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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 534 में से

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पृष्ठ 408

महारावत रघुनाथसिंह ३४१ महाराजकुमार के तीन विवाह और दो संतति हुई, जिनका उल्लेख ऊपर आ गया है। उसकी दूसरी कुंवराणी भुवनेश्वरीदेवी का उसके जीवनकाल में ही वि० सं० १६७० श्रावण सुदि ८ (ई० स० १६१३ ता० ६ अगस्त) को देहांत हो गया। उसकी स्मृति में प्रतापगढ़ राजधानी में क़िले के बाहर "श्रीभुवनेश्वरी देवी ज़नाना हास्पिटल" नामक सुन्दर अस्पताल वर्तमान महारावतजी ने बनवा दिया है, जो बड़ा उपयोगी है और जिसके द्वारा उक्त कुंवराणी की कीर्ति दीर्घ काल तक बनी रहेगी। इस समय महाराजकुमार की ज्येष्ठ और तीसरी कुंवराणियां (शेखावत चांद- कुंवरी और झाली मयाकुंवरीश) विद्यमान हैं। उपर्युक्त दोनों महिलाएं अपने पति के समान ही विद्यानुरागिनी हैं। उनके द्वारा दीन-दुखियों और असहाय व्यक्तियों का सदा पोषण होता है। कुंवराणी शेखावत (वर्तमान राजमाता) ने अपने छोटे भाई खेतड़ी के राजा जयसिंह के शिक्षा-गुरु प्रसिद्ध विद्वान् पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए०¹ का असमय देहान्त (१) पंडित चंद्रधर गुलेरी, बी० ए० सारस्वत ब्राह्मण था। पंजाब की तरफ़ से उसके पूर्वज राजपूताना में जयपुर चले गये और वहां के नरेशों के आश्रय में रहकर संस्कृत भाषा की सेवा करने लगे। उसका पिता शिवराम संस्कृत का योग्य विद्वान् था। वह वहां संस्कृत भाषा का प्रवर्त्तक माना जाता है। वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में पंडित शिवराम के पुत्र पं० चंद्रधर गुलेरी का जन्म हुआ। अपने वंश- गौरव के अनुरूप वह अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत आदि का उत्कृष्ट विद्वान् था। वि० सं० १६५६ (ई० स० १८६६) में मैट्रिक और वि० सं १६६० (ई० स० १६०३) में उसने बी० ए० की परीक्षा सम्मान के साथ पास की। उसकी असाधारण योग्यता, कार्य-दक्षता, सच्चरित्रता एवं शोध की प्रवृत्ति से जयपुर राज्य के उच्चाधिकारियों का उसकी ओर ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने उसको खेतड़ी के अल्पवयस्क राजा जयसिंह (स्वर्गीय) का शिक्षक नियत किया। उसने उक्त प्रतिभावान् राजा का जीवन सुन्दर सांचे में ढाला, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। अनन्तर वह मेयो कॉलेज (अजमेर) के जयपुर हाउस में रहनेवाले छात्रों का निरीक्षक और मोतमिद नियत हुआ। उन्हीं दिनों उसकी योग्यता का अनुभव पाकर मेयो कॉलेज के अधिकारियों ने उसको वहां का हेड पंडित नियत किया। उसकी पाठनशैली, विद्वत्ता, सरलता और सौजन्यता का परिचय पाकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने उससे

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