भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत रघुनाथसिंह. ३४७

उसका समान व्यवहार था । उसका आचरण शुद्ध और चित्त-वृत्ति निष्कपट थी । वह विद्वानों की क़द्र करता तथा उन्हें समय-समय पर पारितोषिक आदि देकर सम्मानित करता था । वह पुराने कर्मचारियों की सलाहों का सदा आदर करता और अपनें राज्य के उच्च पदों पर विशेषतः स्वदेश-वासियों को ही नियुक्त करता था। उनकी सेवाओं को स्मरण कर वह उन्हें सदा प्रोत्साहन देता रहता था, जिससे वे अपने कर्त्तव्य से विमुख न होते थे। अनाथ विधवाओं और बालकों की रक्षा का उसे सदैव ध्यान रहता था । मितव्ययी होने पर भी वह ऐसे कार्यों में अपने राज्य की स्थिति के अनुसार दान देने में संकोच नहीं करता था। उसके उत्तम आचरण से प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर उसकी सज्जनता की छाप जम जाती थी । सामान्य पढ़ा-लिखा होने पर भी विद्या के प्रति उसको अनुराग था। भाषा-काव्य का कुछ ज्ञान होने से वह कभी-कभी स्वयं भी काव्य-रचना किया करता था। चारण और भाट कवियों की कविता सुनने का उसको अनुराग था और वह उनको अपना आश्रय देने में गौरव समझता था । उसको अपने वंश की उच्चता का पूर्ण अभिमान था। निरभिमानी होने से वह किसी से बातचीत करने में संकोच नहीं करता था। राजकीय गंभीर विषयों पर उसको सदा अपने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता था। उसके अधीनस्थ सरदार संतुष्ट थे; क्योंकि वह उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार उनका आदर करता था । वह पुराने ठिकानों को बनाये रखने की परिपाटी को पसंद करता था। इसलिए रायपुर का ठिकाना वहां के ठाकुर रत्नसिंह के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में निःसंतान देहांत होने के पीछे ज़ब्ती के लायक़ होने पर भी महा- रावत ने दूलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को उस (रत्नसिंह) का उत्तराधिकारी निर्वाचित कर अपनी उदारता का परिचय दिया । उसने कई राजपूत सरदारों को जागीर में नये गांव, भूमि आदि देकर, कई को ताज़ीम और स्वर्ण के पाद-भूषण से भी सम्मानित किया एवं कुछ सरदारों का ख़िराज भी कम कर दिया, जिससे उसके दीर्घ शासन-काल में सरदारों