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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठेका भी बांध दिया गया। इससे राज्य को अनाज के बजाय लगान में नक़द रक़म मिलने लगी और कृषकों को सुविधा भी हो गई। यह सब कार्य- वाही वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) तक समाप्त हो गई। उसी समय शिक्षा के प्रचार के लिए लगान के साथ एक आना प्रति रुपया ख़ालसा के काश्तकारों तथा इस्तमरारदारों से प्राप्त होनेवाली रक़म पर वसूल होना स्थिर हुआ और जागीरदारों तथा पावादारों से वसूल होनेवाली रक़म पर भी शिक्षा प्रचार के लिए आधा आना प्रति रुपया नियत कर दिया गया। अकाल की आपत्ति से प्रतापगढ़ राज्य ने छुटकारा पाया ही नहीं था कि वि० सं० १६६० और १६६१ (ई० स० १६०३-४) में वहां प्लेग प्लेग की भयंकर बीमारी होना का भयंकर प्रकोप हुआ, जिसमें सैकड़ों घर जन- शून्य हो गये। इससे राज्य को बड़ी क्षति हुई, जो कई वर्षों तक पूरी न हो सकी। उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह शासन-कार्य चलाने के योग्य हो गया था। इसलिए वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में महारावत ने महाराजकुमार मानसिंह को शासन के मुख्य-मुख्य अधिकार उक्त महाराजकुमार राज्याधिकार मिलना को सौंप दिये। महाराजकुमार मानसिंह ने अपने पिता से शासनाधिकार पाने के पीछे राज्य में बहुत कुछ सुधार किये, जिससे आर्थिक स्थिति संतोषप्रद होकर राज्य ऋणमुक्त हो गया। उक्त महाराजकुमार के जीवन-संबंधी संक्षिप्त वृत्तांत के साथ उसके द्वारा होनेवाले कार्यों का संक्षेप से उल्लेख करना यहां आवश्यक है— महाराजकुमार मानसिंह का जन्म, महारावत रघुनाथसिंह के प्रताप- गढ़ का स्वामी होने के पूर्व, जब वह अरणोद का स्वामी था, उसकी खवास ठिकाने (अजमेर ज़िला) की राठोड़ राणी उगमकुंवरी के उदर से वि० सं० १६४३ चैत्र सुदि १० (ई० स० १८८६ ता० १३ अप्रेल) को हुआ था। महारावत रघु- नाथसिंह की गद्दीनशीनी के समय उसका ज्येष्ठ कुंवर प्रतापसिंह विद्यमान