राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रघुनाथसिंह ३४३ महाराजकुमार को अधिकार मिलने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य के कामदार पद से मन्नालाल माचावत हट गया । तब वह पद तोड़ा जाकर [महारावत का कामदार पद] सुजानमल बांठिया महाराजकुमार का सेक्रेटरी [पर पारसी धनजीशाह को] बनाया गया, जिसको केवल तामीली कार्यवाही [नियुक्त करना] करने का अधिकार था । महाराजकुमार की योजना के अनुसार उसके देहांत के पीछे कुछ वर्ष तक तो इसी प्रकार काम चला, परंतु सेक्रेटरी का पद उत्तरदायित्वपूर्ण न होने से शासन-कार्य को चलाने के लिए पुनः कामदार की नियुक्ति की आव- श्यकता जान पड़ी । निदान वि० सं० १८७८ आषाढ वदि ११ (ई० स० १८२१ ता० १ जुलाई) को पारसी धनजीशाह कामदार नियत हुआ । उसके साथ ही इस पद के नाम में परिवर्त्तन होकर उक्त पदाधिकारी दीवान कहलाने लगा । उसके कार्यकाल में सालिमगढ़ गांव के संबंध में बांस- वाड़ा राज्य के साथ जो सीमा का झगड़ा चल रहा था, उसका संतोष- जनक निपटारा हो गया । वि० सं० १८८१ वैशाख सुदि १० (ई० स० १८२४ ता० १४ मई) को महारावत ने अपने पौत्र रामसिंह (वर्त्तमान महारावत) का विवाह [महारावत के भंवर रामसिंह] सीकर के भूतपूर्व रावराजा माधवसिंह की [का विवाह] राजकुमारी से बड़े समारोहपूर्वक किया । इस अवसर पर बीकानेर-नरेश महाराजा सर गंगा- सिंहजी, सैलाना के राजा दिलीपसिंहजी आदि भी सम्मिलित हुए । उन्हीं दिनों ग्वालियर का परलोकवासी महाराजा सर माधवराव सिंधिया भी देवलिया गया । इसके दो वर्ष पीछे महारावत ने अंग्रेज़ सरकार के साथ वि० सं० [अफ़ीम की खरीद के बारे में] १८८३ (ई० स० १८२६) में एक अहदनामा किया, [अंग्रेज़ सरकार से बात-] जिसके अनुसार प्रतिवर्ष अंग्रेज़ी तोल की ५८० मन [चीत होना] अफ़ीम दस और ग्यारह रुपये प्रति सेर के भाव से लेना अंग्रेज़ सरकार ने तय किया ।