राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत रघुनाथसिंह ३२६ को अरणोद की जागीर प्रदान की और उसकी उपाधि "महाराज" हुई । प्रतापगढ़ राज्य का वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) के अकाल से तो छुटकारा ही नहीं हुआ था कि वि० सं० १६५८ ( ई० स० अकाल का पुनः आक्रमण १६०१) में पुनः अकाल के लक्षण दिखाई पड़े । उस वर्ष वर्षा औसत से आधी ही हुई, जिससे पैदावार थोड़ी हुई । राज्य ऋणग्रस्त था तथापि महारावत ने उस समय अपनी स्वाभाविक उदारता में अन्तर न आने दिया । प्रजा के निर्वाह के लिए इमदादी काम और निर्धन तथा अशक्त व्यक्तियों के लिए अन्नक्षेत्र खोले गये, जिससे पका-पकाया भोजन उनको मिलने लगा । बाइस हज़ार रुपये तकावी में बांटे गये और वर्षा होने पर बैल खरीदने तथा बीज बांटने में भी बहुत कुछ सहायता दी गई । उसी वर्ष महाराजा बीकानेर-द्वारा बुलाये जाने पर ठाकुर रघुवीर- ठाकुर रघुवीरसिंह का काम- सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा पेश किया । तब दार-पद से पृथक् होना महारावत ने उसके स्थान में अजमेर के बाबू गौरी- शंकर वर्मा, बार-एट-लॉ को, जो महाराजकुमार मानसिंह का शिक्षक रह चुका था, कामदार नियत किया । उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह की आयु सत्रह वर्ष के ऊपर हो गई थी । उसका विवाह-संबंध खेतड़ी ( जयपुर ) के विद्याप्रेमी नरेश राजा महाराजकुमार मानसिंह का अजीतसिंह शेखावत की विदुषी राजकुमारी चांद- खेतड़ी में विवाह होना कुंवरी (चंद्रकुमारी) के साथ होना स्थिर हुआ था। तद्नुसार वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०३ ) में उक्त राजकुमारी का पाणिग्रहण संस्कार महाराजकुमार मानसिंह के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । इस अवसर पर वहां के स्वामी जयसिंह की आयु केवल १० वर्ष थी तथापि बरात की अभ्यर्थना में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई । महाराजकुमारी और महाराजकुमार के विवाह तथा वि० सं० १६५६ और १६५८ ( ई०स० १८६६-१६०० एवं १६०१-२ ) के अकालों के कारण ४२
३३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का अंग्रेज़ सरकार राज्य ऋणग्रस्त हो गया था, जिसकी महारावत से ऋण लेकर क़र्ज़ चुकाना को बड़ी चिंता थी । महारावत ने राज्य को ऋण- मुक्त करने का संकल्प कर सारे अनावश्यक व्यय रोक दिये और अंग्रेज़ सरकार से चार लाख रुपये क़र्ज़ लेकर फुटकर लेनदारों के फ़ैसले सुविधानुसार करवा दिये, जिससे उनको भी विशेष हानि नहीं हुई और राज्य क़र्ज़दारों के तक़ाज़ों से मुक्त हो गया । सालिमशाही रुपये का भाव वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) के पीछे बहुत गिर गया था । इसके पूर्व उसके तेरह आने कलदार मिल जाते थे । अकाल के समय गल्ला आदि ख़रीदने के लिए सालिमशाही के स्थान में कलदार रुपयों की ज़रूरत रहने से सालिमशाही कलदार का चलन होना रुपये का भाव गिरता गया । यही नहीं, पड़ोसी राज्यों में भी जहां-जहां इस सिक्के का चलन था, वहां इसके स्थान में कल- दार रुपयों का चलन हो गया, जिससे सालिमशाही का मूल्य साढ़े सात आने कलदार तक हो गया । इस प्रकार भाव घट जाने से प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा को प्रत्येक वस्तु महंगी मिलने लगी । निदान महारावत ने भी अपने राज्य में सालिमशाही सिक्के के स्थान में कलदार सिक्का चलाने का विचार कर अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ी आरंभ की । फलस्वरूप दो सौ रुपये सालिमशाही के सौ रुपये कलदार मिलना तय हुआ और डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि राज्यों ने भी इस भाव को स्वीकार किया । वि० सं० १६६० ( ई० स० १६०४ ) में सर्वसाधारण को छः मास के भीतर सालिमशाही रुपये सरकारी ख़जाने में दाख़िल कर उपर्युक्त भाव से कलदार रुपये लेने की आगाही कर दी गई । ई० स० १६०४ ( वि० सं० १६६१ ) के मई मास तक जब सालिमशाही रुपये दाख़िल हो गये तब ता० ३० जून (आषाढ़ वदि ३) से उसका चलन बंद कर दिया गया और लेन-देन में कलदार रुपयों का चलन जारी हुआ । उसी समय से प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये का बनना बंद हुआ और सिक्के बनाने के स्वत्व से राज्य को वंचित होना पड़ा । सिक्के के परिवर्त्तन
महारावत रघुनाथसिंह ३३१ से काश्तकारों को जो हानि हुई, उसकी पूर्ति के लिए लगान में उचित कमी कर दी गई । कलदार का चलन जारी करने में प्रजा को जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति करने के लिए राज्य को लगान आदि में बहुत कुछ कमी करनी पड़ी, जिससे खिराज की रक़म में कमी आय आधी रह गई । अंग्रेज़ सरकार को प्रताप- होकर कलदार रक़म नियत गढ़ राज्य से खिराज के वार्षिक ७२७०० सालिम- होना शाही रुपये मिलते थे । उसके स्थान में वि० सं० १९६१ ( ई० स० १९०४ ) से वार्षिक ३६३५० कलदार रुपये देना स्थिर हुआ, जो नियमित रूप से प्रतापगढ़ राज्य अंग्रेज़ सरकार को देता है । राज्य में पहले नाज-बंटाई के हिसाब से ज़मीन का लगान .लिया जाता था, परंतु इसमें असुविधा अधिक होने से महारावत उदय- ख़ालसे के गांवों की पैमाइश सिंह के समय ख़ालसे के गांवों की साधारण होकर ठेकाबंदी होना रूप से चकबंदी होकर वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में ठेके बांध दिये गये और हासिल में नक़द रक़म लेने की प्रणाली स्थिर हुई; परंतु यह व्यवस्था बहुत दिनों तक न चली । जब सालिमशाही रुपये का भाव बहुत गिर गया और कलदार का चलन आरंभ हुआ तो राज्य ने लगान की रक़म में १/४ कमी कर दी । वि० सं० १९५६ ( ई० स० १९०३ ) में ख़ालसे के गांवों की पैमा- इश करना स्थिर हुआ । उस समय राज्य के खालसे में कुल २३३ गांव थे, जिनमें से केवल ११४ की पैमाइश हुई । उनमें से दो गांव वीरान थे । शेष ११२ गांवों में से २४ दस वर्ष के लिए ठेके पर दिये गये और एक गांव इस्तमरारदारी के तरीक़े पर कर दिया गया । वि० सं० १९६३ ( ई० स० १९०६ ) में लगान में संशोधन होकर आय के अनुसार ८७ गांवों की ठेके की रक़म पन्द्रह वर्ष के लिए नियत कर दी गई । मगरे ज़िले के ११६ गांवों में भीलों की आबादी थी-जिनकी स्थिति ख़राब थी; इसलिए वहां की पैमाइश न होकर दस वर्ष के लिए आय की औसत से उनका
३३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठेका भी बांध दिया गया। इससे राज्य को अनाज के बजाय लगान में नक़द रक़म मिलने लगी और कृषकों को सुविधा भी हो गई। यह सब कार्य- वाही वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) तक समाप्त हो गई। उसी समय शिक्षा के प्रचार के लिए लगान के साथ एक आना प्रति रुपया ख़ालसा के काश्तकारों तथा इस्तमरारदारों से प्राप्त होनेवाली रक़म पर वसूल होना स्थिर हुआ और जागीरदारों तथा पावादारों से वसूल होनेवाली रक़म पर भी शिक्षा प्रचार के लिए आधा आना प्रति रुपया नियत कर दिया गया। अकाल की आपत्ति से प्रतापगढ़ राज्य ने छुटकारा पाया ही नहीं था कि वि० सं० १६६० और १६६१ (ई० स० १६०३-४) में वहां प्लेग प्लेग की भयंकर बीमारी होना का भयंकर प्रकोप हुआ, जिसमें सैकड़ों घर जन- शून्य हो गये। इससे राज्य को बड़ी क्षति हुई, जो कई वर्षों तक पूरी न हो सकी। उन दिनों महाराजकुमार मानसिंह शासन-कार्य चलाने के योग्य हो गया था। इसलिए वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में महारावत ने महाराजकुमार मानसिंह को शासन के मुख्य-मुख्य अधिकार उक्त महाराजकुमार राज्याधिकार मिलना को सौंप दिये। महाराजकुमार मानसिंह ने अपने पिता से शासनाधिकार पाने के पीछे राज्य में बहुत कुछ सुधार किये, जिससे आर्थिक स्थिति संतोषप्रद होकर राज्य ऋणमुक्त हो गया। उक्त महाराजकुमार के जीवन-संबंधी संक्षिप्त वृत्तांत के साथ उसके द्वारा होनेवाले कार्यों का संक्षेप से उल्लेख करना यहां आवश्यक है— महाराजकुमार मानसिंह का जन्म, महारावत रघुनाथसिंह के प्रताप- गढ़ का स्वामी होने के पूर्व, जब वह अरणोद का स्वामी था, उसकी खवास ठिकाने (अजमेर ज़िला) की राठोड़ राणी उगमकुंवरी के उदर से वि० सं० १६४३ चैत्र सुदि १० (ई० स० १८८६ ता० १३ अप्रेल) को हुआ था। महारावत रघु- नाथसिंह की गद्दीनशीनी के समय उसका ज्येष्ठ कुंवर प्रतापसिंह विद्यमान
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था, इसलिए मानसिंह अरणोद का महाराज माना गया, किन्तु थोड़े ही दिनों बाद प्रतापसिंह काल कवलित हो गया। अतएव मानसिंह भावी उत्तरा- धिकारी के पद पर स्थिर हुआ तथापि बहुत दिनों तक अरणोद की जागीर उसके नाम पर बनी रही। शिशुकाल समाप्त होने पर महारावत रघुनाथसिंह ने महाराजकुमार मानसिंह की शिक्षा की उचित व्यवस्था की। प्रचलित शिक्षा-प्रणाली के अनुसार उसने महाराजकुमार की शिक्षा के लिए अच्छे-अच्छे पंडित और योग्य विद्वानों को रख उसे हिंदी और संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाई। फिर अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई। महाराजकुमार के साथ कुछ सरदारों के लड़के भी रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे, अतएव महारावत ने उनमें विद्यानुराग उत्पन्न करने के लिए 'पिन्हे नोबल्स स्कूल' की स्थापना की। तदनन्तर वि० सं० १६५१ (ई० स० १८६४) में वहां से वह (महाराजकुमार) अजमेर भेजा गया, जहां उसने मेयो कॉलेज में विद्या- ध्ययन कर डिप्लोमा तक की अंग्रेज़ी भाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपने अध्ययनकाल में वह बड़ा होनहार विद्यार्थी माना जाता था। जैसा ऊपर लिखा गया है, वि० सं० १६५६ माघ वदि ५ (ई० स० १६०३ ता० १८ जनवरी) को उक्त महाराजकुमार का विवाह खेतड़ी के विद्याप्रेमी राजा अजीतसिंह१ की विदुषी राजकुमारी और जयसिंह की
(१) खेतड़ी का स्वर्गीय राजा अजीतसिंह राजपूताने के तत्कालीन नरेशों में बड़ा ही विद्याप्रेमी और गुणग्राहक था। हिंदू धर्म की उच्चता को ध्यान में रखते हुए वह सदा उसकी उन्नति में दत्त-चित्त रहता था। उसने प्रसिद्ध स्वामी विवेकानंद के सत्संग से लाभ उठाकर बहुत कुछ ज्ञान-वृद्धि की थी। जैसा वह विद्वान् था, वैसी ही उसकी संतति हुई और उसका पुत्र राजा जयसिंह भी बड़ा सुशील तथा होनहार था। जयसिंह ने अजमेर के मेयो कालेज में रहकर डिप्लोमा तक शिक्षा प्राप्त की थी। शिक्षण-काल में ही दुर्भाग्य से उसको राजयक्ष्मा रोग हो गया और उससे ही वि० सं० १६६६ (ई० स० १६१०) में वह उठती हुई जवानी में स्वर्गवासी हुआ। राजा अजीतसिंह की ज्येष्ठ राजकुमारी सूर्यकुंवरी शाहपुरा के स्वर्गीय राजाधिराज सर नाहरसिंह के ज्येष्ठ कुंवर उम्मेदसिंहजी (वर्तमान शाहपुराधीश) को ब्याही गई, पर
३३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बहिन चंद्रकुंवरी के साथ संपन्न हुआ। वि० सं० १९६१ माघ वदि ३० (ई० स० १६०५ ता० ४ फ़रवरी) को कुंवरराणी शेखावत के उदर से पुत्र भी उत्पन्न हुआ; किन्तु वह थोड़े ही समय पीछे कालकवलित हो गया। फिर महा- रावत ने महाराजकुमार की शिक्षा समाप्त होने के पीछे उससे शासन-कार्य में योग लेना आरंभ किया और प्रारम्भ में शिक्षा, म्युनिसिपैलिटी, माफ़ी तथा भीतरी सीमा सम्बन्धी निर्णय के कार्य उसको सौंपे गये, जिनका उसने योग्यतापूर्वक सम्पादन किया। शासन संबंधी उपर्युक्त अधिकार पाकर महाराजकुमार ने मनोयोग- पूर्वक उत्तरदायित्व का पालन किया और प्रत्येक कार्य में तत्परता दिख- लाई, जिससे महारावत को उसकी योग्यता का विश्वास हो गया। इसपर महारावत ने अपना पिछला समय ईश्वर भक्ति में लगाने का विचार कर राज्य के कुछ मुख्य अधिकार अपने हाथ में रखकर बाक़ी सारा राज्य- कार्य वि० सं० १९६२ (ई० स० १९०५) में महाराजकुमार को सौंप दिया। उस समय राज्य ऋण-ग्रस्त था। महारावत के पुराने विचार का प्रेमी होने से राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरने न पाई, इस- लिए महाराजकुमार ने शासनाधिकार मिलते ही राज्य को ऋण-मुक्त करने और सालिमशाही सिक्के के परिवर्त्तन से आर्थिक स्थिति गिर रही थी, उसको सुधारने का दृढ़ संकल्प किया। खालसा के गांवों की पैमाइश का कार्य पूरा हो जाने पर लगान निश्चित कर दिया गया। इस ठेकेबंदी की योजना में शिक्षा-वृद्धि की भी पूरी गुंजाइश रखी गई थी, इस- उसका भी असमय देहांत हो गया। उसका अमर स्मारक "सूर्यकुमारी ग्रंथमाला" है, जो काशी की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित होती है। अजीतसिंह की दूसरी राजकुमारी चांदकुंवरी विदुषी, कुशाग्रबुद्धि, सुशील, विनम्र और धर्मपरायण महिला हैं। प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा उसके वात्सल्य प्रेम की सराहना करती है। उसकी कोख से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी बहादुर का जन्म हुआ है, जो अपनी पूजनीय माता के पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए शासन-कार्य चलाते हैं और गंभीर विषयों में सदा राजमाता से परामर्श लेते हैं।
लिए गांवों में कई जगह शिक्षणालय खोले गये । राजधानी की पाठशाला में अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा देने का भी आयोजन किया गया तथा पिन्हे नोबल्स स्कूल का भी कार्य बढ़ाया जाकर उसके लिए छात्रावास बनाने की व्यवस्था हुई । जनता में ज्ञान का विकास करने के लिए प्रतापगढ़ में सरकारी बाग़ के भीतर कर्नल ए० टी० होम की स्मृति में 'होम लाइब्रेरी' स्थापित की गई । स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी कार्यों में भी उस समय समयानुसार उन्नति की गई एवं गमनागमन के मार्ग भी ठीक किये गये । पुलिस के महकमे का संगठन होकर उसमें होनेवाली ख़राबियों को रोका गया और आय-व्यय का बजट प्रतिवर्ष बनाने का सिलसिला भी आरंभ हुआ । वि० सं० १९६५ चैत्र सुदि ११ (ई० स० १९०८ ता० १२ अप्रेल) रविवार को खेतड़ीवाली शेखावत कुंवराणी के उदर से महाराजकुमार के पुत्र राम- सिंहजी का खेतड़ी में जन्म हुआ, जो प्रतापगढ़ के वर्तमान महारावत हैं । लगभग १०० वर्ष के पश्चात् प्रतापगढ़ राज्य में वहां के राजा के पौत्र उत्पन्न होने के शुभ अवसर पर वहां की प्रजा फूली न समाई । महारावत और महाराजकुमार ने इस अवसर पर अपनी स्वाभाविक उदारता में कमी न की। फिर उसी वर्ष महाराजकुमार ने काश्मीर की यात्रा की, जहां के तत्का- लीन नरेश महाराजा सर प्रतापसिंह ने उसका बड़ा सम्मान किया और उससे उसकी कई मुलाक़ाते हुईं । तदनन्तर वह वहां की मनोहर छुटा और दर्शनीय स्थानों का अवलोकन कर प्रतापगढ़ लौटा । इस यात्रा में उक्त महाराजकुमार ने वहां दो शेरों का शिकार भी किया था । इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १९६६ ( ई० स० .१९०६ ) में महा- रावत की दूसरी राजकुमारी राजकुंवरी का विवाह सैलाना ( मध्य भारत ) के स्वर्गीय राजा जसवन्तसिंह के ज्येष्ठ राजकुमार दिलीपसिंहजी ( वर्तमान सैलाना नरेश ) के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । उस समय तक राज्य ऋण-मुक्त नहीं हुआ था तो भी इस विवाह-कार्य में किसी प्रकार की त्रुटि पैदा न हुई ।
३३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० १६६७ आश्विन सुदि ४ (ई० स० १६१० ता० ७ अक्टोबर) को महाराजकुमार की शेखावत कुंवराणी के उदर से महारावत के द्वितीय पौत्र का जन्म हुआ । उस अवसर पर महाराजकुमार की बनाई योजना के अनुसार महारावत ने अपने राज्य के चारण-भाटों, ब्राह्मणों तथा साधुओं से नज़राना लेने की प्रथा उठा दी, परंतु थोड़े ही दिनों बाद उक्त शिशु का देहांत हो गया । उसी वर्ष आश्विन सुदि ६ ( ता० १३ अक्टोबर ) को महाराजकुमार मानसिंह का दूसरा विवाह टेहरी गढ़वाल के पंवार (परमार) राजा कीर्ति- शाह की राजकुमारी भुवनेश्वरीदेवी से हुआ, जिसके उदर से वि० सं० १६६८ श्रावण वदि १४ ( ई० स० १६११ ता० २४ जुलाई ) को राजकुमारी मोहनकुंवरी का जन्म हुआ । वि० सं० १६६७ ( ई० स० १६१०) में सम्राट् एडवर्ड सप्तम का लंदन में देहावसान हो जाने पर प्रिंस जॉर्ज, सम्राट् जॉर्ज पञ्चम के नाम से सिंहासनारूढ़ हुआ । इस उपलक्ष्य में उक्त सम्राट् ने सम्राज्ञी-सहित वि० सं० १६६८ ( ई० स० १६११ ) में भारत आकर दिल्ली नगर में राज्या- भिषेकोत्सव का ता० १२ दिसंबर (पौष वदि ७) को बृहत् दरबार करना निश्चित किया । इस अवसर पर उक्त दरबार में सम्मिलित होने के लिए भारत के समस्त देशी नरेशों और प्रतिष्ठित पुरुषों के नाम तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंज की तरफ़ से निमन्त्रण पत्र भेजे गये । प्रतापगढ़ में भी वाइस- रॉय का निमन्त्रण पत्र पहुंचने पर महारावत की तरफ़ से महाराजकुमार मानसिंह ने कुछ सरदारों-सहित दिल्ली जाकर दरबार में सम्मिलित होने और सम्राट् से साक्षात्कार करने का सम्मान प्राप्त किया तथा वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंज से भी उसकी मुलाक़ात हुई । दिल्ली दरबार में महारावत सम्मिलित नहीं हुआ, तो भी सम्राट् की तरफ़ से इसके उपलक्ष्य में उसको के० सी० आई० ई० (नाइट कमांडर ऑव् दि इंडियन एम्पायर ) की सम्माननीय उपाधि दिये जाने की भारत सरकार की ओर से सूचना प्रकाशित हुई ।
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इसके पीछे वि० सं० १९६६ (ई० स० १९१२) के नवंबर में भारत का वाइसरॉय और गवर्नर-जनरल लॉर्ड हार्डिंज राजपूताने के राज्यों में भ्रमण करता हुआ अजमेर पहुंचा । उसने महारावत को भी वहां आने के लिए निमंत्रित किया । इसपर महाराजकुमार मानसिंह और कुछ सरदारों तथा राजकर्मचारियों के साथ महारावत अजमेर गया । रेल्वे स्टेशन पर अजमेर-मेरवाड़ा के कमिश्नर आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने उसका स्वागत किया । फिर वाइसरॉय के आगमन के समय महारावत रेल्वे स्टेशन पर सरकारी अफ़सरों और रईसों के साथ स्वागत-समारोह में शरीक हुआ । अनन्तर वह महाराजकुमार तथा सरदारों आदि के साथ रेज़िडेंसी हाउस में वाइसरॉय से मुलाक़ात करने गया । वाइसरॉय ने भी वापसी की मुलाक़ात के लिए महारावत के निवास-स्थान बीकानेर हाउस (मेयो कॉलेज, अजमेर) में जाकर महारावत को के० सी० आई० ई० के तमग़े से विभूषित किया । अजमेर में रहते समय महारावत की डूंगरपुर के स्वर्गीय महारावत विजयसिंह और शाहपुरा के राजाधिराज सर नाहर- सिंह से भी मुलाक़ातें हुईं । इस अवसर पर महारावत मेयो कॉलेज के पारितोषिक-वितरणोत्सव, किंग एडवर्ड मेमोरियल के शिलान्यासोत्सव, गार्डन पार्टी आदि में भी सम्मिलित हुआ था । उसी वर्ष महाराजकुमार मानसिंह का तृतीय विवाह ध्रांगधरा- (काठियावाड़) के स्वर्गीय महाराजराणा अजीतसिंह की राजकुमारी और वर्तमान महाराजराणा घनश्यामसिंहजी की बहिन मयाकुंवरीबा से हुआ । महारावत को राज्यासन पर बैठे हुए वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) के मई मास में चौबीस वर्ष समाप्त होकर पच्चीसवां आरंभ हुआ । महाराजकुमार के आग्रह से इस अवसर पर वहां रौप्य जयंती मनाना स्थिर होकर ता० १२ मई (वि० सं० १९७१ ज्येष्ठ वदि ३) को दरबार हुआ, जिसमें महारावत के समय के उल्लेखनीय कार्यों का वर्णन किया गया । उस समय महारावत ने कितने ही व्यक्तियों की तनख्वाहों तथा जागीरों में वृद्धि ४३
३३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
की। घोड़ी-सागथली के ठाकुर बलवंतसिंह के खिराज में कमी की गई तथा नागदी के ठाकुर बख्तावरसिंह, देवद के ठाकुर भोमसिंह और सेलारपुरा के ठाकुर गंभीरसिंह को ताज़ीम तथा पैर में स्वर्ण का कड़ा पहनने का सम्मान दिया गया। राज्य में निःशुल्क शिक्षा देने की आज्ञा होकर प्रजा से ली जानेवाली छोटी-छोटी लागतें माफ़ कर दी गईं। काश्तकारों के बक़ाया साठ हज़ार रुपये माफ़ कर दिये गये। ब्राह्मणों तथा अन्य व्य- क्तियों को, जिन्होंने राज्य की अच्छी सेवा की थी, ज़मीन आदि दी जाकर कई व्यक्तियों को सिरोपाव आदि दिये गये। इस अवसर पर उसने अपने छोटे राजकुमार अखोद के महाराज गोवर्धनसिंह को चंवर रखने का सम्मान प्रदान किया। उन्हीं दिनों वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) में यूरोप में महा- समर छिड़ गया। अंग्रेज़-सरकार ने अपने मित्र बेल्जियम और फ्रांस की सरकारों का पक्ष लेकर जर्मनी के विरुद्ध युद्ध-घोषणा की। चार वर्ष तक युद्ध चलता रहा। अंत में जर्मनी की ओर से संधि का प्रस्ताव होने पर युद्ध बन्द हो गया और विजयी होने का श्रेय ब्रिटेन आदि मित्र राज्यों को मिला। इस युद्ध के समय महारावत और महाराजकुमार ने अंग्रेज़ सरकार के प्रति राज-भक्ति प्रकट करते हुए अपने राज्य के समस्त साधन सरकार को प्रदान करने की इच्छा प्रकट की और युद्ध के फंडों तथा युद्ध-ऋण में भी राज्य की ओर से समयानुसार सहायताएं दी गईं। वि० सं० १९७५ (ई० स० १९१८) में भारत में इन्फ़्लुएंज़ा का प्रबल आक्रमण हुआ, जिसमें सहस्रों मनुष्य काल के ग्रास हो गये। यों तो इस राज्य में वि० सं० १९६०-६१ (ई० स० १९०३-५) में प्लेग की बीमारी का वेग रहा था; परंतु उससे भी भयावह इन्फ्लुएंज़ा का प्रकोप रहा, जिससे सैकड़ों व्यक्तियों का प्राणान्त हुआ। तीन सप्ताह तक इस रोग का आक्रमण रहा और स्वयं महाराजकुमार मानसिंह इस रोग से पीड़ित हो गया। बहुत कुछ चिकित्सा कराने पर भी
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उसको कोई लाभ नहीं हुआ और केवल ३२ वर्ष की आयु में वह कार्तिक वदि १० (ई० स० १६१८ ता० २६ अक्टोबर) को परलोक सिधारा। महाराजकुमार मानसिंह, सुशिक्षित, विनम्र, दयालु और गुणग्राही राजकुमार था। कुल-परंपरागत उदारता का भी उसमें पूर्ण रूप से समावेश था। राज्य-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य समझकर अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण रूप से पालन करता था। प्रबंध-कुशल होने के कारण उसने तेरह वर्ष के थोड़े समय में ही प्रतापगढ़ राज्य की बहुत कुछ उन्नति कर राज्य को ऋण-मुक्त कर दिया और वहां की आर्थिक दशा भी सुधार दी। प्रजा के साथ उसका व्यवहार प्रशंसनीय था, जिससे राज्य की आय में वृद्धि होकर आर्थिक दशा दृढ़ हो गई। उसकी कार्य-शैली सुसंगठित थी। वह अपना कार्य नियमित रूप से पूरा करता था। उसकी शासन-प्रणाली से प्रजा को पूरा संतोष था और समय पर न्याय मिलने में कठिनाई न होती थी। अलवर, किशनगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, नरसिंहगढ़, जामनगर, शाहपुरा, ध्रांगधरा, धौलपुर, काश्मीर आदि के नरेशों के साथ उसका मित्रता का व्यवहार था। प्रतापगढ़ के नरेशों का डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों से वैयक्तिक विरोध होने के कारण वैमन- स्य चला आता था, वह उस (महाराजकुमार) ने दूर कर दिया। डूंगरपुर के महारावल विजयसिंह (स्वर्गीय) का प्रथम विवाह वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) में सैलाना के राजा जसवंतसिंह की राजकुमारी देवेन्द्रकुमारी के साथ होने पर वह उक्त महारावल की बारात में सम्मिलित होकर सैलाने गया और इसी प्रकार बांसवाड़ा के वर्त्तमान महारावल सर पृथ्वी- सिंहजी को वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में राज्याधिकार मिलने के अवसर पर जो दरबार हुआ उसमें सम्मिलित होकर उसने उक्त दोनों नरेशों के साथ अपनी मैत्री प्रकट की। उसका स्वभाव सरल और अभिमान-रहित था। अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसका आचरण राज-भक्ति का रहा, जिससे बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफ़सरं उससे मिलकर प्रसन्न होते थे।
३४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रायः देखा गया है कि राज्याधिकार मिल जाने पर परस्पर पिता-पुत्रों में भी वैमनस्य हो जाया करता है, परंतु महाराजकुमार मानसिंह बड़ा पितृ-भक्त रहा और अपने जीवन-काल में उसने इस सम्बन्ध में कभी अन्तर नहीं आने दिया । प्रतापगढ़ राज्य में इस समय जो शासन-व्यव- स्था है उसका अधिकांश श्रेय उक्त महाराजकुमार को ही है और अब तक भी वह उसकी निर्दिष्ट शैली पर स्थिर है । वह यथासाध्य दीन- दुखियों के कष्टों को दूर करता, उनकी प्रार्थनाएं ध्यानपूर्वक सुनता और उन्हें हर तरह से आराम पहुंचाने की चेष्टा करता था । विद्या- व्यसनी होने से उसने कई विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दे अध्ययन के लिए बाहर भेजकर सदा उनको प्रोत्साहन दिया । उसकी मेधा- शक्ति अच्छी थी, जिससे राज्य-संबंधी प्रत्येक बात को वह सरलता से ग्रहण करता और जटिल से जटिल समस्या को भी थोड़े समय में सुलझा देता था । उसका अधिकांश समय राज्य-कार्य में ही व्यतीत होता था और पूर्ण परिश्रमपूर्वक राज-कार्य में योग देता था । प्रतापगढ़ राज्य को इस होनहार राजकुमार से बड़ी-बड़ी आशाएं थीं और उसके द्वारा इस राज्य की अधिक से अधिक उन्नति की संभावना थी; परंतु उसका असमय ही स्वर्गवास हो गया । उसके विचार उदार और गंभीर थे । वह बन्दूक का निशाना लगाने में चतुर, अच्छा घुड़सवार और आखेट एवं घुड़दौड़ का शौकीन था । सनातन धर्म के प्रति उसकी असीम श्रद्धा थी और देहावसान के पूर्व उसकी शैव धर्म की ओर प्रवृत्ति बढ़ गई थी। उसको अपने पूर्वजों का बड़ा अभिमान था और प्रसिद्ध सीसोदिया वंश के गौरव को अक्षुण्ण रखने का वह सदा प्रयत्न करता था । वह व्यवहार-कुशल और दृढ़-प्रतिज्ञ था । उसका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ, शरीर बलिष्ठ और मुखाकृति सुन्दर तथा प्रभावोत्पादक थी । कोई भी व्यक्ति उससे यदि एक बार मिल लेता तो वह उसको न भूलता था और मिलनेवाले व्यक्ति पर उसके सौजन्य का अवश्य प्रभाव पड़ता था ।
महारावत रघुनाथसिंह ३४१ महाराजकुमार के तीन विवाह और दो संतति हुई, जिनका उल्लेख ऊपर आ गया है। उसकी दूसरी कुंवराणी भुवनेश्वरीदेवी का उसके जीवनकाल में ही वि० सं० १६७० श्रावण सुदि ८ (ई० स० १६१३ ता० ६ अगस्त) को देहांत हो गया। उसकी स्मृति में प्रतापगढ़ राजधानी में क़िले के बाहर "श्रीभुवनेश्वरी देवी ज़नाना हास्पिटल" नामक सुन्दर अस्पताल वर्तमान महारावतजी ने बनवा दिया है, जो बड़ा उपयोगी है और जिसके द्वारा उक्त कुंवराणी की कीर्ति दीर्घ काल तक बनी रहेगी। इस समय महाराजकुमार की ज्येष्ठ और तीसरी कुंवराणियां (शेखावत चांद- कुंवरी और झाली मयाकुंवरीश) विद्यमान हैं। उपर्युक्त दोनों महिलाएं अपने पति के समान ही विद्यानुरागिनी हैं। उनके द्वारा दीन-दुखियों और असहाय व्यक्तियों का सदा पोषण होता है। कुंवराणी शेखावत (वर्तमान राजमाता) ने अपने छोटे भाई खेतड़ी के राजा जयसिंह के शिक्षा-गुरु प्रसिद्ध विद्वान् पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए०¹ का असमय देहान्त (१) पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए० सारस्वत ब्राह्मण था। पंजाब की तरफ़ से उसके पूर्वज राजपूताना में जयपुर चले गये और वहां के नरेशों के आश्रय में रहकर संस्कृत भाषा की सेवा करने लगे। उसका पिता शिवराम संस्कृत का योग्य विद्वान् था। वह वहां संस्कृत भाषा का प्रवर्त्तक माना जाता है। वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में पंडित शिवराम के पुत्र पं० चंद्रधर गुलेरी का जन्म हुआ। अपने वंश- गौरव के अनुरूप वह अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत आदि का उत्कृष्ट विद्वान् था। वि० सं० १६५६ (ई० स० १८६६) में मैट्रिक और वि० सं १६६० (ई० स० १६०३) में उसने बी० ए० की परीक्षा सम्मान के साथ पास की। उसकी असाधारण योग्यता, कार्य-दक्षता, सच्चरित्रता एवं शोध की प्रवृत्ति से जयपुर राज्य के उच्चाधिकारियों का उसकी ओर ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने उसको खेतड़ी के अल्पवयस्क राजा जयसिंह (स्वर्गीय) का शिक्षक नियत किया। उसने उक्त प्रतिभावान् राजा का जीवन सुन्दर सांचे में ढाला, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। अनन्तर वह मेयो कॉलेज (अजमेर) के जयपुर हाउस में रहनेवाले छात्रों का निरीक्षक और मोतमिद नियत हुआ। उन्हीं दिनों उसकी योग्यता का अनुभव पाकर मेयो कॉलेज के अधिकारियों ने उसको वहां का हेड पंडित नियत किया। उसकी पाठनशैली, विद्वत्ता, सरलता और सौजन्यता का परिचय पाकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने उससे
३४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हो जाने पर उसकी स्त्री के भरण-पोषण की उचित व्यवस्था कर अपने निजी व्यय से उसके पुत्रों को कई वर्ष तक छात्रवृत्ति प्रदान कर विद्या-प्रेम और गुण-ग्राहकता का परिचय दिया है। इसी प्रकार वह और भी कई व्यक्तियों का पोषण अपने निजी व्यय से करती है। वह बड़ी बुद्धिमती और उदार विचारयुक्त महिला है। उसके द्वारा ही प्रतापगढ़ राज्य में प्राचीन परिपाटियों और राज-रीति का संरक्षण हो रहा है तथा वह सदा महारावतजी को उत्तम सलाह देकर अपना कर्त्तव्य पालन करती है। कुंवराणी झाली मयाकुंवरीबा ने अपने पति की स्मृति को चिर-स्थायी बनाने के लिए प्रतापगढ़ में "मानसिंह कन्या पाठशाला" स्थापित की है और प्रतापगढ़ के क़िले में उसके नाम पर विष्णु का "मान मुरलीधर मंदिर" भी बनवाया है। उक्त मंदिर के व्यय के लिए वर्तमान महारावतजी ने कटकडी गांव भेंट किया है। महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास होने के पीछे राज-कार्य पीछा महारावत को अपने हाथ में लेना पड़ा। उसने महाराजकुमार की महारावत के समय के शासन-नीति में फेर-फार न कर उसी शैली से पिछले उल्लेखनीय शासन-व्यवस्था को स्थिर रखा। उस (महारावत)- कार्य के पिछले दस वर्षों में शिक्षा का क्षेत्र विस्तीर्ण किया गया, न्याय विभागों में अच्छे-अच्छे आदमी नियत कर वहां की त्रुटियां दूर की गईं; माल हासिल और आबपाशी के साधन बढ़ाये गये, जिससे आय में वृद्धि हुई; सीमा सम्बन्धी कई बड़े-बड़े झगड़े तय हुए; तमाम इलाक़े की पट्टेबंदी होकर ज़मीन के लगान में संशोधन किया गया और वि० सं० १९८२ ( ई० स० १९२५ ) में लगान की दर निश्चित हुई, जिससे काश्तकारों के असंतोष में वृद्धि न हुई। हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस की सेवा स्वीकार करने का आग्रह कर उसे वहां बुलवा लिया। वि० सं० १९७९ ( ई० स० १९२२ ) में कुछ दिन ज्वर-ग्रस्त रहकर उसकी ३६ वर्ष की आयु में वहीं मृत्यु हुई। उसके असामयिक निधन से जो हानि हुई है, उसकी पूर्ति होना कठिन है।
महारावत रघुनाथसिंह ३४३ महाराजकुमार को अधिकार मिलने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य के कामदार पद से मन्नालाल माचावत हट गया । तब वह पद तोड़ा जाकर [महारावत का कामदार पद] सुजानमल बांठिया महाराजकुमार का सेक्रेटरी [पर पारसी धनजीशाह को] बनाया गया, जिसको केवल तामीली कार्यवाही [नियुक्त करना] करने का अधिकार था । महाराजकुमार की योजना के अनुसार उसके देहांत के पीछे कुछ वर्ष तक तो इसी प्रकार काम चला, परंतु सेक्रेटरी का पद उत्तरदायित्वपूर्ण न होने से शासन-कार्य को चलाने के लिए पुनः कामदार की नियुक्ति की आव- श्यकता जान पड़ी । निदान वि० सं० १८७८ आषाढ वदि ११ (ई० स० १८२१ ता० १ जुलाई) को पारसी धनजीशाह कामदार नियत हुआ । उसके साथ ही इस पद के नाम में परिवर्त्तन होकर उक्त पदाधिकारी दीवान कहलाने लगा । उसके कार्यकाल में सालिमगढ़ गांव के संबंध में बांस- वाड़ा राज्य के साथ जो सीमा का झगड़ा चल रहा था, उसका संतोष- जनक निपटारा हो गया । वि० सं० १८८१ वैशाख सुदि १० (ई० स० १८२४ ता० १४ मई) को महारावत ने अपने पौत्र रामसिंह (वर्त्तमान महारावत) का विवाह [महारावत के भंवर रामसिंह] सीकर के भूतपूर्व रावराजा माधवसिंह की [का विवाह] राजकुमारी से बड़े समारोहपूर्वक किया । इस अवसर पर बीकानेर-नरेश महाराजा सर गंगा- सिंहजी, सैलाना के राजा दिलीपसिंहजी आदि भी सम्मिलित हुए । उन्हीं दिनों ग्वालियर का परलोकवासी महाराजा सर माधवराव सिंधिया भी देवलिया गया । इसके दो वर्ष पीछे महारावत ने अंग्रेज़ सरकार के साथ वि० सं० [अफ़ीम की खरीद के बारे में] १८८३ (ई० स० १८२६) में एक अहदनामा किया, [अंग्रेज़ सरकार से बात-] जिसके अनुसार प्रतिवर्ष अंग्रेज़ी तोल की ५८० मन [चीत होना] अफ़ीम दस और ग्यारह रुपये प्रति सेर के भाव से लेना अंग्रेज़ सरकार ने तय किया ।
६. महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी युद्ध व चावंड राजधानी
३४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत रघुनाथसिंह का ३६ वर्ष राज्य करने के पश्चात् वि० सं० १६८५ पौष सुदि ८ (ई० स० १६२६ ता० १८ जनवरी) को ७० वर्ष की आयु में निमोनिया की बीमारी से स्वर्गवास हुआ। [महारावत की बीमारी और परलोकवास] वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने सर जेम्स रॉबर्ट्स (देवास सीनियर, मध्य भारत का प्रधान मन्त्री और सिविल सर्जन) जैसे प्रसिद्ध और बड़े-बड़े योग्य डाक्टर तथा वैद्यों को बुलवाकर महारावत की चिकित्सा कराई, परन्तु कुछ लाभ न हुआ और देवलिया के राज-महलों में भगवान रामचंद्र के चित्र की तरफ़ दृष्टि रखते हुए उसका जीवन-दीप बुझ गया। महारावत रघुनाथसिंह के तीन विवाह हुए थे। उनमें से दो अरणोद के महाराज की अवस्था में और एक गद्दीनशीनी के बाद वि० सं० १६४८ फाल्गुन वदि ७ (ई० स० १८९२ ता० ५० मार्च) को हुआ। [महारावत की रानियां और संतति] उसकी इन तीन रानियों में से ज्येष्ठ उगमकुंवरी खवास ठिकाने (अजमेर ज़िला) के राठोड़ ठाकुर महीपालसिंह की पुत्री और शार्दूलसिंह की पौत्री थी, जिसका वि० सं० १६४८ मार्गशीर्ष सुदि ५ (ई० स० १८६१ ता० ६ दिसंबर) को देहावसान हुआ। उक्त महाराणी के उदर से क्रमशः महाराजकुमार प्रतापसिंह, राजकुमारी वल्लभकुंवरी और महाराजकुमार मानसिंह अरणोद में ही उत्पन्न हुए। राज- कुमारी वल्लभकुंवरी का विवाह वर्तमान महाराजा साहब बीकानेर से हुआ, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। उक्त राजकुमारी के उदर से महाराजकुमार शार्दूलसिंह का जन्म हुआ, जो बीकानेर का युवराज है और बहुत शांत- चित्त, गंभीर और होनहार पुरुष है। उक्त राजकुमारी का वि० सं० १६६३ भाद्रपद वदि ३० (ई० स० १६०६ ता० १६ अगस्त) को परलोकवास हो गया। दूसरी महाराणी केसरकुंवरी सेमलिया (मध्य भारत का सैलाना राज्य) के महाराज भवानीसिंह की पुत्री और नाहरसिंह की पौत्री थी। इस राणी का देहांत भी महारावत की विद्यमानता में वि० सं० १६६५ वैशाख वदि १३ (ई० स० १६०८ ता० २८ अप्रेल) मंगलवार को हो गया। उक्त राणी ने
महारावत रघुनाथसिंह . ३४५ देवलिया के राजमहलों के अन्तःपुर में रसिकबिहारी का मंदिर बनवाया। तीसरी राणी ब्रजकुंवरी (ज्येष्ठ राणी उगमकुंवरी की बहिन) से महारावत का विवाह वि० सं० १६४८ फाल्गुन वदि ७ (ई० स० १८४२ ता० २० फ़रवरी) को हुआ, जो अभी विद्यमान है और अपने पति महारावत रघुनाथसिंह के देहावसान के बाद से ही अपने पुत्र महाराज गोवर्धनसिंह के साथ अर- णोद में रहती है। उसके उदर से राजकुमारी राजकुंवरी और गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। विवाह से थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६६८ (ई० स० १६११) में राजकुंवरी का देहांत हो गया। महारावत रघुनाथसिंह के समय में बहुत से लोकोपयोगी कार्य हुए। उसके समय में मौखिक कार्यवाहियों का अन्त होकर व्यवस्थित रूप से शासन-प्रणाली स्थिर हुई। उसके समय में ही वहां महारावत के समय के शिक्षा का विकास हुआ और राजधानी प्रतापगढ़ में लोकोपयोगी कार्य अंग्रेज़ी भाषा की मैट्रिक तक शिक्षा दी जाने लगी। गांवों में भी उसके समय में ही शिक्षालय खुले। राजधानी में बालिकाओं को शिक्षा देने की भी उसके समय में व्यवस्था हुई। संस्कृत भाषा के प्रति अनुराग होने से उसने वि० सं० १६८२ (ई० स० १६२५) में "रघुनाथ संस्कृत पाठशाला" की स्थापना करवाई, जो अब भी ठीक-ठीक चल रही है। इस पाठशाला में वेदांत, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष तथा कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है और साहित्य तथा ज्योतिष में आचार्य तक की उच्च परीक्षा वहां से दिलाई जाती है। क्षत्रिय जाति के उत्थान के लिए उनमें शिक्षा का प्रसार करने का समुचित प्रयत्न किया गया और क्षत्रिय कुमारों के प्रतापगढ़ में रहकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रावास बना दिया गया एवं राज्य में निःशुल्क शिक्षा देने की पद्धति जारी हुई। उसके राज्य के प्रारंभिक समय में वहां वि० सं० १६५० (ई० स० १८६३) के लगभग क्षत्रिय जाति में सामाजिक कुप्रथाओं में सुधार करने के लिए कर्नल सी० के० एम० वाल्टर (एजेंट गवर्नर जेनरल, राजपूताना) के नाम पर "वाल्टर- कृत राजपुत्र-हितकारिणी-सभा" की एक शाखा स्थापित हुई, जिससे ४४
३४६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
क्षत्रिय जाति का हित होकर विवाह तथा गमी के अवसर पर होनेवाला अपव्यय रुक गया। फिर भी अभी इस विषय में बहुत कुछ सुधार 'की गुंजाइश है। प्रतापगढ़ राज्य में चिकित्सालयों का भी उसके समय में ही विस्तार हुआ और प्रतापगढ़ तथा देवलिया में अंग्रेज़ी पद्धति पर चिकित्सा करने के लिए वहां चिकित्सालय के भवन निर्माण किये गये। अंग्रेज़ी औषध ग्रहण न करनेवाले व्यक्तियों की आयुर्वेदोक्त रीति से चिकित्सा कराने के लिए महारावत के नाम पर महाराजकुमार मानसिंह ने "रघुनाथ औषधालय" स्थापित किया। उक्त महाराजकुमार के परलोकवास के पीछे वहां अव्यवस्था होने लगी, इसपर महारावत ने उधर ध्यान देकर उसको सुव्यवस्थित बनाया। उसके समय में रजिस्ट्री, स्टाम्प आदि के क़ानून जारी हुए। गांवों में डाक पहुंचाने की भी उसके समय में सुव्यवस्था हुई। प्रतापगढ़ से मंद- सोर तक सड़क बनवाने के अतिरिक्त गांवों में भी कई जगह के मार्ग ठीक बनवाये गये। पुलिस का भी उसके समय में अच्छा प्रबंध रहा और कई बड़े-बड़े उपद्रवी भील पकड़े गये, जिससे अंग्रेज़-सरकार की उसपर प्रसन्नता रही। महारावत ने देवलिया के पुराने महलों का, जीर्णोद्धार करवाकर वहां कुछ नये महल बनवाये। कई स्थानों पर तालाब, कुएं आदि बनवाने के अतिरिक्त कितने ही नये भवन भी बनवाये गये। भिक्षुकों के लिए महारावत ने अपने यहां सदाव्रत भी जारी किया। उसके समय में प्रतापगढ़ में एक छापाखाना भी खोला गया, जो "रघुनाथ यंत्रालय" के नाम से प्रसिद्ध है। महारावत रघुनाथसिंह शांत, सदाचारी और उदार शासक था। वह अपनी प्रजा से प्रेम करता और प्रजा भी उसको पितृ-तुल्य मानती थी। महारावत का व्यक्तित्व उसकी शासन-शैली प्राचीन होने पर भी उसके विचार उदार थे। वह प्रजा की प्रार्थनाओं को सुनकर उनको सन्तुष्ट करने का सदा प्रयत्न करता था। वह मृदुभाषी, पूर्ण ईश्वर-भक्त, धैर्यवान और कष्ट-सहिष्णु था। सब धर्मों के प्रति
महारावत रघुनाथसिंह. ३४७
उसका समान व्यवहार था । उसका आचरण शुद्ध और चित्त-वृत्ति निष्कपट थी । वह विद्वानों की क़द्र करता तथा उन्हें समय-समय पर पारितोषिक आदि देकर सम्मानित करता था । वह पुराने कर्मचारियों की सलाहों का सदा आदर करता और अपनें राज्य के उच्च पदों पर विशेषतः स्वदेश-वासियों को ही नियुक्त करता था। उनकी सेवाओं को स्मरण कर वह उन्हें सदा प्रोत्साहन देता रहता था, जिससे वे अपने कर्त्तव्य से विमुख न होते थे। अनाथ विधवाओं और बालकों की रक्षा का उसे सदैव ध्यान रहता था । मितव्ययी होने पर भी वह ऐसे कार्यों में अपने राज्य की स्थिति के अनुसार दान देने में संकोच नहीं करता था। उसके उत्तम आचरण से प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर उसकी सज्जनता की छाप जम जाती थी । सामान्य पढ़ा-लिखा होने पर भी विद्या के प्रति उसको अनुराग था। भाषा-काव्य का कुछ ज्ञान होने से वह कभी-कभी स्वयं भी काव्य-रचना किया करता था। चारण और भाट कवियों की कविता सुनने का उसको अनुराग था और वह उनको अपना आश्रय देने में गौरव समझता था । उसको अपने वंश की उच्चता का पूर्ण अभिमान था। निरभिमानी होने से वह किसी से बातचीत करने में संकोच नहीं करता था। राजकीय गंभीर विषयों पर उसको सदा अपने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता था। उसके अधीनस्थ सरदार संतुष्ट थे; क्योंकि वह उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार उनका आदर करता था । वह पुराने ठिकानों को बनाये रखने की परिपाटी को पसंद करता था। इसलिए रायपुर का ठिकाना वहां के ठाकुर रत्नसिंह के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में निःसंतान देहांत होने के पीछे ज़ब्ती के लायक़ होने पर भी महा- रावत ने दूलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को उस (रत्नसिंह) का उत्तराधिकारी निर्वाचित कर अपनी उदारता का परिचय दिया । उसने कई राजपूत सरदारों को जागीर में नये गांव, भूमि आदि देकर, कई को ताज़ीम और स्वर्ण के पाद-भूषण से भी सम्मानित किया एवं कुछ सरदारों का ख़िराज भी कम कर दिया, जिससे उसके दीर्घ शासन-काल में सरदारों
३४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को विरोध करने का अवसर नहीं मिला। वि० सं० १६८० ( ई० स० १६२३) में महारावत के रुग्ण होने पर अजमेर के सुप्रसिद्ध राजवैद्य पंडित रामदयालु शर्मा और उसके दत्तक-पुत्र लोकप्रिय डाक्टर अंबालाल (दाधीच) आयुर्वेदशास्त्री ने सुचारु रूप से चिकित्सा कर महारावत को रोग-मुक्त कर दिया। इसपर महारावत ने उक्त राजवैद्य को पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने का वंशपरंपरा के लिए सम्मान प्रदान किया। इसके कुछ दिनों बाद महारावत के पौत्र भंवर रामसिंह (वर्तमान महारावत) के भी राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होने के आसार दृष्टिगोचर होने पर उसकी चिकित्सा भी उपर्युक्त पिता-पुत्र ने बड़ी लगन के साथ की, जिससे वह सर्वथा रोग-मुक्त हो गया। इसपर प्रसन्न होकर महारावत ने उनको सदा के लिए अपना चिकित्सक नियत कर "राजवैद्य" की पदवी के साथ जागीर में वार्षिक एक सहस्र रुपये कलदार की आय का कीटखेड़ी गांव वंशपरंपरा क लिए वि० सं० १६८२ ( ई० स० १६२६) में प्रदान किया। उसने राजपूत सरदारों के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्तियों को भी उनकी सेवाओं के एवज़ में भूमि तथा गांव पुण्य एवं जागीर में दिये। सेमलखेड़ी गांव उसने देवलिया-स्थित ठाकुर युगलकिशोर और श्रीनाथजी के मंदिरों को भेंट किया। प्रतापगढ़ के नरेशों के पुरोहित आमेटा जाति के ब्राह्मण हैं और वहां इस जाति में दीर्घकाल से संस्कृत भाषा का ज्ञान चला आता है। महा- रावत ने पुरोहित-पद का सम्मान बढ़ाने के लिए अपने पुरोहित रेवाशंकर को ताज़ीम का सम्मान दिया१ और आदित्यगिरि नामक गोसांई को, जो चारण जाति का था और भाषा-काव्य में अच्छी रचना करता था, अपने यहां रखकर आश्रय प्रदान किया। अजमेर में गोशाला बनाने के लिए एक बड़ी (१) प्रतापगढ़ के नरेशों के अधिकतर दानपत्र उपर्युक्त पुरोहित रेवाशङ्कर के यहां से ही प्राप्त हुए हैं, जिससे पाया जाता है कि दीर्घकाल से उसके घर में पुरोहिताई का पद चला आता है। प्रसिद्ध है कि महारावत विक्रमसिंह के मेवाड़ की बड़ी सादड़ी की जागीर छोड़कर देवलिया में निवास करने पर उसके साथ उस (रेवाशङ्कर) के पूर्वज चले गये थे और तब से अब तक बराबर पुरोहिताई का पद उसके कुटुम्ब में ही विद्यमान है।