राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रायः देखा गया है कि राज्याधिकार मिल जाने पर परस्पर पिता-पुत्रों में भी वैमनस्य हो जाया करता है, परंतु महाराजकुमार मानसिंह बड़ा पितृ-भक्त रहा और अपने जीवन-काल में उसने इस सम्बन्ध में कभी अन्तर नहीं आने दिया । प्रतापगढ़ राज्य में इस समय जो शासन-व्यव- स्था है उसका अधिकांश श्रेय उक्त महाराजकुमार को ही है और अब तक भी वह उसकी निर्दिष्ट शैली पर स्थिर है । वह यथासाध्य दीन- दुखियों के कष्टों को दूर करता, उनकी प्रार्थनाएं ध्यानपूर्वक सुनता और उन्हें हर तरह से आराम पहुंचाने की चेष्टा करता था । विद्या- व्यसनी होने से उसने कई विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दे अध्ययन के लिए बाहर भेजकर सदा उनको प्रोत्साहन दिया । उसकी मेधा- शक्ति अच्छी थी, जिससे राज्य-संबंधी प्रत्येक बात को वह सरलता से ग्रहण करता और जटिल से जटिल समस्या को भी थोड़े समय में सुलझा देता था । उसका अधिकांश समय राज्य-कार्य में ही व्यतीत होता था और पूर्ण परिश्रमपूर्वक राज-कार्य में योग देता था । प्रतापगढ़ राज्य को इस होनहार राजकुमार से बड़ी-बड़ी आशाएं थीं और उसके द्वारा इस राज्य की अधिक से अधिक उन्नति की संभावना थी; परंतु उसका असमय ही स्वर्गवास हो गया । उसके विचार उदार और गंभीर थे । वह बन्दूक का निशाना लगाने में चतुर, अच्छा घुड़सवार और आखेट एवं घुड़दौड़ का शौकीन था । सनातन धर्म के प्रति उसकी असीम श्रद्धा थी और देहावसान के पूर्व उसकी शैव धर्म की ओर प्रवृत्ति बढ़ गई थी। उसको अपने पूर्वजों का बड़ा अभिमान था और प्रसिद्ध सीसोदिया वंश के गौरव को अक्षुण्ण रखने का वह सदा प्रयत्न करता था । वह व्यवहार-कुशल और दृढ़-प्रतिज्ञ था । उसका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ, शरीर बलिष्ठ और मुखाकृति सुन्दर तथा प्रभावोत्पादक थी । कोई भी व्यक्ति उससे यदि एक बार मिल लेता तो वह उसको न भूलता था और मिलनेवाले व्यक्ति पर उसके सौजन्य का अवश्य प्रभाव पड़ता था ।