राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रघुनाथसिंह ३२६ को अरणोद की जागीर प्रदान की और उसकी उपाधि "महाराज" हुई । प्रतापगढ़ राज्य का वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) के अकाल से तो छुटकारा ही नहीं हुआ था कि वि० सं० १६५८ ( ई० स० अकाल का पुनः आक्रमण १६०१) में पुनः अकाल के लक्षण दिखाई पड़े । उस वर्ष वर्षा औसत से आधी ही हुई, जिससे पैदावार थोड़ी हुई । राज्य ऋणग्रस्त था तथापि महारावत ने उस समय अपनी स्वाभाविक उदारता में अन्तर न आने दिया । प्रजा के निर्वाह के लिए इमदादी काम और निर्धन तथा अशक्त व्यक्तियों के लिए अन्नक्षेत्र खोले गये, जिससे पका-पकाया भोजन उनको मिलने लगा । बाइस हज़ार रुपये तकावी में बांटे गये और वर्षा होने पर बैल खरीदने तथा बीज बांटने में भी बहुत कुछ सहायता दी गई । उसी वर्ष महाराजा बीकानेर-द्वारा बुलाये जाने पर ठाकुर रघुवीर- ठाकुर रघुवीरसिंह का काम- सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा पेश किया । तब दार-पद से पृथक् होना महारावत ने उसके स्थान में अजमेर के बाबू गौरी- शंकर वर्मा, बार-एट-लॉ को, जो महाराजकुमार मानसिंह का शिक्षक रह चुका था, कामदार नियत किया । उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह की आयु सत्रह वर्ष के ऊपर हो गई थी । उसका विवाह-संबंध खेतड़ी ( जयपुर ) के विद्याप्रेमी नरेश राजा महाराजकुमार मानसिंह का अजीतसिंह शेखावत की विदुषी राजकुमारी चांद- खेतड़ी में विवाह होना कुंवरी (चंद्रकुमारी) के साथ होना स्थिर हुआ था। तद्नुसार वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०३ ) में उक्त राजकुमारी का पाणिग्रहण संस्कार महाराजकुमार मानसिंह के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । इस अवसर पर वहां के स्वामी जयसिंह की आयु केवल १० वर्ष थी तथापि बरात की अभ्यर्थना में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई । महाराजकुमारी और महाराजकुमार के विवाह तथा वि० सं० १६५६ और १६५८ ( ई०स० १८६६-१६०० एवं १६०१-२ ) के अकालों के कारण ४२