राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का अंग्रेज़ सरकार राज्य ऋणग्रस्त हो गया था, जिसकी महारावत से ऋण लेकर क़र्ज़ चुकाना को बड़ी चिंता थी । महारावत ने राज्य को ऋण- मुक्त करने का संकल्प कर सारे अनावश्यक व्यय रोक दिये और अंग्रेज़ सरकार से चार लाख रुपये क़र्ज़ लेकर फुटकर लेनदारों के फ़ैसले सुविधानुसार करवा दिये, जिससे उनको भी विशेष हानि नहीं हुई और राज्य क़र्ज़दारों के तक़ाज़ों से मुक्त हो गया । सालिमशाही रुपये का भाव वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) के पीछे बहुत गिर गया था । इसके पूर्व उसके तेरह आने कलदार मिल जाते थे । अकाल के समय गल्ला आदि ख़रीदने के लिए सालिमशाही के स्थान में कलदार रुपयों की ज़रूरत रहने से सालिमशाही कलदार का चलन होना रुपये का भाव गिरता गया । यही नहीं, पड़ोसी राज्यों में भी जहां-जहां इस सिक्के का चलन था, वहां इसके स्थान में कल- दार रुपयों का चलन हो गया, जिससे सालिमशाही का मूल्य साढ़े सात आने कलदार तक हो गया । इस प्रकार भाव घट जाने से प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा को प्रत्येक वस्तु महंगी मिलने लगी । निदान महारावत ने भी अपने राज्य में सालिमशाही सिक्के के स्थान में कलदार सिक्का चलाने का विचार कर अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ी आरंभ की । फलस्वरूप दो सौ रुपये सालिमशाही के सौ रुपये कलदार मिलना तय हुआ और डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि राज्यों ने भी इस भाव को स्वीकार किया । वि० सं० १६६० ( ई० स० १६०४ ) में सर्वसाधारण को छः मास के भीतर सालिमशाही रुपये सरकारी ख़जाने में दाख़िल कर उपर्युक्त भाव से कलदार रुपये लेने की आगाही कर दी गई । ई० स० १६०४ ( वि० सं० १६६१ ) के मई मास तक जब सालिमशाही रुपये दाख़िल हो गये तब ता० ३० जून (आषाढ़ वदि ३) से उसका चलन बंद कर दिया गया और लेन-देन में कलदार रुपयों का चलन जारी हुआ । उसी समय से प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये का बनना बंद हुआ और सिक्के बनाने के स्वत्व से राज्य को वंचित होना पड़ा । सिक्के के परिवर्त्तन