राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत रघुनाथसिंह ३३६
उसको कोई लाभ नहीं हुआ और केवल ३२ वर्ष की आयु में वह कार्तिक वदि १० (ई० स० १६१८ ता० २६ अक्टोबर) को परलोक सिधारा। महाराजकुमार मानसिंह, सुशिक्षित, विनम्र, दयालु और गुणग्राही राजकुमार था। कुल-परंपरागत उदारता का भी उसमें पूर्ण रूप से समावेश था। राज्य-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य समझकर अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण रूप से पालन करता था। प्रबंध-कुशल होने के कारण उसने तेरह वर्ष के थोड़े समय में ही प्रतापगढ़ राज्य की बहुत कुछ उन्नति कर राज्य को ऋण-मुक्त कर दिया और वहां की आर्थिक दशा भी सुधार दी। प्रजा के साथ उसका व्यवहार प्रशंसनीय था, जिससे राज्य की आय में वृद्धि होकर आर्थिक दशा दृढ़ हो गई। उसकी कार्य-शैली सुसंगठित थी। वह अपना कार्य नियमित रूप से पूरा करता था। उसकी शासन-प्रणाली से प्रजा को पूरा संतोष था और समय पर न्याय मिलने में कठिनाई न होती थी। अलवर, किशनगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, नरसिंहगढ़, जामनगर, शाहपुरा, ध्रांगधरा, धौलपुर, काश्मीर आदि के नरेशों के साथ उसका मित्रता का व्यवहार था। प्रतापगढ़ के नरेशों का डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों से वैयक्तिक विरोध होने के कारण वैमन- स्य चला आता था, वह उस (महाराजकुमार) ने दूर कर दिया। डूंगरपुर के महारावल विजयसिंह (स्वर्गीय) का प्रथम विवाह वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०७) में सैलाना के राजा जसवंतसिंह की राजकुमारी देवेन्द्रकुमारी के साथ होने पर वह उक्त महारावल की बारात में सम्मिलित होकर सैलाने गया और इसी प्रकार बांसवाड़ा के वर्त्तमान महारावल सर पृथ्वी- सिंहजी को वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में राज्याधिकार मिलने के अवसर पर जो दरबार हुआ उसमें सम्मिलित होकर उसने उक्त दोनों नरेशों के साथ अपनी मैत्री प्रकट की। उसका स्वभाव सरल और अभिमान-रहित था। अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसका आचरण राज-भक्ति का रहा, जिससे बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफ़सरं उससे मिलकर प्रसन्न होते थे।
३४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रायः देखा गया है कि राज्याधिकार मिल जाने पर परस्पर पिता-पुत्रों में भी वैमनस्य हो जाया करता है, परंतु महाराजकुमार मानसिंह बड़ा पितृ-भक्त रहा और अपने जीवन-काल में उसने इस सम्बन्ध में कभी अन्तर नहीं आने दिया । प्रतापगढ़ राज्य में इस समय जो शासन-व्यव- स्था है उसका अधिकांश श्रेय उक्त महाराजकुमार को ही है और अब तक भी वह उसकी निर्दिष्ट शैली पर स्थिर है । वह यथासाध्य दीन- दुखियों के कष्टों को दूर करता, उनकी प्रार्थनाएं ध्यानपूर्वक सुनता और उन्हें हर तरह से आराम पहुंचाने की चेष्टा करता था । विद्या- व्यसनी होने से उसने कई विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दे अध्ययन के लिए बाहर भेजकर सदा उनको प्रोत्साहन दिया । उसकी मेधा- शक्ति अच्छी थी, जिससे राज्य-संबंधी प्रत्येक बात को वह सरलता से ग्रहण करता और जटिल से जटिल समस्या को भी थोड़े समय में सुलझा देता था । उसका अधिकांश समय राज्य-कार्य में ही व्यतीत होता था और पूर्ण परिश्रमपूर्वक राज-कार्य में योग देता था । प्रतापगढ़ राज्य को इस होनहार राजकुमार से बड़ी-बड़ी आशाएं थीं और उसके द्वारा इस राज्य की अधिक से अधिक उन्नति की संभावना थी; परंतु उसका असमय ही स्वर्गवास हो गया । उसके विचार उदार और गंभीर थे । वह बन्दूक का निशाना लगाने में चतुर, अच्छा घुड़सवार और आखेट एवं घुड़दौड़ का शौकीन था । सनातन धर्म के प्रति उसकी असीम श्रद्धा थी और देहावसान के पूर्व उसकी शैव धर्म की ओर प्रवृत्ति बढ़ गई थी। उसको अपने पूर्वजों का बड़ा अभिमान था और प्रसिद्ध सीसोदिया वंश के गौरव को अक्षुण्ण रखने का वह सदा प्रयत्न करता था । वह व्यवहार-कुशल और दृढ़-प्रतिज्ञ था । उसका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ, शरीर बलिष्ठ और मुखाकृति सुन्दर तथा प्रभावोत्पादक थी । कोई भी व्यक्ति उससे यदि एक बार मिल लेता तो वह उसको न भूलता था और मिलनेवाले व्यक्ति पर उसके सौजन्य का अवश्य प्रभाव पड़ता था ।
महारावत रघुनाथसिंह ३४१ महाराजकुमार के तीन विवाह और दो संतति हुई, जिनका उल्लेख ऊपर आ गया है। उसकी दूसरी कुंवराणी भुवनेश्वरीदेवी का उसके जीवनकाल में ही वि० सं० १६७० श्रावण सुदि ८ (ई० स० १६१३ ता० ६ अगस्त) को देहांत हो गया। उसकी स्मृति में प्रतापगढ़ राजधानी में क़िले के बाहर "श्रीभुवनेश्वरी देवी ज़नाना हास्पिटल" नामक सुन्दर अस्पताल वर्तमान महारावतजी ने बनवा दिया है, जो बड़ा उपयोगी है और जिसके द्वारा उक्त कुंवराणी की कीर्ति दीर्घ काल तक बनी रहेगी। इस समय महाराजकुमार की ज्येष्ठ और तीसरी कुंवराणियां (शेखावत चांद- कुंवरी और झाली मयाकुंवरीश) विद्यमान हैं। उपर्युक्त दोनों महिलाएं अपने पति के समान ही विद्यानुरागिनी हैं। उनके द्वारा दीन-दुखियों और असहाय व्यक्तियों का सदा पोषण होता है। कुंवराणी शेखावत (वर्तमान राजमाता) ने अपने छोटे भाई खेतड़ी के राजा जयसिंह के शिक्षा-गुरु प्रसिद्ध विद्वान् पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए०¹ का असमय देहान्त (१) पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए० सारस्वत ब्राह्मण था। पंजाब की तरफ़ से उसके पूर्वज राजपूताना में जयपुर चले गये और वहां के नरेशों के आश्रय में रहकर संस्कृत भाषा की सेवा करने लगे। उसका पिता शिवराम संस्कृत का योग्य विद्वान् था। वह वहां संस्कृत भाषा का प्रवर्त्तक माना जाता है। वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में पंडित शिवराम के पुत्र पं० चंद्रधर गुलेरी का जन्म हुआ। अपने वंश- गौरव के अनुरूप वह अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत आदि का उत्कृष्ट विद्वान् था। वि० सं० १६५६ (ई० स० १८६६) में मैट्रिक और वि० सं १६६० (ई० स० १६०३) में उसने बी० ए० की परीक्षा सम्मान के साथ पास की। उसकी असाधारण योग्यता, कार्य-दक्षता, सच्चरित्रता एवं शोध की प्रवृत्ति से जयपुर राज्य के उच्चाधिकारियों का उसकी ओर ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने उसको खेतड़ी के अल्पवयस्क राजा जयसिंह (स्वर्गीय) का शिक्षक नियत किया। उसने उक्त प्रतिभावान् राजा का जीवन सुन्दर सांचे में ढाला, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। अनन्तर वह मेयो कॉलेज (अजमेर) के जयपुर हाउस में रहनेवाले छात्रों का निरीक्षक और मोतमिद नियत हुआ। उन्हीं दिनों उसकी योग्यता का अनुभव पाकर मेयो कॉलेज के अधिकारियों ने उसको वहां का हेड पंडित नियत किया। उसकी पाठनशैली, विद्वत्ता, सरलता और सौजन्यता का परिचय पाकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने उससे
३४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हो जाने पर उसकी स्त्री के भरण-पोषण की उचित व्यवस्था कर अपने निजी व्यय से उसके पुत्रों को कई वर्ष तक छात्रवृत्ति प्रदान कर विद्या-प्रेम और गुण-ग्राहकता का परिचय दिया है। इसी प्रकार वह और भी कई व्यक्तियों का पोषण अपने निजी व्यय से करती है। वह बड़ी बुद्धिमती और उदार विचारयुक्त महिला है। उसके द्वारा ही प्रतापगढ़ राज्य में प्राचीन परिपाटियों और राज-रीति का संरक्षण हो रहा है तथा वह सदा महारावतजी को उत्तम सलाह देकर अपना कर्त्तव्य पालन करती है। कुंवराणी झाली मयाकुंवरीबा ने अपने पति की स्मृति को चिर-स्थायी बनाने के लिए प्रतापगढ़ में "मानसिंह कन्या पाठशाला" स्थापित की है और प्रतापगढ़ के क़िले में उसके नाम पर विष्णु का "मान मुरलीधर मंदिर" भी बनवाया है। उक्त मंदिर के व्यय के लिए वर्तमान महारावतजी ने कटकडी गांव भेंट किया है। महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास होने के पीछे राज-कार्य पीछा महारावत को अपने हाथ में लेना पड़ा। उसने महाराजकुमार की महारावत के समय के शासन-नीति में फेर-फार न कर उसी शैली से पिछले उल्लेखनीय शासन-व्यवस्था को स्थिर रखा। उस (महारावत)- कार्य के पिछले दस वर्षों में शिक्षा का क्षेत्र विस्तीर्ण किया गया, न्याय विभागों में अच्छे-अच्छे आदमी नियत कर वहां की त्रुटियां दूर की गईं; माल हासिल और आबपाशी के साधन बढ़ाये गये, जिससे आय में वृद्धि हुई; सीमा सम्बन्धी कई बड़े-बड़े झगड़े तय हुए; तमाम इलाक़े की पट्टेबंदी होकर ज़मीन के लगान में संशोधन किया गया और वि० सं० १९८२ ( ई० स० १९२५ ) में लगान की दर निश्चित हुई, जिससे काश्तकारों के असंतोष में वृद्धि न हुई। हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस की सेवा स्वीकार करने का आग्रह कर उसे वहां बुलवा लिया। वि० सं० १९७९ ( ई० स० १९२२ ) में कुछ दिन ज्वर-ग्रस्त रहकर उसकी ३६ वर्ष की आयु में वहीं मृत्यु हुई। उसके असामयिक निधन से जो हानि हुई है, उसकी पूर्ति होना कठिन है।
महारावत रघुनाथसिंह ३४३ महाराजकुमार को अधिकार मिलने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य के कामदार पद से मन्नालाल माचावत हट गया । तब वह पद तोड़ा जाकर [महारावत का कामदार पद] सुजानमल बांठिया महाराजकुमार का सेक्रेटरी [पर पारसी धनजीशाह को] बनाया गया, जिसको केवल तामीली कार्यवाही [नियुक्त करना] करने का अधिकार था । महाराजकुमार की योजना के अनुसार उसके देहांत के पीछे कुछ वर्ष तक तो इसी प्रकार काम चला, परंतु सेक्रेटरी का पद उत्तरदायित्वपूर्ण न होने से शासन-कार्य को चलाने के लिए पुनः कामदार की नियुक्ति की आव- श्यकता जान पड़ी । निदान वि० सं० १८७८ आषाढ वदि ११ (ई० स० १८२१ ता० १ जुलाई) को पारसी धनजीशाह कामदार नियत हुआ । उसके साथ ही इस पद के नाम में परिवर्त्तन होकर उक्त पदाधिकारी दीवान कहलाने लगा । उसके कार्यकाल में सालिमगढ़ गांव के संबंध में बांस- वाड़ा राज्य के साथ जो सीमा का झगड़ा चल रहा था, उसका संतोष- जनक निपटारा हो गया । वि० सं० १८८१ वैशाख सुदि १० (ई० स० १८२४ ता० १४ मई) को महारावत ने अपने पौत्र रामसिंह (वर्त्तमान महारावत) का विवाह [महारावत के भंवर रामसिंह] सीकर के भूतपूर्व रावराजा माधवसिंह की [का विवाह] राजकुमारी से बड़े समारोहपूर्वक किया । इस अवसर पर बीकानेर-नरेश महाराजा सर गंगा- सिंहजी, सैलाना के राजा दिलीपसिंहजी आदि भी सम्मिलित हुए । उन्हीं दिनों ग्वालियर का परलोकवासी महाराजा सर माधवराव सिंधिया भी देवलिया गया । इसके दो वर्ष पीछे महारावत ने अंग्रेज़ सरकार के साथ वि० सं० [अफ़ीम की खरीद के बारे में] १८८३ (ई० स० १८२६) में एक अहदनामा किया, [अंग्रेज़ सरकार से बात-] जिसके अनुसार प्रतिवर्ष अंग्रेज़ी तोल की ५८० मन [चीत होना] अफ़ीम दस और ग्यारह रुपये प्रति सेर के भाव से लेना अंग्रेज़ सरकार ने तय किया ।
६. महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी युद्ध व चावंड राजधानी
३४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत रघुनाथसिंह का ३६ वर्ष राज्य करने के पश्चात् वि० सं० १६८५ पौष सुदि ८ (ई० स० १६२६ ता० १८ जनवरी) को ७० वर्ष की आयु में निमोनिया की बीमारी से स्वर्गवास हुआ। [महारावत की बीमारी और परलोकवास] वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने सर जेम्स रॉबर्ट्स (देवास सीनियर, मध्य भारत का प्रधान मन्त्री और सिविल सर्जन) जैसे प्रसिद्ध और बड़े-बड़े योग्य डाक्टर तथा वैद्यों को बुलवाकर महारावत की चिकित्सा कराई, परन्तु कुछ लाभ न हुआ और देवलिया के राज-महलों में भगवान रामचंद्र के चित्र की तरफ़ दृष्टि रखते हुए उसका जीवन-दीप बुझ गया। महारावत रघुनाथसिंह के तीन विवाह हुए थे। उनमें से दो अरणोद के महाराज की अवस्था में और एक गद्दीनशीनी के बाद वि० सं० १६४८ फाल्गुन वदि ७ (ई० स० १८९२ ता० ५० मार्च) को हुआ। [महारावत की रानियां और संतति] उसकी इन तीन रानियों में से ज्येष्ठ उगमकुंवरी खवास ठिकाने (अजमेर ज़िला) के राठोड़ ठाकुर महीपालसिंह की पुत्री और शार्दूलसिंह की पौत्री थी, जिसका वि० सं० १६४८ मार्गशीर्ष सुदि ५ (ई० स० १८६१ ता० ६ दिसंबर) को देहावसान हुआ। उक्त महाराणी के उदर से क्रमशः महाराजकुमार प्रतापसिंह, राजकुमारी वल्लभकुंवरी और महाराजकुमार मानसिंह अरणोद में ही उत्पन्न हुए। राज- कुमारी वल्लभकुंवरी का विवाह वर्तमान महाराजा साहब बीकानेर से हुआ, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। उक्त राजकुमारी के उदर से महाराजकुमार शार्दूलसिंह का जन्म हुआ, जो बीकानेर का युवराज है और बहुत शांत- चित्त, गंभीर और होनहार पुरुष है। उक्त राजकुमारी का वि० सं० १६६३ भाद्रपद वदि ३० (ई० स० १६०६ ता० १६ अगस्त) को परलोकवास हो गया। दूसरी महाराणी केसरकुंवरी सेमलिया (मध्य भारत का सैलाना राज्य) के महाराज भवानीसिंह की पुत्री और नाहरसिंह की पौत्री थी। इस राणी का देहांत भी महारावत की विद्यमानता में वि० सं० १६६५ वैशाख वदि १३ (ई० स० १६०८ ता० २८ अप्रेल) मंगलवार को हो गया। उक्त राणी ने
महारावत रघुनाथसिंह . ३४५ देवलिया के राजमहलों के अन्तःपुर में रसिकबिहारी का मंदिर बनवाया। तीसरी राणी ब्रजकुंवरी (ज्येष्ठ राणी उगमकुंवरी की बहिन) से महारावत का विवाह वि० सं० १६४८ फाल्गुन वदि ७ (ई० स० १८४२ ता० २० फ़रवरी) को हुआ, जो अभी विद्यमान है और अपने पति महारावत रघुनाथसिंह के देहावसान के बाद से ही अपने पुत्र महाराज गोवर्धनसिंह के साथ अर- णोद में रहती है। उसके उदर से राजकुमारी राजकुंवरी और गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। विवाह से थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६६८ (ई० स० १६११) में राजकुंवरी का देहांत हो गया। महारावत रघुनाथसिंह के समय में बहुत से लोकोपयोगी कार्य हुए। उसके समय में मौखिक कार्यवाहियों का अन्त होकर व्यवस्थित रूप से शासन-प्रणाली स्थिर हुई। उसके समय में ही वहां महारावत के समय के शिक्षा का विकास हुआ और राजधानी प्रतापगढ़ में लोकोपयोगी कार्य अंग्रेज़ी भाषा की मैट्रिक तक शिक्षा दी जाने लगी। गांवों में भी उसके समय में ही शिक्षालय खुले। राजधानी में बालिकाओं को शिक्षा देने की भी उसके समय में व्यवस्था हुई। संस्कृत भाषा के प्रति अनुराग होने से उसने वि० सं० १६८२ (ई० स० १६२५) में "रघुनाथ संस्कृत पाठशाला" की स्थापना करवाई, जो अब भी ठीक-ठीक चल रही है। इस पाठशाला में वेदांत, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष तथा कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है और साहित्य तथा ज्योतिष में आचार्य तक की उच्च परीक्षा वहां से दिलाई जाती है। क्षत्रिय जाति के उत्थान के लिए उनमें शिक्षा का प्रसार करने का समुचित प्रयत्न किया गया और क्षत्रिय कुमारों के प्रतापगढ़ में रहकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रावास बना दिया गया एवं राज्य में निःशुल्क शिक्षा देने की पद्धति जारी हुई। उसके राज्य के प्रारंभिक समय में वहां वि० सं० १६५० (ई० स० १८६३) के लगभग क्षत्रिय जाति में सामाजिक कुप्रथाओं में सुधार करने के लिए कर्नल सी० के० एम० वाल्टर (एजेंट गवर्नर जेनरल, राजपूताना) के नाम पर "वाल्टर- कृत राजपुत्र-हितकारिणी-सभा" की एक शाखा स्थापित हुई, जिससे ४४
३४६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
क्षत्रिय जाति का हित होकर विवाह तथा गमी के अवसर पर होनेवाला अपव्यय रुक गया। फिर भी अभी इस विषय में बहुत कुछ सुधार 'की गुंजाइश है। प्रतापगढ़ राज्य में चिकित्सालयों का भी उसके समय में ही विस्तार हुआ और प्रतापगढ़ तथा देवलिया में अंग्रेज़ी पद्धति पर चिकित्सा करने के लिए वहां चिकित्सालय के भवन निर्माण किये गये। अंग्रेज़ी औषध ग्रहण न करनेवाले व्यक्तियों की आयुर्वेदोक्त रीति से चिकित्सा कराने के लिए महारावत के नाम पर महाराजकुमार मानसिंह ने "रघुनाथ औषधालय" स्थापित किया। उक्त महाराजकुमार के परलोकवास के पीछे वहां अव्यवस्था होने लगी, इसपर महारावत ने उधर ध्यान देकर उसको सुव्यवस्थित बनाया। उसके समय में रजिस्ट्री, स्टाम्प आदि के क़ानून जारी हुए। गांवों में डाक पहुंचाने की भी उसके समय में सुव्यवस्था हुई। प्रतापगढ़ से मंद- सोर तक सड़क बनवाने के अतिरिक्त गांवों में भी कई जगह के मार्ग ठीक बनवाये गये। पुलिस का भी उसके समय में अच्छा प्रबंध रहा और कई बड़े-बड़े उपद्रवी भील पकड़े गये, जिससे अंग्रेज़-सरकार की उसपर प्रसन्नता रही। महारावत ने देवलिया के पुराने महलों का, जीर्णोद्धार करवाकर वहां कुछ नये महल बनवाये। कई स्थानों पर तालाब, कुएं आदि बनवाने के अतिरिक्त कितने ही नये भवन भी बनवाये गये। भिक्षुकों के लिए महारावत ने अपने यहां सदाव्रत भी जारी किया। उसके समय में प्रतापगढ़ में एक छापाखाना भी खोला गया, जो "रघुनाथ यंत्रालय" के नाम से प्रसिद्ध है। महारावत रघुनाथसिंह शांत, सदाचारी और उदार शासक था। वह अपनी प्रजा से प्रेम करता और प्रजा भी उसको पितृ-तुल्य मानती थी। महारावत का व्यक्तित्व उसकी शासन-शैली प्राचीन होने पर भी उसके विचार उदार थे। वह प्रजा की प्रार्थनाओं को सुनकर उनको सन्तुष्ट करने का सदा प्रयत्न करता था। वह मृदुभाषी, पूर्ण ईश्वर-भक्त, धैर्यवान और कष्ट-सहिष्णु था। सब धर्मों के प्रति
महारावत रघुनाथसिंह. ३४७
उसका समान व्यवहार था । उसका आचरण शुद्ध और चित्त-वृत्ति निष्कपट थी । वह विद्वानों की क़द्र करता तथा उन्हें समय-समय पर पारितोषिक आदि देकर सम्मानित करता था । वह पुराने कर्मचारियों की सलाहों का सदा आदर करता और अपनें राज्य के उच्च पदों पर विशेषतः स्वदेश-वासियों को ही नियुक्त करता था। उनकी सेवाओं को स्मरण कर वह उन्हें सदा प्रोत्साहन देता रहता था, जिससे वे अपने कर्त्तव्य से विमुख न होते थे। अनाथ विधवाओं और बालकों की रक्षा का उसे सदैव ध्यान रहता था । मितव्ययी होने पर भी वह ऐसे कार्यों में अपने राज्य की स्थिति के अनुसार दान देने में संकोच नहीं करता था। उसके उत्तम आचरण से प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर उसकी सज्जनता की छाप जम जाती थी । सामान्य पढ़ा-लिखा होने पर भी विद्या के प्रति उसको अनुराग था। भाषा-काव्य का कुछ ज्ञान होने से वह कभी-कभी स्वयं भी काव्य-रचना किया करता था। चारण और भाट कवियों की कविता सुनने का उसको अनुराग था और वह उनको अपना आश्रय देने में गौरव समझता था । उसको अपने वंश की उच्चता का पूर्ण अभिमान था। निरभिमानी होने से वह किसी से बातचीत करने में संकोच नहीं करता था। राजकीय गंभीर विषयों पर उसको सदा अपने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता था। उसके अधीनस्थ सरदार संतुष्ट थे; क्योंकि वह उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार उनका आदर करता था । वह पुराने ठिकानों को बनाये रखने की परिपाटी को पसंद करता था। इसलिए रायपुर का ठिकाना वहां के ठाकुर रत्नसिंह के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में निःसंतान देहांत होने के पीछे ज़ब्ती के लायक़ होने पर भी महा- रावत ने दूलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को उस (रत्नसिंह) का उत्तराधिकारी निर्वाचित कर अपनी उदारता का परिचय दिया । उसने कई राजपूत सरदारों को जागीर में नये गांव, भूमि आदि देकर, कई को ताज़ीम और स्वर्ण के पाद-भूषण से भी सम्मानित किया एवं कुछ सरदारों का ख़िराज भी कम कर दिया, जिससे उसके दीर्घ शासन-काल में सरदारों
३४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को विरोध करने का अवसर नहीं मिला। वि० सं० १६८० ( ई० स० १६२३) में महारावत के रुग्ण होने पर अजमेर के सुप्रसिद्ध राजवैद्य पंडित रामदयालु शर्मा और उसके दत्तक-पुत्र लोकप्रिय डाक्टर अंबालाल (दाधीच) आयुर्वेदशास्त्री ने सुचारु रूप से चिकित्सा कर महारावत को रोग-मुक्त कर दिया। इसपर महारावत ने उक्त राजवैद्य को पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने का वंशपरंपरा के लिए सम्मान प्रदान किया। इसके कुछ दिनों बाद महारावत के पौत्र भंवर रामसिंह (वर्तमान महारावत) के भी राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होने के आसार दृष्टिगोचर होने पर उसकी चिकित्सा भी उपर्युक्त पिता-पुत्र ने बड़ी लगन के साथ की, जिससे वह सर्वथा रोग-मुक्त हो गया। इसपर प्रसन्न होकर महारावत ने उनको सदा के लिए अपना चिकित्सक नियत कर "राजवैद्य" की पदवी के साथ जागीर में वार्षिक एक सहस्र रुपये कलदार की आय का कीटखेड़ी गांव वंशपरंपरा क लिए वि० सं० १६८२ ( ई० स० १६२६) में प्रदान किया। उसने राजपूत सरदारों के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्तियों को भी उनकी सेवाओं के एवज़ में भूमि तथा गांव पुण्य एवं जागीर में दिये। सेमलखेड़ी गांव उसने देवलिया-स्थित ठाकुर युगलकिशोर और श्रीनाथजी के मंदिरों को भेंट किया। प्रतापगढ़ के नरेशों के पुरोहित आमेटा जाति के ब्राह्मण हैं और वहां इस जाति में दीर्घकाल से संस्कृत भाषा का ज्ञान चला आता है। महा- रावत ने पुरोहित-पद का सम्मान बढ़ाने के लिए अपने पुरोहित रेवाशंकर को ताज़ीम का सम्मान दिया१ और आदित्यगिरि नामक गोसांई को, जो चारण जाति का था और भाषा-काव्य में अच्छी रचना करता था, अपने यहां रखकर आश्रय प्रदान किया। अजमेर में गोशाला बनाने के लिए एक बड़ी (१) प्रतापगढ़ के नरेशों के अधिकतर दानपत्र उपर्युक्त पुरोहित रेवाशङ्कर के यहां से ही प्राप्त हुए हैं, जिससे पाया जाता है कि दीर्घकाल से उसके घर में पुरोहिताई का पद चला आता है। प्रसिद्ध है कि महारावत विक्रमसिंह के मेवाड़ की बड़ी सादड़ी की जागीर छोड़कर देवलिया में निवास करने पर उसके साथ उस (रेवाशङ्कर) के पूर्वज चले गये थे और तब से अब तक बराबर पुरोहिताई का पद उसके कुटुम्ब में ही विद्यमान है।
· महारावत रघुनाथसिंह · ३४६ रक़म देकर उसके कुंवर मानसिंह ने भी अच्छी उदारता प्रकट की। भगवान् रामचंद्र का उपासक होने से वि० सं० १६६५ ( ई० स० १६०८ ) में उसने राममंत्र का अनुष्ठान करवाकर एक यज्ञ भी करवाया था। उसके शासन के कुछ वर्षों में राजकुमार और राजकुमारियों के विवाह, सालिमशाही सिक्के का परिवर्त्तन, अकाल तथा व्यापार में कमी होने से प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई थी, किंतु महाराजकुमार ने स्थिति को संभाल लिया। भोले स्वभाव का होने से वह कभी-कभी स्वार्थी पुरुषों के चक्कर में भी पड़ जाया करता था। प्रतापगढ़ राज्य में स्त्री-शिक्षा का प्रचार उसके समय में ही हुआ। संस्कृत भाषा की उन्नति का अभिलाषी होने से अपनी राजकुमारी राजकुंवरी को उसने संस्कृत की शिक्षा दिलवाई तथा इस कार्य के लिए वैष्णव कृष्णदास¹ (आभेटा ब्राह्मण) को नियत किया, जो पूर्ण सदाचारी और निःस्पृह व्यक्ति था। उसका अंग्रेज़-सरकार तथा अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ सदा अच्छा व्यवहार रहा। भारत के कई प्रमुख नरेशों से उसकी मित्रता थी, जो उसका आदर करते थे। विशाल- हृदय होने से अपने सेवकों का अपराध अक्षम्य होने पर भी वह उनको क्षमा कर देता और उनके द्वारा हानि होने पर भी वह उनपर कभी क्रुद्ध न होता तथा छोटे से छोटे व्यक्ति से भी तुच्छता से पेश नहीं आता था। उसका क़द ठिंगना, शरीर पुष्ट, आंखें छोटी, मुंह गोल और उसपर चेचक के कुछ दाग़ थे। ( १ ) वैष्णव कृष्णदास संस्कृत भाषा का अच्छा विद्वान् था। उसने “मयूरेश- मंदार” नामक काव्य की रचना कर उसमें प्रतापगढ़ के नरेशों का बहुत कुछ वर्णन किया है। उसका पुत्र पंडित जगन्नाथ शास्त्री है, जो संस्कृत भाषा और ज्योतिष का उत्कृष्ट विद्वान् है। उसने “हरिभूषणमहाकाव्य” और प्रतापगढ़ के महारावत जसवंतसिंह तथा प्रतापसिंह-रचित दोहों का संग्रह कर अलग-अलग संपादन किया है, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया है। प्रतापगढ़ राज्य के इस इतिहास के लिखने में उक्त राज्य की तरफ़ से जो सामग्री भेजी गई, उसको एकत्रित करने का श्रेय भी जगन्नाथ शास्त्री को ही है।
३५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत सर रामसिंहजी महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० का जन्म वि० सं० १६६५ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १६०८ ता० १२ अप्रेल) रविवार जन्म और गद्दीनशीनी को महाराजकुमार मानसिंह की कुंवराणी शेखावत चांदकुंवरी के उदर से खेतड़ी में हुआ और वि० सं० १६८५ पौष सुदि ८ (ई० स० १६२६ ता० १८ जनवरी) को ये अपने पितामह महारावत रघुनाथसिंह का देहावसान होने पर प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी हुए। बाल्यकाल समाप्त होने पर योग्य पुरुषों के निरीक्षण में इनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई। इसी बीच इनके पिता महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास हो गया तथापि इनके शिक्षा शिक्षण में किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ा और ये वि० सं० १६७६ के मार्गशीर्ष (ई० स० १६१६ नवंबर) मास में उच्च शिक्षा के लिए अजमेर के मेयो कॉलेज में भेजे गये। उस समय इनका शिक्षक मौलवी सय्यद ग़फ़्फ़ार और अभिभावक सी० सी० एच० डुइस नामक अंग्रेज़ बनाये गये, जिनकी देख-रेख में इनको अपनी बुद्धि के विकास का अच्छा अवसर मिला। वि० सं० १६७६ से १६८५ (ई० स० १६१६ से १६२८) तक इन्होंने वहां विद्याध्ययन किया और वहां की सर्वोच्च परीक्षा पोस्ट-डिप्लोमा को पास करने की भी इनकी इच्छा थी, परन्तु अपने पितामह महारावत रघुनाथसिंह का शरीर अस्वस्थ रहने और फिर उसका स्वर्गवास हो जाने के कारण राजकार्य का बोझ आ पड़ने से इन्हें अपना वह विचार छोड़ना पड़ा। प्रखर-बुद्धि और प्रतिभाशाली होने के कारण अपने अध्ययनकाल में ये प्रत्येक कक्षा में सदा प्रथम रहा करते थे, जिससे इनको कई पुरस्कार भी मिले, जिसका श्रेय इनके शिक्षक मिस्टर एफ़० ए० लेस्ली जोन्स आदि को है। सिंहासनासीन होने के समय इनकी आयु इक्कीस वर्ष के ऊपर हो गई थी, अतएव अंग्रेज़ सरकार को उस समय वहां रीजेंसी कौंसिल बनाने
श्रीमान् महारावतजी श्री सर रामसिंहजी बहादुर, के. सी. एस. आई.
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'महारावत रामसिंह ३५१ अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्राप्त होना की आवश्यकता नहीं हुई। फिर अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से राजपूताने का स्थानापन्न एजेंट गवर्नर- जेनरल मिस्टर ए० एन० एल० केटर तथा दक्षिणी राजपूताने का पोलिटिकल एजेन्ट लेफ़्टनेंट कर्नल डी० एम्० फ़ील्ड आदि प्रतापगढ़ गये और वि० सं० १६८६ वैशाख सुदि ६ (ई० स० १६२६ ता० १४ मई) को एक बड़े दरबार में उन्होंने महारावत के सम्मुख वाइस- रॉय लॉर्ड इर्विन का ता० २० मार्च (वि० सं० १६८५ फाल्गुन सुदि १०) का खरीता पढ़ सुनाया एवं उसे गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्रदान की। तदनंतर महारावत ने शासन-कार्य चलाने के लिए मिस्टर एफ० सी० केवेन्टरी नामक अंग्रेज़ मंत्री नियत किया मंत्री-पद पर एफ० सी० केवेन्टरी की नियुक्ति और उसके परामर्श के अनुसार शासन-कार्य चलाने लगे, परन्तु शासन-शैली पूर्व निर्दिष्ट ही रखी। उसी वर्ष मगशीर्ष सुदि १ (ई० स० १६२६ ता० २ दिसम्बर) को इन्होंने अपनी छोटी बहिन राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह सीतामऊ-नरेश राजा सर रामसिंहजी के ज्येष्ठ राजकुमार डॉ० राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह रघुवीरसिंह, एम्० ए०, एल्-एल्० बी०, डी० लिट्०१ के साथ किया। (१) राजपूताना तथा सेंट्रल इंडिया के वर्तमान राजकुमारों में सीतामऊ के सुयोग्य महाराजकुमार डॉ० रघुवीरसिंह का विद्याभिरुचि के कारण सर्वोच्च स्थान है। खोज और अन्वेषण के कार्यों से उसको अत्यन्त अनुराग है और वह निरन्तर इन कार्यों में व्यस्त रहता है। उसने थोड़े ही समय में अपने गंभीर अध्ययन द्वारा साक्षर वर्ग में पूर्ण ख्याति प्राप्त की है। समय-समय पर उसके कई निवन्ध सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रका- शित होते रहते हैं। इतिहास उसका प्रिय विषय है और उसकी रचनाओं में 'मालवा में युगान्तर' नामक पुस्तक वहां के इतिहास पर नूतन प्रकाश डालती है। उसके बृहत् पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य ऐतिहासिक ग्रन्थ, मुग़लकाल के हिंदी, फ़ारसी और उर्दू भाषा के पत्र-पत्रादि विद्यमान हैं, जिनका उसने पूर्ण परिश्रम से और अगाध द्रव्य व्यय कर संग्रह किया है। जयपुर राज्य से प्राप्त मुग़ल-काल के अख़बारों का बृहत् संग्रह भी उसने अपने यहां एकत्रित कर लिया है, जो उस समय के इतिहास के लिए
३५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शासन-सूत्र हाथ में लेने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य में इनके द्वारा कई लोक-हितकारी कार्य हुए। राज्य में शिक्षा की वृद्धि के लिए प्रताप- लोक-हितकारी कार्य गढ़ के "पिन्हे नोवल्स स्कूल" को हाई स्कूल के रूप में परिवर्तित कर सर्व साधारण की उच्च शिक्षा- प्राप्ति का सुलभ साधन कर दिया गया है और हाई स्कूल में विज्ञान की शिक्षा देने की व्यवस्था कर उसमें दो नवीन भवन बनवाकर इमारत भी बढ़ा दी गई है। प्रारंभिक शिक्षा के लिए वहां पृथक् प्राइमरी स्कूल स्थापित हो गया है। गांवों में कई स्थलों पर नवीन पाठशालाएं खोली जाकर ग्रामीण जनता को शिक्षा का लाभ उठाने का पूरा अवसर दिया गया है। राजधानी प्रतागढ़ में अपनी विमाता मयाकुंवरी द्वारा निर्मित "मानसिंह कन्या पाठशाला" की भी इनके समय में पूरी उन्नति हुई है। प्रतापगढ़ की कन्या-पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करनेवाली राजपूत बालि- काओं के लिए उसके पिछले भाग में एक बोर्डिंग हाउस भी बना दिया गया है। स्त्रियों की चिकित्सा के लिए वहां पर कोई ख़ास प्रबन्ध न होने से इन्होंने अपनी विमाता भुवनेश्वरीदेवी के नाम पर "श्रीभुवनेश्वरीदेवी ज़नाना अस्पताल" बनवा दिया है। ग्रामीण प्रजा की चिकित्सा के लिए ट्रेवेलिंग वैद्य नियत कर दिये गये हैं, जो गांव-गांव जाकर पीड़ितों को मुफ़्त औषध बांटते हैं। गांवों की जनता के हित की दृष्टि से वहां पंचायतों की स्थापना कर ग्राम-सुधार का कार्य आरंभ किया गया है। कृषि की उन्नति के लिए कृषि का महकमा स्थापित कर मुफ़्त बीज देने की व्यवस्था उपयोगी है और उससे तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति पर भी पूरा प्रकाश पड़ेगा। वह बड़ा सरल और निरभिमानी पुरुष है। साक्षर वर्ग के लिए उसके यहां जाकर अध्ययन करने का मार्ग खुला हुआ है। प्रतापगढ़ राज्य के इस इतिहास की रचना के समय मुझे उक्त महाराजकुमार से मुग़ल-काल के कुछ अख़बारों का खुलासा प्राप्त हुआ है। आशा है कि उसकी सर्वतोमुखी प्रतिभा और लगन से भविष्य में ऐतिहासिक जगत् को बहुत कुछ लाभ होगा। उसके उपर्युक्त प्रतापगढ़ की राजकुमारी मोहनकुंवरी के उदर से एक पुत्र और दो कन्याएं उत्पन्न हुई हैं।
श्री भुवनेश्वरी देवी जनाना हास्पिटल, प्रतापगढ़
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महारावत रामसिंहजी ३५३ की गई है। कई वर्षों से किसानों पर माल हासिल का ऋण चढ़ा हुआ था, जिसे चुकाने में वे असमर्थ थे। वि० सं० १६६४ (ई०स० १६३७) में इन्होंने सब पुराना बक़ाया माफ़ कर दिया। लोगों को नागरिकता के अधिकार देने के लिए प्रतापगढ़ की म्युनिसिपेलिटी में चुने हुए मेंबर लेने की भी महा- रावत के राज्य-काल में व्यवस्था हो गई है। बेगार लेना इन्होंने अपने राज्य में बंद कर दिया है। गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए महा- रावतजी ने अपने राज्य में मोटरें चलने लायक़ मार्ग बनवा दिये हैं, जिससे ग्रामीण जनता को अकाल के समय खाद्य पदार्थ सुगमतापूर्वक मिलने का साधन हो गया है। व्यापार की वृद्धि के लिए इन्होंने अपने राज्य से वागड़ में जानेवाले माल का दाण (चुंगी, कर) लौटाने की आज्ञा दे दी है। महा- रावत को उद्योग और धंधों की वृद्धि करने का चाव है। प्रतापगढ़ में जिनिंग फ़ैक्टरी स्थापित हो गई है और बिजली की रोशनी पहुंचाने का भी आयोजन हो गया है। न्याय-विभाग में राजसभा के अतिरिक्त हाई कोर्ट और बना दिया गया है, जिसमें सेशन जज के ऊपर के तमाम मुक़दमे सुने जाते हैं और नीचे की अदालतों की अपील भी वहीं होती है। राज्य के पुराने मुलाज़िमों को पेंशन देने का नियम न था, परंतु महारावतजी ने उनकी सेवाओं आदि को देख योग्यता के अनुसार पेंशन देने का भी सिलसिला जारी किया है। शिक्षा-विभाग में शिक्षकों के लिए प्रॉविडेन्ड फंड क़ायम कर दिया गया है। इन्होंने नवरात्रि पर होनेवाली जीव-हिंसा और होली के अवसर पर होनेवाले अहेड़े के शिकार को रोककर अहिंसा-प्रेम का परिचय दिया है। हिंदी भाषा के प्रति प्रेम होने से महारावत ने राज-भाषा हिंदी ही रक्खी है। अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत का अच्छा व्यवहार है। इस राज्य की ओर से अंग्रेज़-सरकार को खिराज की जो रक़म दी जाती थी, वह खिराज में कमी होना अधिक होने से उक्त सरकार ने उसमें पांच प्रति- शत कमी कर दी है और कैश कंट्रीब्यूशन के ४५
३५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
नाम से २७५०० रुपये कलदार प्रतिवर्ष ई० स० १६३७ से लेना स्थिर किया है। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में चमोतर में समस्त भारत- वर्षीय जैन दिगम्बर समुदाय का एक वृहत् सम्मेलन हुआ, जिसमें लग- [पार्श्व-टिप्पणी: दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदन पत्र मिलना] भग बीस सहस्र आदमी एकत्र हुए। उस समय महारावतजी ने उक्त सम्मेलन में भाग लेकर अहिंसा के कार्यों को प्रोत्साहन दिया। इनके उत्तम व्यवहार और उदार विचारों से प्रेरित होकर उक्त सम्मेलन में इनका दिग- म्बर समुदाय की तरफ़ से बड़ा स्वागत किया गया और उन्होंने स्वर्ण के चौखटे में जड़ा हुआ अभिनंदन पत्र भेंट कर इनकी प्रजा-प्रियता पर हर्ष प्रकट करते हुए राजभक्ति प्रकट की। इसपर महारावत ने अपनी प्रजा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए फाल्गुन सुदि ८ और १४ को अपने राज्य में जीव-हिंसा बंद रखने की आज्ञा निकाल दी है। इनके मित्रतापूर्ण व्यवहार और अंग्रेज़-सरकार के प्रति उत्तम आचरण की पोलिटिकल अफ़सरों ने समय-समय पर प्रशंसा की है। [पार्श्व-टिप्पणी: सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को ख़िताब मिलना] सम्राट् जॉर्ज षष्ठ ने वि०सं० १६६४ (ई०स० १६३८) में नवीन वर्ष के उपाधिवितरणोत्सव पर इनको के० सी० एस० आई० (नाइट कमांडर ऑव् दि स्टार ऑव् इंडिया) का उच्च ख़िताब दिया। इसकी सूचना प्राप्त होने पर वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में ये दिल्ली गये, जहां भारत के वाइसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इनको उक्त ख़िताब के तमग़े से विभूषित किया। प्रधान मंत्री एफ़० सी० केवेन्टरी के पद-त्याग करने पर इन्होंने राव साहब शाह चुन्नीलाल एम० शराफ़ को वि० सं० १६६० (ई० स० [पार्श्व-टिप्पणी: मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना] १६३३) में दीवान के पद पर नियत किया था। उसके पृथक् होने पर इन्होंने अपने पुश्तैनी कर्मचारी शाह माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० से अस्थायी रूप से लगभग दो वर्ष तक यह कार्य लिया।