राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
की। घोड़ी-सागथली के ठाकुर बलवंतसिंह के खिराज में कमी की गई तथा नागदी के ठाकुर बख्तावरसिंह, देवद के ठाकुर भोमसिंह और सेलारपुरा के ठाकुर गंभीरसिंह को ताज़ीम तथा पैर में स्वर्ण का कड़ा पहनने का सम्मान दिया गया। राज्य में निःशुल्क शिक्षा देने की आज्ञा होकर प्रजा से ली जानेवाली छोटी-छोटी लागतें माफ़ कर दी गईं। काश्तकारों के बक़ाया साठ हज़ार रुपये माफ़ कर दिये गये। ब्राह्मणों तथा अन्य व्य- क्तियों को, जिन्होंने राज्य की अच्छी सेवा की थी, ज़मीन आदि दी जाकर कई व्यक्तियों को सिरोपाव आदि दिये गये। इस अवसर पर उसने अपने छोटे राजकुमार अखोद के महाराज गोवर्धनसिंह को चंवर रखने का सम्मान प्रदान किया। उन्हीं दिनों वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) में यूरोप में महा- समर छिड़ गया। अंग्रेज़-सरकार ने अपने मित्र बेल्जियम और फ्रांस की सरकारों का पक्ष लेकर जर्मनी के विरुद्ध युद्ध-घोषणा की। चार वर्ष तक युद्ध चलता रहा। अंत में जर्मनी की ओर से संधि का प्रस्ताव होने पर युद्ध बन्द हो गया और विजयी होने का श्रेय ब्रिटेन आदि मित्र राज्यों को मिला। इस युद्ध के समय महारावत और महाराजकुमार ने अंग्रेज़ सरकार के प्रति राज-भक्ति प्रकट करते हुए अपने राज्य के समस्त साधन सरकार को प्रदान करने की इच्छा प्रकट की और युद्ध के फंडों तथा युद्ध-ऋण में भी राज्य की ओर से समयानुसार सहायताएं दी गईं। वि० सं० १९७५ (ई० स० १९१८) में भारत में इन्फ़्लुएंज़ा का प्रबल आक्रमण हुआ, जिसमें सहस्रों मनुष्य काल के ग्रास हो गये। यों तो इस राज्य में वि० सं० १९६०-६१ (ई० स० १९०३-५) में प्लेग की बीमारी का वेग रहा था; परंतु उससे भी भयावह इन्फ्लुएंज़ा का प्रकोप रहा, जिससे सैकड़ों व्यक्तियों का प्राणान्त हुआ। तीन सप्ताह तक इस रोग का आक्रमण रहा और स्वयं महाराजकुमार मानसिंह इस रोग से पीड़ित हो गया। बहुत कुछ चिकित्सा कराने पर भी