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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 534 में से

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पृष्ठ 409

३४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हो जाने पर उसकी स्त्री के भरण-पोषण की उचित व्यवस्था कर अपने निजी व्यय से उसके पुत्रों को कई वर्ष तक छात्रवृत्ति प्रदान कर विद्या-प्रेम और गुण-ग्राहकता का परिचय दिया है। इसी प्रकार वह और भी कई व्यक्तियों का पोषण अपने निजी व्यय से करती है। वह बड़ी बुद्धिमती और उदार विचारयुक्त महिला है। उसके द्वारा ही प्रतापगढ़ राज्य में प्राचीन परिपाटियों और राज-रीति का संरक्षण हो रहा है तथा वह सदा महारावतजी को उत्तम सलाह देकर अपना कर्त्तव्य पालन करती है। कुंवराणी झाली मयाकुंवरीबा ने अपने पति की स्मृति को चिर-स्थायी बनाने के लिए प्रतापगढ़ में "मानसिंह कन्या पाठशाला" स्थापित की है और प्रतापगढ़ के क़िले में उसके नाम पर विष्णु का "मान मुरलीधर मंदिर" भी बनवाया है। उक्त मंदिर के व्यय के लिए वर्तमान महारावतजी ने कटकडी गांव भेंट किया है। महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास होने के पीछे राज-कार्य पीछा महारावत को अपने हाथ में लेना पड़ा। उसने महाराजकुमार की महारावत के समय के शासन-नीति में फेर-फार न कर उसी शैली से पिछले उल्लेखनीय शासन-व्यवस्था को स्थिर रखा। उस (महारावत)- कार्य के पिछले दस वर्षों में शिक्षा का क्षेत्र विस्तीर्ण किया गया, न्याय विभागों में अच्छे-अच्छे आदमी नियत कर वहां की त्रुटियां दूर की गईं; माल हासिल और आबपाशी के साधन बढ़ाये गये, जिससे आय में वृद्धि हुई; सीमा सम्बन्धी कई बड़े-बड़े झगड़े तय हुए; तमाम इलाक़े की पट्टेबंदी होकर ज़मीन के लगान में संशोधन किया गया और वि० सं० १९८२ ( ई० स० १९२५ ) में लगान की दर निश्चित हुई, जिससे काश्तकारों के असंतोष में वृद्धि न हुई। हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस की सेवा स्वीकार करने का आग्रह कर उसे वहां बुलवा लिया। वि० सं० १९७९ ( ई० स० १९२२ ) में कुछ दिन ज्वर-ग्रस्त रहकर उसकी ३६ वर्ष की आयु में वहीं मृत्यु हुई। उसके असामयिक निधन से जो हानि हुई है, उसकी पूर्ति होना कठिन है।