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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत रघुनाथसिंह . ३४५ देवलिया के राजमहलों के अन्तःपुर में रसिकबिहारी का मंदिर बनवाया। तीसरी राणी ब्रजकुंवरी (ज्येष्ठ राणी उगमकुंवरी की बहिन) से महारावत का विवाह वि० सं० १६४८ फाल्गुन वदि ७ (ई० स० १८४२ ता० २० फ़रवरी) को हुआ, जो अभी विद्यमान है और अपने पति महारावत रघुनाथसिंह के देहावसान के बाद से ही अपने पुत्र महाराज गोवर्धनसिंह के साथ अर- णोद में रहती है। उसके उदर से राजकुमारी राजकुंवरी और गोवर्धनसिंह का जन्म हुआ। विवाह से थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६६८ (ई० स० १६११) में राजकुंवरी का देहांत हो गया। महारावत रघुनाथसिंह के समय में बहुत से लोकोपयोगी कार्य हुए। उसके समय में मौखिक कार्यवाहियों का अन्त होकर व्यवस्थित रूप से शासन-प्रणाली स्थिर हुई। उसके समय में ही वहां महारावत के समय के शिक्षा का विकास हुआ और राजधानी प्रतापगढ़ में लोकोपयोगी कार्य अंग्रेज़ी भाषा की मैट्रिक तक शिक्षा दी जाने लगी। गांवों में भी उसके समय में ही शिक्षालय खुले। राजधानी में बालिकाओं को शिक्षा देने की भी उसके समय में व्यवस्था हुई। संस्कृत भाषा के प्रति अनुराग होने से उसने वि० सं० १६८२ (ई० स० १६२५) में "रघुनाथ संस्कृत पाठशाला" की स्थापना करवाई, जो अब भी ठीक-ठीक चल रही है। इस पाठशाला में वेदांत, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष तथा कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है और साहित्य तथा ज्योतिष में आचार्य तक की उच्च परीक्षा वहां से दिलाई जाती है। क्षत्रिय जाति के उत्थान के लिए उनमें शिक्षा का प्रसार करने का समुचित प्रयत्न किया गया और क्षत्रिय कुमारों के प्रतापगढ़ में रहकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रावास बना दिया गया एवं राज्य में निःशुल्क शिक्षा देने की पद्धति जारी हुई। उसके राज्य के प्रारंभिक समय में वहां वि० सं० १६५० (ई० स० १८६३) के लगभग क्षत्रिय जाति में सामाजिक कुप्रथाओं में सुधार करने के लिए कर्नल सी० के० एम० वाल्टर (एजेंट गवर्नर जेनरल, राजपूताना) के नाम पर "वाल्टर- कृत राजपुत्र-हितकारिणी-सभा" की एक शाखा स्थापित हुई, जिससे ४४