राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को विरोध करने का अवसर नहीं मिला। वि० सं० १६८० ( ई० स० १६२३) में महारावत के रुग्ण होने पर अजमेर के सुप्रसिद्ध राजवैद्य पंडित रामदयालु शर्मा और उसके दत्तक-पुत्र लोकप्रिय डाक्टर अंबालाल (दाधीच) आयुर्वेदशास्त्री ने सुचारु रूप से चिकित्सा कर महारावत को रोग-मुक्त कर दिया। इसपर महारावत ने उक्त राजवैद्य को पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने का वंशपरंपरा के लिए सम्मान प्रदान किया। इसके कुछ दिनों बाद महारावत के पौत्र भंवर रामसिंह (वर्तमान महारावत) के भी राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होने के आसार दृष्टिगोचर होने पर उसकी चिकित्सा भी उपर्युक्त पिता-पुत्र ने बड़ी लगन के साथ की, जिससे वह सर्वथा रोग-मुक्त हो गया। इसपर प्रसन्न होकर महारावत ने उनको सदा के लिए अपना चिकित्सक नियत कर "राजवैद्य" की पदवी के साथ जागीर में वार्षिक एक सहस्र रुपये कलदार की आय का कीटखेड़ी गांव वंशपरंपरा क लिए वि० सं० १६८२ ( ई० स० १६२६) में प्रदान किया। उसने राजपूत सरदारों के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्तियों को भी उनकी सेवाओं के एवज़ में भूमि तथा गांव पुण्य एवं जागीर में दिये। सेमलखेड़ी गांव उसने देवलिया-स्थित ठाकुर युगलकिशोर और श्रीनाथजी के मंदिरों को भेंट किया। प्रतापगढ़ के नरेशों के पुरोहित आमेटा जाति के ब्राह्मण हैं और वहां इस जाति में दीर्घकाल से संस्कृत भाषा का ज्ञान चला आता है। महा- रावत ने पुरोहित-पद का सम्मान बढ़ाने के लिए अपने पुरोहित रेवाशंकर को ताज़ीम का सम्मान दिया१ और आदित्यगिरि नामक गोसांई को, जो चारण जाति का था और भाषा-काव्य में अच्छी रचना करता था, अपने यहां रखकर आश्रय प्रदान किया। अजमेर में गोशाला बनाने के लिए एक बड़ी (१) प्रतापगढ़ के नरेशों के अधिकतर दानपत्र उपर्युक्त पुरोहित रेवाशङ्कर के यहां से ही प्राप्त हुए हैं, जिससे पाया जाता है कि दीर्घकाल से उसके घर में पुरोहिताई का पद चला आता है। प्रसिद्ध है कि महारावत विक्रमसिंह के मेवाड़ की बड़ी सादड़ी की जागीर छोड़कर देवलिया में निवास करने पर उसके साथ उस (रेवाशङ्कर) के पूर्वज चले गये थे और तब से अब तक बराबर पुरोहिताई का पद उसके कुटुम्ब में ही विद्यमान है।