगढ़ में क़िले के बाहर अस्पताल के लिए वि० सं० १९५० (ई० स० १८९३) में नवीन भवन बनवाकर उसका उद्घाटन राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जेनरल कर्नल ट्रेवर के हाथ से कर- वाया और उसका नाम 'रघुनाथ हॉस्पिटल' रखा तथा रोगियों के इलाज की अच्छी व्यवस्था कर अशक्त रोगियों के लिए वहां ही रहकर चिकित्सा करवाने का यथोचित प्रबंध करवा दिया। देवलिया में चिकित्सा का कुछ भी साधन न था, जिससे वहां के निवासी बीमारी के समय पूर्ण कष्ट का अनुभव करते थे। वि० सं० १९५२ (ई० स० १८९५) में महारावत ने वहां भी चिकित्सालय स्थापित करवा दिया। प्रतापगढ़ में सफ़ाई, रोशनी आदि का कोई प्रबन्ध न होने से म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना वि० सं० १९५० (ई० स० १८९३) में वहां पर म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना हुई, जिससे वहां सफ़ाई, रोशनी आदि का समुचित प्रबन्ध हो गया। सायर की लागत, पहले ठेके पर दी जाकर ठेकेदारों द्वारा वसूल होती थी, जिससे आय पूरी नहीं होती थी और व्यापारियों आदि को कष्ट
३२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सायर के महक्मे की होता था । महारावत ने वि० सं० १९५१ ( ई० स० स्थापना १८९४ ) से सायर की आय ठेके पर देना बन्द कर दिया और एक अलग महक्मा स्थापित कर सायर के महसूल का क्रम भी एकसा निर्धारित कर दिया । उसी वर्ष व्यापारी-वर्ग को सुविधा पहुंचाने के लिए महारावत ने प्रतापगढ़ में तारघर और प्रतापगढ़ में पोस्ट ऑफ़िस खुलवाने के विषय में देवलिया में डाकखाना अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ीकर डाकखाने के खुलना शामिल तारघर भी खुलवा दिया । इसके दूसरे वर्ष ( वि० सं० १९५२ में ) देवलिया में भी डाकख़ाना खोल दिया गया । गमनागमन के प्रायः सारे मार्ग कच्चे थे और सबसे नज़दीकी रेल्वे स्टेशन मंदसोर राजधानी प्रतापगढ़ से २० मील दूर होने से जनता को वहां पहुंचने में पूरी असुविधा होती थी । प्रतापगढ़ से मंदसोर तक पक्की सड़क मंदसोर जाने के मार्ग की अधिकांश भूमि काली बनना होने से वर्षा ऋतु में मार्ग दुर्गम हो जाता था। इस- लिए महारावत ने अपने राज्य की सीमा में मंदसोर के मार्ग में पक्की सड़क बनाने का विचार कर वि० सं० १९५१ ( ई० स० १८९४ ) में इस सड़क का कार्यारम्भ करा दिया, जिससे १३ मील तक इस राज्य की सीमा में पक्की सड़क बन गई और ७ मील तक अपनी सीमा में ग्वालियर राज्य ने सड़क बनवा दी, जिससे प्रतापगढ़ से मंदसोर तक का मार्ग सरल हो गया । अपनी गद्दीनशीनी के एक वर्ष पीछे तक महारावत ने प्रतापगढ़ में ही अपना निवास रखा। तत्पश्चात् उसने वहां की पुरानी राजधानी देवलिया में अपना निवास रखना पसन्द किया; परन्तु देव- देवलिया के राज-महलों लिया के राज-महल सब जीर्ण हो रहे थे । अतएव का जीर्णोद्धार होना उसने उनके जीर्णोद्धार का कार्य कराया । ये महल अब भी वहां की सौन्दर्य-वृद्धि कर रहे हैं। देवलिया-निवास के समय राजकीय अदालतें प्रतापगढ़ में ही रहीं। राज्य-शासन में किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इस दृष्टि से वहां से प्रतापगढ़ तक टेलीफ़ोन लगा दिया गया ।
महारावत रघुनाथसिंह ३२१ शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ज़िलाबंदी कर प्रतापगढ़, कनौरा, बजरंगगढ़, सागथली और मगरा नामक पांच ज़िले बनाये [ज़िलाबंदी होना] जाकर वहां के हाकिमों को माल तथा न्याय संबंधी आवश्यक अधिकार दिये गये। इससे राज्य-प्रबंध में आसानी हुई और जनता के लिए भी, अपने साथ अन्याय होने पर अपील का अधिकार प्राप्त होकर, अपनी फ़रियाद क्रमशः उच्चाधिकारियों और महारावत तक पहुंचाने का मार्ग खुल गया। प्रतापगढ़ राज्य के बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों के दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के फ़ैसले करते थे, जिसकी ठीक व्यव- [सरदारों को न्याय सम्बन्धी अधिकार मिलना] स्था न थी। ठिकानेदारों के किये हुए फ़ैसलों की अपील सुनने का भी कोई साधन न था, जिससे वहां की प्रजा बहुधा न्याय से वंचित रहती थी। वि० सं० १६५१ (ई० स० १८६४) में महारावत ने न्याय-विभाग का कार्य व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए अपने राज्य के प्रथम वर्ग- धमोतर, झांतला, वरडिया, रायपुर, कल्याणपुर, आंवीरामा, अचलावदा, अरणोद और सालिमगढ़—के सरदारों के दीवानी तथा फ़ौजदारी अधि- कार निर्दिष्ट कर निम्नलिखित शर्तें स्थिर कीं- (१) अपने पट्टे के अन्दर आसामियों के दीवानी मुक़दमों में तुमको अख्तियार समाअत तो तादाद बेहद तक का होगा, मगर अख्तियार एक हज़ार तक के दावे के फ़ैसले का ही होगा और इससे अधिक तादाद के सब मुक़दमे, मिसल की तरतीब और तकमील होने के बाद मय अपनी राय के अदालत सदर दीवानी में आख़िरी फ़ैसले के वास्ते तुमको बाज़ाब्ते चालान करने होंगे। उनमें से जो मुक़दमे अदालत सदर दीवानी के द्वारा फ़ैसला करने लायक़ होंगे, उनको तो अदालत मौसूफ़ खुद फ़ैसल करेगी और जो उसके अख्तियार के बाहर होंगे, उनको वो अपनी तजवीज़ के साथ आख़िरी फ़ैसले के वास्ते राजेश्री महकमा खास में भेजेगी। (२) हर क़िस्म के फ़ौजदारी मुक़दमे के समाअत करने का ४१
३२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास अख्तियार तो तुमको होगा, मगर फ़ैसला करने का अख्तियार सिर्फ़ उन जुर्मों के मुक़दमों का ही होगा, जिनकी सज़ा छः महीने क़ैद और तीन सौ रुपये जुरमाना तक है और इससे अधिक सज़ा के सब मुक़दमे तर- तीब और तकमील मिसल होने के बाद मय अपनी राय के फ़ैसले के वास्ते तुमको वाज़ाब्ते अदालत सदर फ़ौजदारी में चालान करने होंगे। उनमें से जो मुक़दमे अदालत सदर फ़ौजदारी-द्वारा फ़ैसला करने के होंगे, उनको तो अदालत मौसूफ़ खुद फ़ैसल करेगी और जो उसके अधिकार के बाहर होंगे, उनको वो अपनी तजवीज़ के साथ आख़िरी फ़ैसले के वास्ते राजेश्री महकमा खास में भेजेगी। ( ३ ) जिन फ़ौजदारी मुक़दमों में मुद्दई खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी दूसरी रियासत का होगा और मुद्दालह तुम्हारे पट्टे का होगा या कोई मुजरिम खालसे या किसी दूसरी जागीर या किसी रियासत गैर का तुम्हारे पट्टे में कहीं पनाह लेगा तो ऐसे मुक़दमे ज़िले के हाकिम की अदालत में दायर होंगे और माल तथा मुजरिम तुमको अदालत मौसूफ़ के सुपुर्द करने होंगे। ( ४ ) जिन दीवानी मुक़दमों में मुद्दई तो खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी रियासत गैर का होगा और मुद्दालह तुम्हारे पट्टे का आसामी होगा वे ज़िला हाकिम की अदालत में दायर होंगे। ( ५ ) जिन दीवानी व फ़ौजदारी मुक़दमों में मुद्दई तो तुम्हारे पट्टे का होगा और मुद्दालह खालसे या किसी दूसरी जागीर अथवा किसी रियासत गैर का होगा वे ज़िले की अदालत में दायर होंगे। ( ६ ) जिन दीवानी या फ़ौजदारी मुक़दमों में तुम खुद मुद्दई या मुद्दालह होंगे, उनके सुनने और फ़ैसला करने का अख्तियार तुमको न होगा, बल्कि ऐसे मुक़दमे श्रीदरवार की अदालत में दायर और फ़ैसल होंगे। ( ७ ) जिन दीवानी या फ़ौजदारी मुक़दमों के फ़ैसल करने का अख्तियार तुमको क़लम' एक व दो में दिया गया है, उनमें तुम्हारी
महारावत रघुनाथसिंह ३२३ तजवीज़ के ख़िलाफ़ अपील सदर दीवानी व फ़ौजदारी अदालत में होगी और उनके फ़ैसले की अपील राजेश्री महक्मा खास में होगी । ( ८ ) जो दीवानी व फ़ौजदारी मुक़दमे तुम्हारे अख्तियार से बाहर हैं, उनकी जो तजवीज़ अदालत ज़िला करेगी उनके ख़िलाफ़ अपील अदालत सदर में होगी । उनकी तजवीज़ की अपील राजेश्री महक्मा खास में होगी । ( ६ ) जो दीवानी मुक़दमे अपने पट्टे के आसामियों के, हस्ब मंशा क़लम एक तुम फ़ैसल करोगे, उनकी प्रारम्भिक कार्रवाई अदालत श्री दरवार ने तुमको बख़्शी है । तुम्हारे फ़ैसल किये इन मुक़दमों की अपील की रसूम अदालत तुमको नहीं मिलेगी और उसी तरह बाक़ी और सब क़िस्म के दीवानी मुक़दमों की, जिनको फ़ैसल करने का तुमको हक़ नहीं है, रसूम अदालत भी तुमको नहीं मिलेगी । ( १० ) जो फ़ौजदारी मुक़दमे अपने पट्टे के आसामियों के हस्ब मंशा क़लम दो तुम फ़ैसल करोगे, उनका जुरमाना तो तुमको मिलेगा और जो क़ैद की सज़ा तजवीज़ होगी वह यदि तुम्हारे यहां के जेलखाने का बन्दोवस्त रियासत हाज़ा के क़ायदे के मुताबिक़ होगा तो वहां भुगताई जावेगी, नहीं तो श्रीदरवार के जेलखाने में भुगताई जावेगी और ऐसे क़ैदियों की खुराक वग़ैरा का खर्चा तुमको देना होगा । तुम्हारे फ़ैसल किये हुए इन मुक़दमों की अपील की रसूम अदालत तुमको नहीं मिलेगी और उसी तरह बाक़ी अन्य सब क़िस्म के फ़ौजदारी मुक़दमों का, जिनके फ़ैसल करने के तुम अधिकारी नहीं हो, जुरमाना तुमको नहीं मिलेगा । ( ११ ) रसूम सरकारी याने दस्तावेज़ लिखने के लिए जो स्टांप के काग़ज़ तुम्हारे पट्टे की रियाया ख़रीदेगी, उसकी क़ीमत रियासत हाज़ा के ख़ज़ाने में जमा होगी । ( १२ ) आसामियों की तलबी के लिए किसी अदालत रियासत हाज़ा से माक़ूल मियाद देकर तीन बार लिखे जाने पर भी यदि हुक्म की तामील न होगी, तो आसामियों को तलब करनेवाली अदालत को अधिकार
३२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास होगा कि उनको परभारी तलब या गिरफ़्तार कर लेवे। (१३) जो क़ानून क़ायदे श्रीदरबार की आज्ञानुसार हाल में जारी हुए हैं या भविष्य में तमाम राज देवगढ़-प्रतापगढ़ के लिए बनाकर जारी किये आवेंगे, उनके मुताबिक़ तुमको अपने पट्टे में बखूबी अमल रखना होगा। (१४) तुमको अपने पट्टे की रियाया को आराम देने और इंसाफ़ करने के लिए अदालत और जेलखाने वगैरह का, रियासत हाज़ा के जारी किये हुए क़ानून के मुताबिक़, अच्छा इन्तज़ाम रखना होगा। (१५) अगर तुम अपने पट्टे की रियाया को हर सूरत आराम पहुंचाओगे और इन्साफ़ के साथ कार्यवाही करोगे तथा श्रीदरबार तुम्हारे चाल-चलन, व्यवहार और अच्छे इंतज़ाम से खुश होंगे, तो तुम्हारे अख़्ति- यार और भी बढ़ाये जा सकेंगे। (१६) जो नक्शेज़ात तुम्हारे यहां राजेश्री महक्मा खास से हमेशा भेजे जावेंगे, उनको सही-सही भरकर निश्चित समय पर महक्मा खास में भेजना होगा। (१७) विलायती, मकरानी, बलोची और अरब आदि क़ौम के लोगों को तुम अपने पट्टे में हरगिज़ नहीं रख सकोगे। अगर उनमें से कोई तुम्हारे पट्टे में गिरफ़्तार होकर सरहद पर भेजा जावेगा, तो उसका खर्चा तुमको देना होगा। (१८) मोघिये आदि जरायम पेशा क़ौमें, जो तुम्हारे पट्टे में हों, उनको मोघियों के क़ानून की मंशा के बमूजिब तुमको अपने पट्टे में आबाद करना होगा और इंतज़ाम भी रखना होगा। अगर तुम इंतज़ाम और आबाद न कर सकने की वजह से उनको श्रीदरबार की क़ायम की हुई आबादी में आबाद करने के लिए भेजोगे तो उसका खर्चा वगैरह तुमको देना होगा। (१९) जो संगीन वारदात तुम्हारे पट्टे में कहीं होगी, उसकी इत्तिला अविलम्ब राजेश्री महक्मा खास में तुमको देनी होगी तथा उसकी तहक़ी- क़ात ऐन वक़्त और मौक़े पर करके राजेश्री महक्मा खास को परिणाम
महारावत रघुनाथसिंह ३२५ से सूचित करना होगा और जो हुक्म महक्मा मौसूफ़ से उस बारे में दिया जावेगा उसकी तामील बखूबी करनी होगी। (२०) तुमको अपने ठिकाने की तरफ़ से एक वकील देवगढ़-प्रताप- गढ़ में हमेशा हाज़िर रखना होगा, जो तुम्हारे ठिकाने के ताल्लुक़ का कुल काम हर एक महक्मे और अदालत में हाज़िर रहकर किया करे। (२१) जो आज्ञाएं राजेश्वरी महक्मा ख़ास से समय-समय पर जारी होंगी या जो मुक़दमे श्रीदरबार की अदालतों से फ़ैसल होकर तामील के लिए तुम्हारे यहां भेजे जायेंगे, उनकी तुमको पूरी-पूरी तामील करनी होगी। उसी वर्ष महारावत ने अपने राज्य में स्टांप और कोर्ट फ़ीस के क़ायदे में संशोधन कर उसे जारी किया, जिससे ठिकानों में मनमानी बंद हो गई और ख़ालसे तथा ठिकानों में एक ही प्रकार के क़ायदे चालू हो गये। महारावत ने अपने कामदार पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या का पूरा सम्मान किया। उसको गुरु की उपाधि, ताज़ीम का सम्मान और दो गांव भी प्रदान किये; किन्तु उसने थोड़े ही दिनों पारसी फ्रामजी भीकाजी को बाद महारावत की कृपा खो दी। फिर उस स्थान पुनः कामदार नियत करना पर पारसी फ़्रामजी भीकाजी नियत हुआ, जो पहले इस पद का कार्य कर चुका था। उन्हीं दिनों महारावत ने अपने पुराने कामदार मिर्ज़ा मुहम्मददीबेग की, जिसने भूतपूर्व महारावत उदयसिंह तथा उस (रघुनाथसिंह) के समय अच्छी सेवा की थी, एक हज़ार रुपये वार्षिक पेंशन नियत कर दी। गद्दीनशीनी के पूर्व महारावत की राजकुमारी वल्लभकुंवरी का जन्म हुआ था। महारावत ने उसका संबंध बीकानेर के वर्तमान महाराजा सर राजकुमारी वल्लभकुंवरी का गंगासिंहजी के साथ स्थिर किया। वि० सं० १९५४ महाराजा बीकानेर के साथ आषाढ़ सुदि ६ (ई० स० १८९७ ता० ८ जुलाई) विवाह होना को उक्त राजकुमारी का विवाह उपर्युक्त महाराजा के साथ बड़ी धूमधाम से हुआ। इस विवाह का समग्र व्यय लगभग पांच लाख रुपये के हुआ।
३२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १६५५ मार्गशीर्ष सुदि ५ (ई० स० १८६८ ता० १८ दिसम्बर) को महारावत का अपने जामाता महाराजा सर महारावत का बीकानेर जाना गंगासिंहजी के आग्रहवश बीकानेर जाना हुआ। तथा कामदार पद पर ठाकुर महाराजा साहब के स्नेहपूर्ण व्यवहार और सम्मान रघुवीरसिंह का नियत होना तथा वहां के शासन में जिन सुधारों का आरंभ हुआ था, उनको देखकर महारावत को पूर्ण संतोष हुआ। इन्हीं दिनों उसने शासन-कार्य चलाने के लिए बीकानेर से ठाकुर रघुवीरसिंह को बुलाकर अपने यहां का कामदार नियत किया। उसी वर्ष (वि० सं० १६५५ = ई० स० १८६८ में) महारावत ने अपने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने का निश्चय कर अजमेर के रायबहादुर ⸴| सेठ सोभागमल ढड्ढा को सेठ सोभागमल ढड्ढा की, जिसकी व्यापारी-जगत् ख़ज़ांची बनाना में अच्छी साख थी और ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों में कई स्थानों पर बड़ी-बड़ी दुकानें थीं, अपने यहां दुकान खुलवाई तथा उसको प्रतापगढ़ राज्य का ख़ज़ांची नियत किया। उन्हीं दिनों महारावत ने न्याय-विभाग को सुचारु रूप से चलाने के लिए महक्मा खास से उसका संबंध तोड़ दिया और न्याय सम्बन्धी न्याय-विभाग को पृथक् कर अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च अदालत "राजसभा" राजसभा की स्थापना नियत की, जिसकी दो शाखाएं-एक इजलास करना कामिल और दूसरी इजलास मामूली-बनाई गईं। इस राजसभा के सदस्य सरदारों और कर्मचारियों में से योग्यता का विचारकर महारावत-द्वारा नियुक्त होते थे। इजलास कामिल में उक्त सभा के सदस्यों के साथ महारावत स्वयं बैठकर मुक़द्दमों को सुनता और उन- पर उनकी सम्मति लेकर अपना हुक्म देता था। इजलास मामूली में पेश होनेवाले मामलों का निर्णय स्वयं उक्त सभा के सदस्य कर मंज़ूरी के लिए उन्हें महारावत के पास भेज देते थे। नीचे की अदालतों के फ़ैसले की अपील सुनना और नीचे की अदालतों के फ़ैसले की निगरानी की मंज़ूरी
महारावत रघुनाथसिंह ३२७
देना एवं उनके अधिकार के बाहर के मुक़दमों को तय करना भी उक्त सभा के ही कार्य थे इस प्रकार न्याय-विभाग पृथक् हो जाने से महकमा ख़ास के सुपुर्द शासन संबंधी आर्थिक और प्रबंध विभाग के कार्य ही रह गये। उस समय नीचे की अदालतों के न्याय संबंधी अधिकार निश्चित नहीं हुए थे। इसलिए न्याय संबंधी कार्य को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए महारावत ने वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) में अपने कामदार रघुवीरसिंह की सम्मति के अनुसार नीचे की अदालतों के निम्नलिखित अधिकार स्थिर किये— ( १ ) हाकिम अदालत फ़ौजदारी क्रिमिनल जज कहलावेगा और उसको मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल के अधिकार होंगे। वह दो साल क़ैद, एक हज़ार रुपये जुरमाना और एक दर्जन बेंत तक की सज़ा दे सकेगा। ( २ ) हाकिम अदालत दीवानी सिविल जज कहलावेगा। वह नक़द रुपये के दावे एक हज़ार तक के सुन सकेगा। हक़ के मुक़दमों में एक सौ रुपये के मूल्य के दावे सिविल जज के यहां दायर होंगे। फ़ैसला सिविल जज राजसभा की मंज़ूरी से जारी होगा। ( ३ ) हाकिम ज़िला केवल ढाई सौ रुपये के दावे सुन सकेगा और हक़ के मुक़दमे पच्चीस रुपये तक के उसके पास दायर हो सकेंगे। वह अपने यहां के मुक़दमे सिविल जज के द्वारा राजसभा में भेजेगा और उनकी अपील का हक़ न होगा। ( ४ ) हाकिम ज़िला को तीसरे दर्जे के मजिस्ट्रेट का अख्तियार दिया जाता है। वह एक मास तक क़ैद और पचास रुपये तक जुरमाने की सज़ा अपने अधिकार से दे सकेगा। उसी वर्ष वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६००) में अल्प वर्षा होने से राजपूताने में भयङ्कर अकाल पड़ा और प्रतापगढ़ राज्य में केवल ग्या- संवत् १६५६ का भयङ्कर रह इंच ही वर्षा हुई, जिनसे अन्न और घास की अकाल पैदावारी कम हुई। इस अवसर पर महारावत ने अपने राज्य में मदद के कई कार्य जारी किये,
३२८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जिससे लोगों को बड़ा सहारा मिला। बच्चों और अशक्त क्षुधातुर व्यक्तियों के लिए जगह-जगह खैरातखाने खोले गये और वहां से उनको भोजन मिलने की व्यवस्था हुई। अकाल के समय राज्य ने उदारतापूर्वक लगान माफ़ कर दिया। बाहर से अन्न मंगवाया गया, जिससे लोगों को सस्ते भाव से अन्न मिलने लगा। फिर वर्ष समाप्त होने पर सुवर्षा हुई तब जिन लोगों के पास बीज और बैल न थे, उनको बीज तथा बैल आदि राज्य से दिलाये जाकर कृषि-कर्म में लगाया गया। इस भयङ्कर अकाल के समय महारावत ने लगभग पौने दो लाख रुपये व्यय किये, जिसके लिए अंग्रेज़ सरकार से रुपये कर्ज़ लेने पड़े। इसमें संदेह नहीं कि अकाल के समय महारावत ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की, परंतु ग्रीष्म काल में हैज़े की भयानक व्याधि हुई और वर्षा ऋतु के पीछे ज्वर और पेचिश की व्या- धियां उत्पन्न हो गईं, जिनसे सहस्रों मनुष्य मर गये। इसी प्रकार घास की कमी के कारण सहस्रों पशु मर गये, जिससे राज्य की बड़ी क्षति हुई। गद्दीनशीनी के पूर्व महारावत के दो राजकुमार विद्यमान थे। उनमें से ज्येष्ठ प्रतापसिंह और छोटा मानसिंह था। महारावत के सिंहासनारोहण के समय प्रतापसिंह उत्तराधिकारी माना गया और कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म राजकुमार मानसिंह के नाम पर अरणोद का और उसको अरनोद की ठिकाना रहा। महारावत की गद्दीनशीनी के थोड़े जागीर मिलना ही दिनों बाद (वि० सं० १९५७ द्वितीय भाद्रपद सुदि ५ = ई० स० १८९० ता० १६ सितम्बर को) प्रतापसिंह परलोक सिधारा। इसके लिए राज्य के उत्तराधिकारी पद पर महाराजकुमार मानसिंह स्थिर हुआ फिर वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) शुक्रवार को महारावत की खवास ठिकानेवाली तीसरी महाराणी के उदर से छोटे महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितम्बर) को महारावत ने गोवर्धनसिंह
महारावत रघुनाथसिंह ३२६ को अरणोद की जागीर प्रदान की और उसकी उपाधि "महाराज" हुई । प्रतापगढ़ राज्य का वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) के अकाल से तो छुटकारा ही नहीं हुआ था कि वि० सं० १६५८ ( ई० स० अकाल का पुनः आक्रमण १६०१) में पुनः अकाल के लक्षण दिखाई पड़े । उस वर्ष वर्षा औसत से आधी ही हुई, जिससे पैदावार थोड़ी हुई । राज्य ऋणग्रस्त था तथापि महारावत ने उस समय अपनी स्वाभाविक उदारता में अन्तर न आने दिया । प्रजा के निर्वाह के लिए इमदादी काम और निर्धन तथा अशक्त व्यक्तियों के लिए अन्नक्षेत्र खोले गये, जिससे पका-पकाया भोजन उनको मिलने लगा । बाइस हज़ार रुपये तकावी में बांटे गये और वर्षा होने पर बैल खरीदने तथा बीज बांटने में भी बहुत कुछ सहायता दी गई । उसी वर्ष महाराजा बीकानेर-द्वारा बुलाये जाने पर ठाकुर रघुवीर- ठाकुर रघुवीरसिंह का काम- सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा पेश किया । तब दार-पद से पृथक् होना महारावत ने उसके स्थान में अजमेर के बाबू गौरी- शंकर वर्मा, बार-एट-लॉ को, जो महाराजकुमार मानसिंह का शिक्षक रह चुका था, कामदार नियत किया । उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह की आयु सत्रह वर्ष के ऊपर हो गई थी । उसका विवाह-संबंध खेतड़ी ( जयपुर ) के विद्याप्रेमी नरेश राजा महाराजकुमार मानसिंह का अजीतसिंह शेखावत की विदुषी राजकुमारी चांद- खेतड़ी में विवाह होना कुंवरी (चंद्रकुमारी) के साथ होना स्थिर हुआ था। तद्नुसार वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०३ ) में उक्त राजकुमारी का पाणिग्रहण संस्कार महाराजकुमार मानसिंह के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । इस अवसर पर वहां के स्वामी जयसिंह की आयु केवल १० वर्ष थी तथापि बरात की अभ्यर्थना में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई । महाराजकुमारी और महाराजकुमार के विवाह तथा वि० सं० १६५६ और १६५८ ( ई०स० १८६६-१६०० एवं १६०१-२ ) के अकालों के कारण ४२
३३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का अंग्रेज़ सरकार राज्य ऋणग्रस्त हो गया था, जिसकी महारावत से ऋण लेकर क़र्ज़ चुकाना को बड़ी चिंता थी । महारावत ने राज्य को ऋण- मुक्त करने का संकल्प कर सारे अनावश्यक व्यय रोक दिये और अंग्रेज़ सरकार से चार लाख रुपये क़र्ज़ लेकर फुटकर लेनदारों के फ़ैसले सुविधानुसार करवा दिये, जिससे उनको भी विशेष हानि नहीं हुई और राज्य क़र्ज़दारों के तक़ाज़ों से मुक्त हो गया । सालिमशाही रुपये का भाव वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) के पीछे बहुत गिर गया था । इसके पूर्व उसके तेरह आने कलदार मिल जाते थे । अकाल के समय गल्ला आदि ख़रीदने के लिए सालिमशाही के स्थान में कलदार रुपयों की ज़रूरत रहने से सालिमशाही कलदार का चलन होना रुपये का भाव गिरता गया । यही नहीं, पड़ोसी राज्यों में भी जहां-जहां इस सिक्के का चलन था, वहां इसके स्थान में कल- दार रुपयों का चलन हो गया, जिससे सालिमशाही का मूल्य साढ़े सात आने कलदार तक हो गया । इस प्रकार भाव घट जाने से प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा को प्रत्येक वस्तु महंगी मिलने लगी । निदान महारावत ने भी अपने राज्य में सालिमशाही सिक्के के स्थान में कलदार सिक्का चलाने का विचार कर अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ी आरंभ की । फलस्वरूप दो सौ रुपये सालिमशाही के सौ रुपये कलदार मिलना तय हुआ और डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि राज्यों ने भी इस भाव को स्वीकार किया । वि० सं० १६६० ( ई० स० १६०४ ) में सर्वसाधारण को छः मास के भीतर सालिमशाही रुपये सरकारी ख़जाने में दाख़िल कर उपर्युक्त भाव से कलदार रुपये लेने की आगाही कर दी गई । ई० स० १६०४ ( वि० सं० १६६१ ) के मई मास तक जब सालिमशाही रुपये दाख़िल हो गये तब ता० ३० जून (आषाढ़ वदि ३) से उसका चलन बंद कर दिया गया और लेन-देन में कलदार रुपयों का चलन जारी हुआ । उसी समय से प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये का बनना बंद हुआ और सिक्के बनाने के स्वत्व से राज्य को वंचित होना पड़ा । सिक्के के परिवर्त्तन
महारावत रघुनाथसिंह ३३१ से काश्तकारों को जो हानि हुई, उसकी पूर्ति के लिए लगान में उचित कमी कर दी गई । कलदार का चलन जारी करने में प्रजा को जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति करने के लिए राज्य को लगान आदि में बहुत कुछ कमी करनी पड़ी, जिससे खिराज की रक़म में कमी आय आधी रह गई । अंग्रेज़ सरकार को प्रताप- होकर कलदार रक़म नियत गढ़ राज्य से खिराज के वार्षिक ७२७०० सालिम- होना शाही रुपये मिलते थे । उसके स्थान में वि० सं० १९६१ ( ई० स० १९०४ ) से वार्षिक ३६३५० कलदार रुपये देना स्थिर हुआ, जो नियमित रूप से प्रतापगढ़ राज्य अंग्रेज़ सरकार को देता है । राज्य में पहले नाज-बंटाई के हिसाब से ज़मीन का लगान .लिया जाता था, परंतु इसमें असुविधा अधिक होने से महारावत उदय- ख़ालसे के गांवों की पैमाइश सिंह के समय ख़ालसे के गांवों की साधारण होकर ठेकाबंदी होना रूप से चकबंदी होकर वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में ठेके बांध दिये गये और हासिल में नक़द रक़म लेने की प्रणाली स्थिर हुई; परंतु यह व्यवस्था बहुत दिनों तक न चली । जब सालिमशाही रुपये का भाव बहुत गिर गया और कलदार का चलन आरंभ हुआ तो राज्य ने लगान की रक़म में १/४ कमी कर दी । वि० सं० १९५६ ( ई० स० १९०३ ) में ख़ालसे के गांवों की पैमा- इश करना स्थिर हुआ । उस समय राज्य के खालसे में कुल २३३ गांव थे, जिनमें से केवल ११४ की पैमाइश हुई । उनमें से दो गांव वीरान थे । शेष ११२ गांवों में से २४ दस वर्ष के लिए ठेके पर दिये गये और एक गांव इस्तमरारदारी के तरीक़े पर कर दिया गया । वि० सं० १९६३ ( ई० स० १९०६ ) में लगान में संशोधन होकर आय के अनुसार ८७ गांवों की ठेके की रक़म पन्द्रह वर्ष के लिए नियत कर दी गई । मगरे ज़िले के ११६ गांवों में भीलों की आबादी थी-जिनकी स्थिति ख़राब थी; इसलिए वहां की पैमाइश न होकर दस वर्ष के लिए आय की औसत से उनका
३३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठेका भी बांध दिया गया। इससे राज्य को अनाज के बजाय लगान में नक़द रक़म मिलने लगी और कृषकों को सुविधा भी हो गई। यह सब कार्य- वाही वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) तक समाप्त हो गई। उसी समय शिक्षा के प्रचार के लिए लगान के साथ एक आना प्रति रुपया ख़ालसा के काश्तकारों तथा इस्तमरारदारों से प्राप्त होनेवाली रक़म पर वसूल होना स्थिर हुआ और जागीरदारों तथा पावादारों से वसूल होनेवाली रक़म पर भी शिक्षा प्रचार के लिए आधा आना प्रति रुपया नियत कर दिया गया। अकाल की आपत्ति से प्रतापगढ़ राज्य ने छुटकारा पाया ही नहीं था कि वि० सं० १६६० और १६६१ (ई० स० १६०३-४) में वहां प्लेग प्लेग की भयंकर बीमारी होना का भयंकर प्रकोप हुआ, जिसमें सैकड़ों घर जन- शून्य हो गये। इससे राज्य को बड़ी क्षति हुई, जो कई वर्षों तक पूरी न हो सकी। उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह शासन-कार्य चलाने के योग्य हो गया था। इसलिए वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में महारावत ने महाराजकुमार मानसिंह को शासन के मुख्य-मुख्य अधिकार उक्त महाराजकुमार राज्याधिकार मिलना को सौंप दिये। महाराजकुमार मानसिंह ने अपने पिता से शासनाधिकार पाने के पीछे राज्य में बहुत कुछ सुधार किये, जिससे आर्थिक स्थिति संतोषप्रद होकर राज्य ऋणमुक्त हो गया। उक्त महाराजकुमार के जीवन-संबंधी संक्षिप्त वृत्तांत के साथ उसके द्वारा होनेवाले कार्यों का संक्षेप से उल्लेख करना यहां आवश्यक है— महाराजकुमार मानसिंह का जन्म, महारावत रघुनाथसिंह के प्रताप- गढ़ का स्वामी होने के पूर्व, जब वह अरणोद का स्वामी था, उसकी खवास ठिकाने (अजमेर ज़िला) की राठोड़ राणी उगमकुंवरी के उदर से वि० सं० १६४३ चैत्र सुदि १० (ई० स० १८८६ ता० १३ अप्रेल) को हुआ था। महारावत रघु- नाथसिंह की गद्दीनशीनी के समय उसका ज्येष्ठ कुंवर प्रतापसिंह विद्यमान
महारावत रघुनाथसिंह ३३३
था, इसलिए मानसिंह अरणोद का महाराज माना गया, किन्तु थोड़े ही दिनों बाद प्रतापसिंह काल कवलित हो गया। अतएव मानसिंह भावी उत्तरा- धिकारी के पद पर स्थिर हुआ तथापि बहुत दिनों तक अरणोद की जागीर उसके नाम पर बनी रही। शिशुकाल समाप्त होने पर महारावत रघुनाथसिंह ने महाराजकुमार मानसिंह की शिक्षा की उचित व्यवस्था की। प्रचलित शिक्षा-प्रणाली के अनुसार उसने महाराजकुमार की शिक्षा के लिए अच्छे-अच्छे पंडित और योग्य विद्वानों को रख उसे हिंदी और संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाई। फिर अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई। महाराजकुमार के साथ कुछ सरदारों के लड़के भी रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे, अतएव महारावत ने उनमें विद्यानुराग उत्पन्न करने के लिए 'पिन्हे नोबल्स स्कूल' की स्थापना की। तदनन्तर वि० सं० १६५१ (ई० स० १८६४) में वहां से वह (महाराजकुमार) अजमेर भेजा गया, जहां उसने मेयो कॉलेज में विद्या- ध्ययन कर डिप्लोमा तक की अंग्रेज़ी भाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपने अध्ययनकाल में वह बड़ा होनहार विद्यार्थी माना जाता था। जैसा ऊपर लिखा गया है, वि० सं० १६५६ माघ वदि ५ (ई० स० १६०३ ता० १८ जनवरी) को उक्त महाराजकुमार का विवाह खेतड़ी के विद्याप्रेमी राजा अजीतसिंह१ की विदुषी राजकुमारी और जयसिंह की
(१) खेतड़ी का स्वर्गीय राजा अजीतसिंह राजपूताने के तत्कालीन नरेशों में बड़ा ही विद्याप्रेमी और गुणग्राहक था। हिंदू धर्म की उच्चता को ध्यान में रखते हुए वह सदा उसकी उन्नति में दत्त-चित्त रहता था। उसने प्रसिद्ध स्वामी विवेकानंद के सत्संग से लाभ उठाकर बहुत कुछ ज्ञान-वृद्धि की थी। जैसा वह विद्वान् था, वैसी ही उसकी संतति हुई और उसका पुत्र राजा जयसिंह भी बड़ा सुशील तथा होनहार था। जयसिंह ने अजमेर के मेयो कालेज में रहकर डिप्लोमा तक शिक्षा प्राप्त की थी। शिक्षण-काल में ही दुर्भाग्य से उसको राजयक्ष्मा रोग हो गया और उससे ही वि० सं० १६६६ (ई० स० १६१०) में वह उठती हुई जवानी में स्वर्गवासी हुआ। राजा अजीतसिंह की ज्येष्ठ राजकुमारी सूर्यकुंवरी शाहपुरा के स्वर्गीय राजाधिराज सर नाहरसिंह के ज्येष्ठ कुंवर उम्मेदसिंहजी (वर्तमान शाहपुराधीश) को ब्याही गई, पर
३३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बहिन चंद्रकुंवरी के साथ संपन्न हुआ। वि० सं० १९६१ माघ वदि ३० (ई० स० १६०५ ता० ४ फ़रवरी) को कुंवरराणी शेखावत के उदर से पुत्र भी उत्पन्न हुआ; किन्तु वह थोड़े ही समय पीछे कालकवलित हो गया। फिर महा- रावत ने महाराजकुमार की शिक्षा समाप्त होने के पीछे उससे शासन-कार्य में योग लेना आरंभ किया और प्रारम्भ में शिक्षा, म्युनिसिपैलिटी, माफ़ी तथा भीतरी सीमा सम्बन्धी निर्णय के कार्य उसको सौंपे गये, जिनका उसने योग्यतापूर्वक सम्पादन किया। शासन संबंधी उपर्युक्त अधिकार पाकर महाराजकुमार ने मनोयोग- पूर्वक उत्तरदायित्व का पालन किया और प्रत्येक कार्य में तत्परता दिख- लाई, जिससे महारावत को उसकी योग्यता का विश्वास हो गया। इसपर महारावत ने अपना पिछला समय ईश्वर भक्ति में लगाने का विचार कर राज्य के कुछ मुख्य अधिकार अपने हाथ में रखकर बाक़ी सारा राज्य- कार्य वि० सं० १९६२ (ई० स० १९०५) में महाराजकुमार को सौंप दिया। उस समय राज्य ऋण-ग्रस्त था। महारावत के पुराने विचार का प्रेमी होने से राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरने न पाई, इस- लिए महाराजकुमार ने शासनाधिकार मिलते ही राज्य को ऋण-मुक्त करने और सालिमशाही सिक्के के परिवर्त्तन से आर्थिक स्थिति गिर रही थी, उसको सुधारने का दृढ़ संकल्प किया। खालसा के गांवों की पैमाइश का कार्य पूरा हो जाने पर लगान निश्चित कर दिया गया। इस ठेकेबंदी की योजना में शिक्षा-वृद्धि की भी पूरी गुंजाइश रखी गई थी, इस- उसका भी असमय देहांत हो गया। उसका अमर स्मारक "सूर्यकुमारी ग्रंथमाला" है, जो काशी की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित होती है। अजीतसिंह की दूसरी राजकुमारी चांदकुंवरी विदुषी, कुशाग्रबुद्धि, सुशील, विनम्र और धर्मपरायण महिला हैं। प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा उसके वात्सल्य प्रेम की सराहना करती है। उसकी कोख से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी बहादुर का जन्म हुआ है, जो अपनी पूजनीय माता के पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए शासन-कार्य चलाते हैं और गंभीर विषयों में सदा राजमाता से परामर्श लेते हैं।
लिए गांवों में कई जगह शिक्षणालय खोले गये । राजधानी की पाठशाला में अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा देने का भी आयोजन किया गया तथा पिन्हे नोबल्स स्कूल का भी कार्य बढ़ाया जाकर उसके लिए छात्रावास बनाने की व्यवस्था हुई । जनता में ज्ञान का विकास करने के लिए प्रतापगढ़ में सरकारी बाग़ के भीतर कर्नल ए० टी० होम की स्मृति में 'होम लाइब्रेरी' स्थापित की गई । स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी कार्यों में भी उस समय समयानुसार उन्नति की गई एवं गमनागमन के मार्ग भी ठीक किये गये । पुलिस के महकमे का संगठन होकर उसमें होनेवाली ख़राबियों को रोका गया और आय-व्यय का बजट प्रतिवर्ष बनाने का सिलसिला भी आरंभ हुआ । वि० सं० १९६५ चैत्र सुदि ११ (ई० स० १९०८ ता० १२ अप्रेल) रविवार को खेतड़ीवाली शेखावत कुंवराणी के उदर से महाराजकुमार के पुत्र राम- सिंहजी का खेतड़ी में जन्म हुआ, जो प्रतापगढ़ के वर्तमान महारावत हैं । लगभग १०० वर्ष के पश्चात् प्रतापगढ़ राज्य में वहां के राजा के पौत्र उत्पन्न होने के शुभ अवसर पर वहां की प्रजा फूली न समाई । महारावत और महाराजकुमार ने इस अवसर पर अपनी स्वाभाविक उदारता में कमी न की। फिर उसी वर्ष महाराजकुमार ने काश्मीर की यात्रा की, जहां के तत्का- लीन नरेश महाराजा सर प्रतापसिंह ने उसका बड़ा सम्मान किया और उससे उसकी कई मुलाक़ाते हुईं । तदनन्तर वह वहां की मनोहर छुटा और दर्शनीय स्थानों का अवलोकन कर प्रतापगढ़ लौटा । इस यात्रा में उक्त महाराजकुमार ने वहां दो शेरों का शिकार भी किया था । इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १९६६ ( ई० स० .१९०६ ) में महा- रावत की दूसरी राजकुमारी राजकुंवरी का विवाह सैलाना ( मध्य भारत ) के स्वर्गीय राजा जसवन्तसिंह के ज्येष्ठ राजकुमार दिलीपसिंहजी ( वर्तमान सैलाना नरेश ) के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । उस समय तक राज्य ऋण-मुक्त नहीं हुआ था तो भी इस विवाह-कार्य में किसी प्रकार की त्रुटि पैदा न हुई ।
३३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० १६६७ आश्विन सुदि ४ (ई० स० १६१० ता० ७ अक्टोबर) को महाराजकुमार की शेखावत कुंवराणी के उदर से महारावत के द्वितीय पौत्र का जन्म हुआ । उस अवसर पर महाराजकुमार की बनाई योजना के अनुसार महारावत ने अपने राज्य के चारण-भाटों, ब्राह्मणों तथा साधुओं से नज़राना लेने की प्रथा उठा दी, परंतु थोड़े ही दिनों बाद उक्त शिशु का देहांत हो गया । उसी वर्ष आश्विन सुदि ६ ( ता० १३ अक्टोबर ) को महाराजकुमार मानसिंह का दूसरा विवाह टेहरी गढ़वाल के पंवार (परमार) राजा कीर्ति- शाह की राजकुमारी भुवनेश्वरीदेवी से हुआ, जिसके उदर से वि० सं० १६६८ श्रावण वदि १४ ( ई० स० १६११ ता० २४ जुलाई ) को राजकुमारी मोहनकुंवरी का जन्म हुआ । वि० सं० १६६७ ( ई० स० १६१०) में सम्राट् एडवर्ड सप्तम का लंदन में देहावसान हो जाने पर प्रिंस जॉर्ज, सम्राट् जॉर्ज पञ्चम के नाम से सिंहासनारूढ़ हुआ । इस उपलक्ष्य में उक्त सम्राट् ने सम्राज्ञी-सहित वि० सं० १६६८ ( ई० स० १६११ ) में भारत आकर दिल्ली नगर में राज्या- भिषेकोत्सव का ता० १२ दिसंबर (पौष वदि ७) को बृहत् दरबार करना निश्चित किया । इस अवसर पर उक्त दरबार में सम्मिलित होने के लिए भारत के समस्त देशी नरेशों और प्रतिष्ठित पुरुषों के नाम तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंज की तरफ़ से निमन्त्रण पत्र भेजे गये । प्रतापगढ़ में भी वाइस- रॉय का निमन्त्रण पत्र पहुंचने पर महारावत की तरफ़ से महाराजकुमार मानसिंह ने कुछ सरदारों-सहित दिल्ली जाकर दरबार में सम्मिलित होने और सम्राट् से साक्षात्कार करने का सम्मान प्राप्त किया तथा वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंज से भी उसकी मुलाक़ात हुई । दिल्ली दरबार में महारावत सम्मिलित नहीं हुआ, तो भी सम्राट् की तरफ़ से इसके उपलक्ष्य में उसको के० सी० आई० ई० (नाइट कमांडर ऑव् दि इंडियन एम्पायर ) की सम्माननीय उपाधि दिये जाने की भारत सरकार की ओर से सूचना प्रकाशित हुई ।
महारावत रघुनाथसिंह ३३७
इसके पीछे वि० सं० १९६६ (ई० स० १९१२) के नवंबर में भारत का वाइसरॉय और गवर्नर-जनरल लॉर्ड हार्डिंज राजपूताने के राज्यों में भ्रमण करता हुआ अजमेर पहुंचा । उसने महारावत को भी वहां आने के लिए निमंत्रित किया । इसपर महाराजकुमार मानसिंह और कुछ सरदारों तथा राजकर्मचारियों के साथ महारावत अजमेर गया । रेल्वे स्टेशन पर अजमेर-मेरवाड़ा के कमिश्नर आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने उसका स्वागत किया । फिर वाइसरॉय के आगमन के समय महारावत रेल्वे स्टेशन पर सरकारी अफ़सरों और रईसों के साथ स्वागत-समारोह में शरीक हुआ । अनन्तर वह महाराजकुमार तथा सरदारों आदि के साथ रेज़िडेंसी हाउस में वाइसरॉय से मुलाक़ात करने गया । वाइसरॉय ने भी वापसी की मुलाक़ात के लिए महारावत के निवास-स्थान बीकानेर हाउस (मेयो कॉलेज, अजमेर) में जाकर महारावत को के० सी० आई० ई० के तमग़े से विभूषित किया । अजमेर में रहते समय महारावत की डूंगरपुर के स्वर्गीय महारावत विजयसिंह और शाहपुरा के राजाधिराज सर नाहर- सिंह से भी मुलाक़ातें हुईं । इस अवसर पर महारावत मेयो कॉलेज के पारितोषिक-वितरणोत्सव, किंग एडवर्ड मेमोरियल के शिलान्यासोत्सव, गार्डन पार्टी आदि में भी सम्मिलित हुआ था । उसी वर्ष महाराजकुमार मानसिंह का तृतीय विवाह ध्रांगधरा- (काठियावाड़) के स्वर्गीय महाराजराणा अजीतसिंह की राजकुमारी और वर्तमान महाराजराणा घनश्यामसिंहजी की बहिन मयाकुंवरीबा से हुआ । महारावत को राज्यासन पर बैठे हुए वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) के मई मास में चौबीस वर्ष समाप्त होकर पच्चीसवां आरंभ हुआ । महाराजकुमार के आग्रह से इस अवसर पर वहां रौप्य जयंती मनाना स्थिर होकर ता० १२ मई (वि० सं० १९७१ ज्येष्ठ वदि ३) को दरबार हुआ, जिसमें महारावत के समय के उल्लेखनीय कार्यों का वर्णन किया गया । उस समय महारावत ने कितने ही व्यक्तियों की तनख्वाहों तथा जागीरों में वृद्धि ४३