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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 534 में से

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महारावत रघुनाथसिंह ३३१ से काश्तकारों को जो हानि हुई, उसकी पूर्ति के लिए लगान में उचित कमी कर दी गई । कलदार का चलन जारी करने में प्रजा को जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति करने के लिए राज्य को लगान आदि में बहुत कुछ कमी करनी पड़ी, जिससे खिराज की रक़म में कमी आय आधी रह गई । अंग्रेज़ सरकार को प्रताप- होकर कलदार रक़म नियत गढ़ राज्य से खिराज के वार्षिक ७२७०० सालिम- होना शाही रुपये मिलते थे । उसके स्थान में वि० सं० १९६१ ( ई० स० १९०४ ) से वार्षिक ३६३५० कलदार रुपये देना स्थिर हुआ, जो नियमित रूप से प्रतापगढ़ राज्य अंग्रेज़ सरकार को देता है । राज्य में पहले नाज-बंटाई के हिसाब से ज़मीन का लगान .लिया जाता था, परंतु इसमें असुविधा अधिक होने से महारावत उदय- ख़ालसे के गांवों की पैमाइश सिंह के समय ख़ालसे के गांवों की साधारण होकर ठेकाबंदी होना रूप से चकबंदी होकर वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में ठेके बांध दिये गये और हासिल में नक़द रक़म लेने की प्रणाली स्थिर हुई; परंतु यह व्यवस्था बहुत दिनों तक न चली । जब सालिमशाही रुपये का भाव बहुत गिर गया और कलदार का चलन आरंभ हुआ तो राज्य ने लगान की रक़म में १/४ कमी कर दी । वि० सं० १९५६ ( ई० स० १९०३ ) में ख़ालसे के गांवों की पैमा- इश करना स्थिर हुआ । उस समय राज्य के खालसे में कुल २३३ गांव थे, जिनमें से केवल ११४ की पैमाइश हुई । उनमें से दो गांव वीरान थे । शेष ११२ गांवों में से २४ दस वर्ष के लिए ठेके पर दिये गये और एक गांव इस्तमरारदारी के तरीक़े पर कर दिया गया । वि० सं० १९६३ ( ई० स० १९०६ ) में लगान में संशोधन होकर आय के अनुसार ८७ गांवों की ठेके की रक़म पन्द्रह वर्ष के लिए नियत कर दी गई । मगरे ज़िले के ११६ गांवों में भीलों की आबादी थी-जिनकी स्थिति ख़राब थी; इसलिए वहां की पैमाइश न होकर दस वर्ष के लिए आय की औसत से उनका