राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रघुनाथसिंह ३३६
उसको कोई लाभ नहीं हुआ और केवल ३२ वर्ष की आयु में वह कार्तिक वदि १० (ई० स० १६१८ ता० २६ अक्टोबर) को परलोक सिधारा। महाराजकुमार मानसिंह, सुशिक्षित, विनम्र, दयालु और गुणग्राही राजकुमार था। कुल-परंपरागत उदारता का भी उसमें पूर्ण रूप से समावेश था। राज्य-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य समझकर अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण रूप से पालन करता था। प्रबंध-कुशल होने के कारण उसने तेरह वर्ष के थोड़े समय में ही प्रतापगढ़ राज्य की बहुत कुछ उन्नति कर राज्य को ऋण-मुक्त कर दिया और वहां की आर्थिक दशा भी सुधार दी। प्रजा के साथ उसका व्यवहार प्रशंसनीय था, जिससे राज्य की आय में वृद्धि होकर आर्थिक दशा दृढ़ हो गई। उसकी कार्य-शैली सुसंगठित थी। वह अपना कार्य नियमित रूप से पूरा करता था। उसकी शासन-प्रणाली से प्रजा को पूरा संतोष था और समय पर न्याय मिलने में कठिनाई न होती थी। अलवर, किशनगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, नरसिंहगढ़, जामनगर, शाहपुरा, ध्रांगधरा, धौलपुर, काश्मीर आदि के नरेशों के साथ उसका मित्रता का व्यवहार था। प्रतापगढ़ के नरेशों का डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों से वैयक्तिक विरोध होने के कारण वैमन- स्य चला आता था, वह उस (महाराजकुमार) ने दूर कर दिया। डूंगरपुर के महारावल विजयसिंह (स्वर्गीय) का प्रथम विवाह वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) में सैलाना के राजा जसवंतसिंह की राजकुमारी देवेन्द्रकुमारी के साथ होने पर वह उक्त महारावल की बारात में सम्मिलित होकर सैलाने गया और इसी प्रकार बांसवाड़ा के वर्त्तमान महारावल सर पृथ्वी- सिंहजी को वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में राज्याधिकार मिलने के अवसर पर जो दरबार हुआ उसमें सम्मिलित होकर उसने उक्त दोनों नरेशों के साथ अपनी मैत्री प्रकट की। उसका स्वभाव सरल और अभिमान-रहित था। अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसका आचरण राज-भक्ति का रहा, जिससे बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफ़सरं उससे मिलकर प्रसन्न होते थे।