राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जिससे लोगों को बड़ा सहारा मिला। बच्चों और अशक्त क्षुधातुर व्यक्तियों के लिए जगह-जगह खैरातखाने खोले गये और वहां से उनको भोजन मिलने की व्यवस्था हुई। अकाल के समय राज्य ने उदारतापूर्वक लगान माफ़ कर दिया। बाहर से अन्न मंगवाया गया, जिससे लोगों को सस्ते भाव से अन्न मिलने लगा। फिर वर्ष समाप्त होने पर सुवर्षा हुई तब जिन लोगों के पास बीज और बैल न थे, उनको बीज तथा बैल आदि राज्य से दिलाये जाकर कृषि-कर्म में लगाया गया। इस भयङ्कर अकाल के समय महारावत ने लगभग पौने दो लाख रुपये व्यय किये, जिसके लिए अंग्रेज़ सरकार से रुपये कर्ज़ लेने पड़े। इसमें संदेह नहीं कि अकाल के समय महारावत ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की, परंतु ग्रीष्म काल में हैज़े की भयानक व्याधि हुई और वर्षा ऋतु के पीछे ज्वर और पेचिश की व्या- धियां उत्पन्न हो गईं, जिनसे सहस्रों मनुष्य मर गये। इसी प्रकार घास की कमी के कारण सहस्रों पशु मर गये, जिससे राज्य की बड़ी क्षति हुई। गद्दीनशीनी के पूर्व महारावत के दो राजकुमार विद्यमान थे। उनमें से ज्येष्ठ प्रतापसिंह और छोटा मानसिंह था। महारावत के सिंहासनारोहण के समय प्रतापसिंह उत्तराधिकारी माना गया और कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म राजकुमार मानसिंह के नाम पर अरणोद का और उसको अरनोद की ठिकाना रहा। महारावत की गद्दीनशीनी के थोड़े जागीर मिलना ही दिनों बाद (वि० सं० १९५७ द्वितीय भाद्रपद सुदि ५ = ई० स० १८९० ता० १६ सितम्बर को) प्रतापसिंह परलोक सिधारा। इसके लिए राज्य के उत्तराधिकारी पद पर महाराजकुमार मानसिंह स्थिर हुआ फिर वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) शुक्रवार को महारावत की खवास ठिकानेवाली तीसरी महाराणी के उदर से छोटे महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितम्बर) को महारावत ने गोवर्धनसिंह