राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· महारावत रघुनाथसिंह · ३४६ रक़म देकर उसके कुंवर मानसिंह ने भी अच्छी उदारता प्रकट की। भगवान् रामचंद्र का उपासक होने से वि० सं० १६६५ ( ई० स० १६०८ ) में उसने राममंत्र का अनुष्ठान करवाकर एक यज्ञ भी करवाया था। उसके शासन के कुछ वर्षों में राजकुमार और राजकुमारियों के विवाह, सालिमशाही सिक्के का परिवर्त्तन, अकाल तथा व्यापार में कमी होने से प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई थी, किंतु महाराजकुमार ने स्थिति को संभाल लिया। भोले स्वभाव का होने से वह कभी-कभी स्वार्थी पुरुषों के चक्कर में भी पड़ जाया करता था। प्रतापगढ़ राज्य में स्त्री-शिक्षा का प्रचार उसके समय में ही हुआ। संस्कृत भाषा की उन्नति का अभिलाषी होने से अपनी राजकुमारी राजकुंवरी को उसने संस्कृत की शिक्षा दिलवाई तथा इस कार्य के लिए वैष्णव कृष्णदास¹ (आभेटा ब्राह्मण) को नियत किया, जो पूर्ण सदाचारी और निःस्पृह व्यक्ति था। उसका अंग्रेज़-सरकार तथा अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ सदा अच्छा व्यवहार रहा। भारत के कई प्रमुख नरेशों से उसकी मित्रता थी, जो उसका आदर करते थे। विशाल- हृदय होने से अपने सेवकों का अपराध अक्षम्य होने पर भी वह उनको क्षमा कर देता और उनके द्वारा हानि होने पर भी वह उनपर कभी क्रुद्ध न होता तथा छोटे से छोटे व्यक्ति से भी तुच्छता से पेश नहीं आता था। उसका क़द ठिंगना, शरीर पुष्ट, आंखें छोटी, मुंह गोल और उसपर चेचक के कुछ दाग़ थे। ( १ ) वैष्णव कृष्णदास संस्कृत भाषा का अच्छा विद्वान् था। उसने “मयूरेश- मंदार” नामक काव्य की रचना कर उसमें प्रतापगढ़ के नरेशों का बहुत कुछ वर्णन किया है। उसका पुत्र पंडित जगन्नाथ शास्त्री है, जो संस्कृत भाषा और ज्योतिष का उत्कृष्ट विद्वान् है। उसने “हरिभूषणमहाकाव्य” और प्रतापगढ़ के महारावत जसवंतसिंह तथा प्रतापसिंह-रचित दोहों का संग्रह कर अलग-अलग संपादन किया है, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया है। प्रतापगढ़ राज्य के इस इतिहास के लिखने में उक्त राज्य की तरफ़ से जो सामग्री भेजी गई, उसको एकत्रित करने का श्रेय भी जगन्नाथ शास्त्री को ही है।