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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

महारावत रघुनाथसिंह. ३४७

उसका समान व्यवहार था । उसका आचरण शुद्ध और चित्त-वृत्ति निष्कपट थी । वह विद्वानों की क़द्र करता तथा उन्हें समय-समय पर पारितोषिक आदि देकर सम्मानित करता था । वह पुराने कर्मचारियों की सलाहों का सदा आदर करता और अपनें राज्य के उच्च पदों पर विशेषतः स्वदेश-वासियों को ही नियुक्त करता था। उनकी सेवाओं को स्मरण कर वह उन्हें सदा प्रोत्साहन देता रहता था, जिससे वे अपने कर्त्तव्य से विमुख न होते थे। अनाथ विधवाओं और बालकों की रक्षा का उसे सदैव ध्यान रहता था । मितव्ययी होने पर भी वह ऐसे कार्यों में अपने राज्य की स्थिति के अनुसार दान देने में संकोच नहीं करता था। उसके उत्तम आचरण से प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर उसकी सज्जनता की छाप जम जाती थी । सामान्य पढ़ा-लिखा होने पर भी विद्या के प्रति उसको अनुराग था। भाषा-काव्य का कुछ ज्ञान होने से वह कभी-कभी स्वयं भी काव्य-रचना किया करता था। चारण और भाट कवियों की कविता सुनने का उसको अनुराग था और वह उनको अपना आश्रय देने में गौरव समझता था । उसको अपने वंश की उच्चता का पूर्ण अभिमान था। निरभिमानी होने से वह किसी से बातचीत करने में संकोच नहीं करता था। राजकीय गंभीर विषयों पर उसको सदा अपने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता था। उसके अधीनस्थ सरदार संतुष्ट थे; क्योंकि वह उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार उनका आदर करता था । वह पुराने ठिकानों को बनाये रखने की परिपाटी को पसंद करता था। इसलिए रायपुर का ठिकाना वहां के ठाकुर रत्नसिंह के वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में निःसंतान देहांत होने के पीछे ज़ब्ती के लायक़ होने पर भी महा- रावत ने दूलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को उस (रत्नसिंह) का उत्तराधिकारी निर्वाचित कर अपनी उदारता का परिचय दिया । उसने कई राजपूत सरदारों को जागीर में नये गांव, भूमि आदि देकर, कई को ताज़ीम और स्वर्ण के पाद-भूषण से भी सम्मानित किया एवं कुछ सरदारों का ख़िराज भी कम कर दिया, जिससे उसके दीर्घ शासन-काल में सरदारों

३४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को विरोध करने का अवसर नहीं मिला। वि० सं० १६८० ( ई० स० १६२३) में महारावत के रुग्ण होने पर अजमेर के सुप्रसिद्ध राजवैद्य पंडित रामदयालु शर्मा और उसके दत्तक-पुत्र लोकप्रिय डाक्टर अंबालाल (दाधीच) आयुर्वेदशास्त्री ने सुचारु रूप से चिकित्सा कर महारावत को रोग-मुक्त कर दिया। इसपर महारावत ने उक्त राजवैद्य को पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने का वंशपरंपरा के लिए सम्मान प्रदान किया। इसके कुछ दिनों बाद महारावत के पौत्र भंवर रामसिंह (वर्तमान महारावत) के भी राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होने के आसार दृष्टिगोचर होने पर उसकी चिकित्सा भी उपर्युक्त पिता-पुत्र ने बड़ी लगन के साथ की, जिससे वह सर्वथा रोग-मुक्त हो गया। इसपर प्रसन्न होकर महारावत ने उनको सदा के लिए अपना चिकित्सक नियत कर "राजवैद्य" की पदवी के साथ जागीर में वार्षिक एक सहस्र रुपये कलदार की आय का कीटखेड़ी गांव वंशपरंपरा क लिए वि० सं० १६८२ ( ई० स० १६२६) में प्रदान किया। उसने राजपूत सरदारों के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्तियों को भी उनकी सेवाओं के एवज़ में भूमि तथा गांव पुण्य एवं जागीर में दिये। सेमलखेड़ी गांव उसने देवलिया-स्थित ठाकुर युगलकिशोर और श्रीनाथजी के मंदिरों को भेंट किया। प्रतापगढ़ के नरेशों के पुरोहित आमेटा जाति के ब्राह्मण हैं और वहां इस जाति में दीर्घकाल से संस्कृत भाषा का ज्ञान चला आता है। महा- रावत ने पुरोहित-पद का सम्मान बढ़ाने के लिए अपने पुरोहित रेवाशंकर को ताज़ीम का सम्मान दिया१ और आदित्यगिरि नामक गोसांई को, जो चारण जाति का था और भाषा-काव्य में अच्छी रचना करता था, अपने यहां रखकर आश्रय प्रदान किया। अजमेर में गोशाला बनाने के लिए एक बड़ी (१) प्रतापगढ़ के नरेशों के अधिकतर दानपत्र उपर्युक्त पुरोहित रेवाशङ्कर के यहां से ही प्राप्त हुए हैं, जिससे पाया जाता है कि दीर्घकाल से उसके घर में पुरोहिताई का पद चला आता है। प्रसिद्ध है कि महारावत विक्रमसिंह के मेवाड़ की बड़ी सादड़ी की जागीर छोड़कर देवलिया में निवास करने पर उसके साथ उस (रेवाशङ्कर) के पूर्वज चले गये थे और तब से अब तक बराबर पुरोहिताई का पद उसके कुटुम्ब में ही विद्यमान है।

· महारावत रघुनाथसिंह · ३४६ रक़म देकर उसके कुंवर मानसिंह ने भी अच्छी उदारता प्रकट की। भगवान् रामचंद्र का उपासक होने से वि० सं० १६६५ ( ई० स० १६०८ ) में उसने राममंत्र का अनुष्ठान करवाकर एक यज्ञ भी करवाया था। उसके शासन के कुछ वर्षों में राजकुमार और राजकुमारियों के विवाह, सालिमशाही सिक्के का परिवर्त्तन, अकाल तथा व्यापार में कमी होने से प्रतापगढ़ राज्य की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई थी, किंतु महाराजकुमार ने स्थिति को संभाल लिया। भोले स्वभाव का होने से वह कभी-कभी स्वार्थी पुरुषों के चक्कर में भी पड़ जाया करता था। प्रतापगढ़ राज्य में स्त्री-शिक्षा का प्रचार उसके समय में ही हुआ। संस्कृत भाषा की उन्नति का अभिलाषी होने से अपनी राजकुमारी राजकुंवरी को उसने संस्कृत की शिक्षा दिलवाई तथा इस कार्य के लिए वैष्णव कृष्णदास¹ (आभेटा ब्राह्मण) को नियत किया, जो पूर्ण सदाचारी और निःस्पृह व्यक्ति था। उसका अंग्रेज़-सरकार तथा अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ सदा अच्छा व्यवहार रहा। भारत के कई प्रमुख नरेशों से उसकी मित्रता थी, जो उसका आदर करते थे। विशाल- हृदय होने से अपने सेवकों का अपराध अक्षम्य होने पर भी वह उनको क्षमा कर देता और उनके द्वारा हानि होने पर भी वह उनपर कभी क्रुद्ध न होता तथा छोटे से छोटे व्यक्ति से भी तुच्छता से पेश नहीं आता था। उसका क़द ठिंगना, शरीर पुष्ट, आंखें छोटी, मुंह गोल और उसपर चेचक के कुछ दाग़ थे। ( १ ) वैष्णव कृष्णदास संस्कृत भाषा का अच्छा विद्वान् था। उसने “मयूरेश- मंदार” नामक काव्य की रचना कर उसमें प्रतापगढ़ के नरेशों का बहुत कुछ वर्णन किया है। उसका पुत्र पंडित जगन्नाथ शास्त्री है, जो संस्कृत भाषा और ज्योतिष का उत्कृष्ट विद्वान् है। उसने “हरिभूषणमहाकाव्य” और प्रतापगढ़ के महारावत जसवंतसिंह तथा प्रतापसिंह-रचित दोहों का संग्रह कर अलग-अलग संपादन किया है, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया है। प्रतापगढ़ राज्य के इस इतिहास के लिखने में उक्त राज्य की तरफ़ से जो सामग्री भेजी गई, उसको एकत्रित करने का श्रेय भी जगन्नाथ शास्त्री को ही है।

३५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत सर रामसिंहजी महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० का जन्म वि० सं० १६६५ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १६०८ ता० १२ अप्रेल) रविवार जन्म और गद्दीनशीनी को महाराजकुमार मानसिंह की कुंवराणी शेखावत चांदकुंवरी के उदर से खेतड़ी में हुआ और वि० सं० १६८५ पौष सुदि ८ (ई० स० १६२६ ता० १८ जनवरी) को ये अपने पितामह महारावत रघुनाथसिंह का देहावसान होने पर प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी हुए। बाल्यकाल समाप्त होने पर योग्य पुरुषों के निरीक्षण में इनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई। इसी बीच इनके पिता महाराजकुमार मानसिंह का परलोकवास हो गया तथापि इनके शिक्षा शिक्षण में किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ा और ये वि० सं० १६७६ के मार्गशीर्ष (ई० स० १६१६ नवंबर) मास में उच्च शिक्षा के लिए अजमेर के मेयो कॉलेज में भेजे गये। उस समय इनका शिक्षक मौलवी सय्यद ग़फ़्फ़ार और अभिभावक सी० सी० एच० डुइस नामक अंग्रेज़ बनाये गये, जिनकी देख-रेख में इनको अपनी बुद्धि के विकास का अच्छा अवसर मिला। वि० सं० १६७६ से १६८५ (ई० स० १६१६ से १६२८) तक इन्होंने वहां विद्याध्ययन किया और वहां की सर्वोच्च परीक्षा पोस्ट-डिप्लोमा को पास करने की भी इनकी इच्छा थी, परन्तु अपने पितामह महारावत रघुनाथसिंह का शरीर अस्वस्थ रहने और फिर उसका स्वर्गवास हो जाने के कारण राजकार्य का बोझ आ पड़ने से इन्हें अपना वह विचार छोड़ना पड़ा। प्रखर-बुद्धि और प्रतिभाशाली होने के कारण अपने अध्ययनकाल में ये प्रत्येक कक्षा में सदा प्रथम रहा करते थे, जिससे इनको कई पुरस्कार भी मिले, जिसका श्रेय इनके शिक्षक मिस्टर एफ़० ए० लेस्ली जोन्स आदि को है। सिंहासनासीन होने के समय इनकी आयु इक्कीस वर्ष के ऊपर हो गई थी, अतएव अंग्रेज़ सरकार को उस समय वहां रीजेंसी कौंसिल बनाने

श्रीमान् महारावतजी श्री सर रामसिंहजी बहादुर, के. सी. एस. आई.

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'महारावत रामसिंह ३५१ अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्राप्त होना की आवश्यकता नहीं हुई। फिर अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से राजपूताने का स्थानापन्न एजेंट गवर्नर- जेनरल मिस्टर ए० एन० एल० केटर तथा दक्षिणी राजपूताने का पोलिटिकल एजेन्ट लेफ़्टनेंट कर्नल डी० एम्० फ़ील्ड आदि प्रतापगढ़ गये और वि० सं० १६८६ वैशाख सुदि ६ (ई० स० १६२६ ता० १४ मई) को एक बड़े दरबार में उन्होंने महारावत के सम्मुख वाइस- रॉय लॉर्ड इर्विन का ता० २० मार्च (वि० सं० १६८५ फाल्गुन सुदि १०) का खरीता पढ़ सुनाया एवं उसे गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्रदान की। तदनंतर महारावत ने शासन-कार्य चलाने के लिए मिस्टर एफ० सी० केवेन्टरी नामक अंग्रेज़ मंत्री नियत किया मंत्री-पद पर एफ० सी० केवेन्टरी की नियुक्ति और उसके परामर्श के अनुसार शासन-कार्य चलाने लगे, परन्तु शासन-शैली पूर्व निर्दिष्ट ही रखी। उसी वर्ष मगशीर्ष सुदि १ (ई० स० १६२६ ता० २ दिसम्बर) को इन्होंने अपनी छोटी बहिन राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह सीतामऊ-नरेश राजा सर रामसिंहजी के ज्येष्ठ राजकुमार डॉ० राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह रघुवीरसिंह, एम्० ए०, एल्-एल्० बी०, डी० लिट्०१ के साथ किया। (१) राजपूताना तथा सेंट्रल इंडिया के वर्तमान राजकुमारों में सीतामऊ के सुयोग्य महाराजकुमार डॉ० रघुवीरसिंह का विद्याभिरुचि के कारण सर्वोच्च स्थान है। खोज और अन्वेषण के कार्यों से उसको अत्यन्त अनुराग है और वह निरन्तर इन कार्यों में व्यस्त रहता है। उसने थोड़े ही समय में अपने गंभीर अध्ययन द्वारा साक्षर वर्ग में पूर्ण ख्याति प्राप्त की है। समय-समय पर उसके कई निवन्ध सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रका- शित होते रहते हैं। इतिहास उसका प्रिय विषय है और उसकी रचनाओं में 'मालवा में युगान्तर' नामक पुस्तक वहां के इतिहास पर नूतन प्रकाश डालती है। उसके बृहत् पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य ऐतिहासिक ग्रन्थ, मुग़लकाल के हिंदी, फ़ारसी और उर्दू भाषा के पत्र-पत्रादि विद्यमान हैं, जिनका उसने पूर्ण परिश्रम से और अगाध द्रव्य व्यय कर संग्रह किया है। जयपुर राज्य से प्राप्त मुग़ल-काल के अख़बारों का बृहत् संग्रह भी उसने अपने यहां एकत्रित कर लिया है, जो उस समय के इतिहास के लिए

३५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शासन-सूत्र हाथ में लेने के पीछे प्रतापगढ़ राज्य में इनके द्वारा कई लोक-हितकारी कार्य हुए। राज्य में शिक्षा की वृद्धि के लिए प्रताप- लोक-हितकारी कार्य गढ़ के "पिन्हे नोवल्स स्कूल" को हाई स्कूल के रूप में परिवर्तित कर सर्व साधारण की उच्च शिक्षा- प्राप्ति का सुलभ साधन कर दिया गया है और हाई स्कूल में विज्ञान की शिक्षा देने की व्यवस्था कर उसमें दो नवीन भवन बनवाकर इमारत भी बढ़ा दी गई है। प्रारंभिक शिक्षा के लिए वहां पृथक् प्राइमरी स्कूल स्थापित हो गया है। गांवों में कई स्थलों पर नवीन पाठशालाएं खोली जाकर ग्रामीण जनता को शिक्षा का लाभ उठाने का पूरा अवसर दिया गया है। राजधानी प्रतागढ़ में अपनी विमाता मयाकुंवरी द्वारा निर्मित "मानसिंह कन्या पाठशाला" की भी इनके समय में पूरी उन्नति हुई है। प्रतापगढ़ की कन्या-पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करनेवाली राजपूत बालि- काओं के लिए उसके पिछले भाग में एक बोर्डिंग हाउस भी बना दिया गया है। स्त्रियों की चिकित्सा के लिए वहां पर कोई ख़ास प्रबन्ध न होने से इन्होंने अपनी विमाता भुवनेश्वरीदेवी के नाम पर "श्रीभुवनेश्वरीदेवी ज़नाना अस्पताल" बनवा दिया है। ग्रामीण प्रजा की चिकित्सा के लिए ट्रेवेलिंग वैद्य नियत कर दिये गये हैं, जो गांव-गांव जाकर पीड़ितों को मुफ़्त औषध बांटते हैं। गांवों की जनता के हित की दृष्टि से वहां पंचायतों की स्थापना कर ग्राम-सुधार का कार्य आरंभ किया गया है। कृषि की उन्नति के लिए कृषि का महकमा स्थापित कर मुफ़्त बीज देने की व्यवस्था उपयोगी है और उससे तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति पर भी पूरा प्रकाश पड़ेगा। वह बड़ा सरल और निरभिमानी पुरुष है। साक्षर वर्ग के लिए उसके यहां जाकर अध्ययन करने का मार्ग खुला हुआ है। प्रतापगढ़ राज्य के इस इतिहास की रचना के समय मुझे उक्त महाराजकुमार से मुग़ल-काल के कुछ अख़बारों का खुलासा प्राप्त हुआ है। आशा है कि उसकी सर्वतोमुखी प्रतिभा और लगन से भविष्य में ऐतिहासिक जगत् को बहुत कुछ लाभ होगा। उसके उपर्युक्त प्रतापगढ़ की राजकुमारी मोहनकुंवरी के उदर से एक पुत्र और दो कन्याएं उत्पन्न हुई हैं।

श्री भुवनेश्वरी देवी जनाना हास्पिटल, प्रतापगढ़

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महारावत रामसिंहजी ३५३ की गई है। कई वर्षों से किसानों पर माल हासिल का ऋण चढ़ा हुआ था, जिसे चुकाने में वे असमर्थ थे। वि० सं० १६६४ (ई०स० १६३७) में इन्होंने सब पुराना बक़ाया माफ़ कर दिया। लोगों को नागरिकता के अधिकार देने के लिए प्रतापगढ़ की म्युनिसिपेलिटी में चुने हुए मेंबर लेने की भी महा- रावत के राज्य-काल में व्यवस्था हो गई है। बेगार लेना इन्होंने अपने राज्य में बंद कर दिया है। गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए महा- रावतजी ने अपने राज्य में मोटरें चलने लायक़ मार्ग बनवा दिये हैं, जिससे ग्रामीण जनता को अकाल के समय खाद्य पदार्थ सुगमतापूर्वक मिलने का साधन हो गया है। व्यापार की वृद्धि के लिए इन्होंने अपने राज्य से वागड़ में जानेवाले माल का दाण (चुंगी, कर) लौटाने की आज्ञा दे दी है। महा- रावत को उद्योग और धंधों की वृद्धि करने का चाव है। प्रतापगढ़ में जिनिंग फ़ैक्टरी स्थापित हो गई है और बिजली की रोशनी पहुंचाने का भी आयोजन हो गया है। न्याय-विभाग में राजसभा के अतिरिक्त हाई कोर्ट और बना दिया गया है, जिसमें सेशन जज के ऊपर के तमाम मुक़दमे सुने जाते हैं और नीचे की अदालतों की अपील भी वहीं होती है। राज्य के पुराने मुलाज़िमों को पेंशन देने का नियम न था, परंतु महारावतजी ने उनकी सेवाओं आदि को देख योग्यता के अनुसार पेंशन देने का भी सिलसिला जारी किया है। शिक्षा-विभाग में शिक्षकों के लिए प्रॉविडेन्ड फंड क़ायम कर दिया गया है। इन्होंने नवरात्रि पर होनेवाली जीव-हिंसा और होली के अवसर पर होनेवाले अहेड़े के शिकार को रोककर अहिंसा-प्रेम का परिचय दिया है। हिंदी भाषा के प्रति प्रेम होने से महारावत ने राज-भाषा हिंदी ही रक्खी है। अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत का अच्छा व्यवहार है। इस राज्य की ओर से अंग्रेज़-सरकार को खिराज की जो रक़म दी जाती थी, वह खिराज में कमी होना अधिक होने से उक्त सरकार ने उसमें पांच प्रति- शत कमी कर दी है और कैश कंट्रीब्यूशन के ४५

३५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

नाम से २७५०० रुपये कलदार प्रतिवर्ष ई० स० १६३७ से लेना स्थिर किया है। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में चमोतर में समस्त भारत- वर्षीय जैन दिगम्बर समुदाय का एक वृहत् सम्मेलन हुआ, जिसमें लग- [पार्श्व-टिप्पणी: दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदन पत्र मिलना] भग बीस सहस्र आदमी एकत्र हुए। उस समय महारावतजी ने उक्त सम्मेलन में भाग लेकर अहिंसा के कार्यों को प्रोत्साहन दिया। इनके उत्तम व्यवहार और उदार विचारों से प्रेरित होकर उक्त सम्मेलन में इनका दिग- म्बर समुदाय की तरफ़ से बड़ा स्वागत किया गया और उन्होंने स्वर्ण के चौखटे में जड़ा हुआ अभिनंदन पत्र भेंट कर इनकी प्रजा-प्रियता पर हर्ष प्रकट करते हुए राजभक्ति प्रकट की। इसपर महारावत ने अपनी प्रजा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए फाल्गुन सुदि ८ और १४ को अपने राज्य में जीव-हिंसा बंद रखने की आज्ञा निकाल दी है। इनके मित्रतापूर्ण व्यवहार और अंग्रेज़-सरकार के प्रति उत्तम आचरण की पोलिटिकल अफ़सरों ने समय-समय पर प्रशंसा की है। [पार्श्व-टिप्पणी: सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को ख़िताब मिलना] सम्राट् जॉर्ज षष्ठ ने वि०सं० १६६४ (ई०स० १६३८) में नवीन वर्ष के उपाधिवितरणोत्सव पर इनको के० सी० एस० आई० (नाइट कमांडर ऑव् दि स्टार ऑव् इंडिया) का उच्च ख़िताब दिया। इसकी सूचना प्राप्त होने पर वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में ये दिल्ली गये, जहां भारत के वाइसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इनको उक्त ख़िताब के तमग़े से विभूषित किया। प्रधान मंत्री एफ़० सी० केवेन्टरी के पद-त्याग करने पर इन्होंने राव साहब शाह चुन्नीलाल एम० शराफ़ को वि० सं० १६६० (ई० स० [पार्श्व-टिप्पणी: मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना] १६३३) में दीवान के पद पर नियत किया था। उसके पृथक् होने पर इन्होंने अपने पुश्तैनी कर्मचारी शाह माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० से अस्थायी रूप से लगभग दो वर्ष तक यह कार्य लिया।

महारावत रामसिंहजी - ३५५

उसकी कार्यशैली और सरलता से वहां के निवासी संतुष्ट रहे । वि० सं० १६६६ ( ई० स० १६४० ) से इस पद पर राजा त्रिभुवनदास, एम० ए० नियत किया गया है, जो अनुभवी, कार्यकुशल तथा कर्तव्यपरायण व्यक्ति है और गुजरात की तरफ़ की देशी रियासतों में ऐसे दायित्वपूर्ण पदों पर काम कर चुका है । महारावत सर रामसिंहजी के तीन विवाह हुए हैं। उनमें से ज्येष्ठ शेखावत महाराणी सीकर के रावराजा माधवसिंह की पुत्री थी । उक्त विवाह और संतति महाराणी के उदर से महाराजकुमारी देवेन्द्रकुंवरी का वि० सं० १६८१ फाल्गुन वदि ८ ( ई० स० १६२५ ता० १६ फ़रवरी ) को जन्म हुआ और उसके पश्चात् क्रमशः उसके तीन कुंवरियां और उत्पन्न हुईं; किन्तु वे तीनों ही कालकवलित हो गईं तथा उक्त महाराणी का भी वि० सं० १६८७ पौष सुदि १४ ( ई० स० १६३० ता० १६ दिसम्बर) को देहांत हो गया । इसपर महारावतजी का द्वितीय विवाह डुमरांव ( बिहार ) के महाराजा सर केशवप्रसादसिंह, सी० वी० ई० की राजकुमारी मेघराजकुंवरी से वि० सं० १६८६ चैत्र सुदि १५ ( ई० स० १६३२ ता० २० अप्रेल ) को हुआ, जिसके उदर से महाराजकुमारी इंद्र- कुंवरी का वि० सं० १६६० वैशाख वदि ७ (ई० स० १६३३ ता० १६ अप्रेल), उर्मिलाकुंवरी का वि० सं० १६६४ श्रावण वदि १३ ( ई० स० १६३७ ता० ४ अगस्त ) और कुसुमकुंवरी एवं कुमुदकुंवरी दोनों का वि० सं० १६६६ प्रथम श्रावण सुदि १ ( ई० स० १६३६ ता० १७ जुलाई ) सोमवार को जन्म हुआ है । उपर्युक्त दोनों विवाहों से एक भी राजकुमार का जन्म न होने के कारण महारावतजी ने अपना तीसरा विवाह काठियावाड़ के अन्तर्गत ध्रांगधरा के मेजर महाराजा सर घनश्यामसिंहजी, जी० सी० आई० ई०, के० सी० एस० आई० की पुत्री महेंद्रकुंवरी से वि० सं० १६६१ द्वितीय वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६३४ ता० १६ मई) को किया, जिससे भी प्रथम एक राजकुमारी यशवंतकुंवरी का वि० सं० १६६४ फाल्गुन वदि १० (ई० स० १६३८ ता० २४ फ़रवरी ) को जन्म हुआ ।

३५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस प्रकार महारावत के अन्तःपुर में निरन्तर राजकुमारियां ही उत्पन्न होने से वहां की प्रजा चिंतित थी; किन्तु ईश्वर की कृपा से वि० सं० १९९६ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १९४० ता० १७ मार्च) को महारावत की ध्रांगधरावाली तृतीय महाराणी के उदर से महाराजकुमार का जन्म हुआ, जिसका समाचार पाते ही राज्य के हितचिन्तकों का चित्त प्रफुल्लित हो गया । महारावत ने इस समाचार के मिलने पर समयोचित उदारताएं प्रकट कीं । प्रतापगढ़ के समस्त ब्राह्मणों को राज्य की तरफ़ से भोजन कराया गया और विजयराघवजी आदि के मन्दिरों में अपनी तरफ़ से भेंट-पूजा कराने के उपरान्त राज्य के समग्र कर्मचारियों को एक मास का वेतन पुरस्कार में प्रदान किया गया । महारावत सर रामसिंहजी उदार-प्रकृति और नये विचारों के नरेश हैं । स्वभाव इनका सरल है। दयालुता के साथ विनय-शीलता की मात्रा भी इनमें विद्यमान है, जिससे सहज में ही ये लोगों .महारावतजी की जीवन- का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं । सम्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें भावनाएं इनकी विशुद्ध हैं। प्रजा के स्वास्थ्य की उन्नति और विद्या के प्रसार की ओर इनका पूरा ध्यान है। संगीत और शिल्प तथा चित्रकला से इन्हें अनुराग है । जन्तु-शास्त्र में ये स्वयं बहुत कुछ गति रखते हैं। प्रतापगढ़ के बंगले में, जहां महारावतजी और राजपरिवार का निवास है, इन्होंने एक जन्तुशाला बना रखी है । हिंसक जंतुओं में शेर, चीते एवं सूअर आदि के शिकार की तरफ़ इनकी अधिक रुचि है। कई शेरों को अब तक ये अपनी बंदूक का निशाना बना चुके हैं। हिंदू धर्म तथा संस्कृति पर इनकी पूरी आस्था है और ये तदनुसार आचरण करने का सदा प्रयत्न करते हैं। इनकी प्रजा का इनपर पूरा विश्वास है और उनके प्रति इनका अच्छा व्यवहार होने से उन्हें इनसे भविष्य में बड़ी- बड़ी आशाएं हैं । उपर्युक्त प्रतापगढ़ के बंगले में इन्होंने बहुत कुछ सुधार कराकर उसका विस्तार बढ़ाने के अतिरिक्त वहां एक रमणीय उद्यान लगवा दिया है। उद्योग धन्धों की वृद्धि की ओर भी इनकी अधिक रुचि

महारावत रामसिंहजी ३५७ है। साथ ही समयानुसार शासन-व्यवस्था को उन्नत बनाकर प्रजा का हित- साधन करने की भी इनकी अभिलाषा रहती है । भारत के कई बड़े-बड़े नरेशों और अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ इनका मित्रता का व्यवहार है । विद्वानों और गुणज्ञों से ये प्रसन्नतापूर्वक मिलते हैं और उनका उचित सम्मान भी करते हैं । ये बड़े मातृ-भक्त हैं और सदा अपनी माता शेखावत के सत्परामर्श को ग्रहण करते हैं। राज्य में डाकेज़नी अब बहुत कुछ बन्द हो गई है और राज्य ऋणग्रस्त नहीं है । ये चेम्बर ऑव् प्रिंसेज़ ( नरेन्द्र मण्डल ) के सदस्य हैं और प्रायः वहां के अधिवेशनों में भी सम्मिलित होकर भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त ये मेयोकॉलेज अजमेर की प्रबन्धकारिणी समिति के मेम्बर और बाहर की कई अन्य संस्थाओं के सहायक हैं। वर्तमान यूरोप के युद्ध के आरं- भिक समय में इन्होंने अंग्रेज़ सरकार के प्रति राज-भक्ति प्रकट करते हुए दस सहस्र रुपये और बाद में ५०० पाउण्ड दिये हैं। अपने सामन्तवर्ग, राज-कर्मचारियों आदि के साथ इनका अच्छा व्यवहार है । पारसी सेठ फ़ीरोज़शाह को उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर इन्होंने बरखेड़ा गांव जागीर में दिया है और इसी प्रकार अन्य कई व्यक्तियों को भी समय-समय पर गांव, भूमि, मकान आदि जागीर तथा पुण्य में दिये हैं। महारावतजी की माता शेखावत चांदकुंवरी ने अपने पति स्वर्गीय महाराजकुमार मानसिंह की स्मृति स्थाई रखने के लिए उसके नाम पर “युवराज मानसिंह अनाथालय” का शिलान्यास बीकानेर के महाराजकुमार शार्दूलसिंह-द्वारा ता० १५ दिसम्बर ई० सन् १६४० को करवाया है। इनका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ और शरीर की गठन सुडौल है ! हिंसक-जंतुओं के शिकार के समय ये कठिन से कठिन परिश्रम करते हुए भी नहीं थकते हैं।

सातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार राजपूताना के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश भूमि भी सरदारों में बंटी हुई है । उनके अतिरिक्त कुछ कर्मचारियों को भी राज्य की तरफ़ से जागीरें दी गई हैं । देवमंदिरों, ब्राह्मणों, चारणों और रावों को भी कई गांव और भूमि नरेशों की ओर से दी गई है, जिसकी गणना माफ़ी में होती है । राजपूत-सरदारों को जागीर के एवज़ में खुद और सवार तथा पैदलों से राज्य की सेवा करनी पड़ती है एवं उनसे कुछ रक़म "टांका" अर्थात् खिराज के नाम से ली जाती है । सरदारों की नौकरी का कोई समय और सवार-सिपाहियों की संख्या का यहां पर कोई क्रम नहीं है । जितने सवार-सिपाही राज्य से मांगे जावें, उनके साथ हाज़िर होकर जब तक उनको रुख़सत न दी जावे तब तक नौकरी देने के लिए वे प्रत्येक समय तैयार रहते हैं । राजपूत जागीरदारों के वहां तीन दर्जे हैं । पहले दर्जे के जागीरदार नगारबंद अर्थात् उमराव कहलाते हैं, दूसरे दर्जे के जागीरदार ताज़ीमी और तीसरे दर्जे के जागीरदार ग़ैरताज़ीमी कहलाते हैं । इस राज्य में जागीरदारों को जो जागीरें आदि दी गई हैं, वे वंश- परंपरागत उनके उत्तराधिकारियों के अधिकार में रहती है । राजपूत जागीरदारों में से अधिकांश को भाईबंट में एवं कितनेक को उनकी अच्छी सेवाओं के उपलक्ष में तथा बाहर से आकर रहने पर निर्वाह के लिए

जागीरें दी गई हैं। वहां के अधिकांश सरदार महारावत के सगोत्री सीसोदिया राजपूत हैं और दूसरे थोड़े। प्रथम वर्ग के सरदारों को ताज़ीम के अतिरिक्त नक़ारा, निशान और पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने आदि का सम्मान प्राप्त है। उनकी संख्या इस समय ११ है। उनमें महारावत के निकट संबंधियों में अरगोद का ठिकाना भी है। दूसरे दर्जे के जागीरदारों में कई पुराने और कुछ नये ठिकाने हैं। महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक उनमें बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। ठिकानेदार अपनी जागीर किसी को रेहन अथवा बै नहीं कर सकते और न अपनी जागीर का कोई भाग दूसरों को दान में दे सकते हैं। उत्तराधिकारी के अभाव में वे बिना राज्य की आज्ञा के दत्तक पुत्र नहीं रख सकते हैं। प्रथम वर्ग के सब सरदार सीसोदिया हैं। उनकी प्रतिष्ठा भाइयों के समान है एवं, उनको दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के सुनने का भी अधिकार दिया गया है। जब नवीन सरदार ठिकाने पर नियत होता है, तब राज्य में उससे तलवारबंदी का नज़राना लिया जाता है। इसके अतिरिक्त महारावत की गद्दीनशीनी, विवाह आदि के अवसरों पर भी सरदारों के नज़राना वग़ैरा दाख़िल करने का प्राचीन रिवाज है।

महारावत के निकट सम्बन्धी

अरगोद

अरगोद के स्वामी महारावत सालिमसिंह के छोटे पुत्र लालसिंह के वंशधर हैं¹। उनकी उपाधि “महाराज” है। लालसिंह का वि० सं० १८२४ ( ई० स० १७६७) में जन्म हुआ था। फिर महारावत सामन्तसिंह ने उस(लालसिंह)को अपने छोटे भाई के तरीक़े

( १ ) वंशक्रम—[ १ ] लालसिंह [ २ ] अर्जुनसिंह [ ३ ] खुशहालसिंह [ ४ ] रघुनाथसिंह और [ ५ ] गोवर्धनसिंह ।

३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अरणोद की जागीर दी। उसने अरणोद के पट्टे में अपने नाम पर लाल- पुरा गांव बसाकर वहां गढ़ बनवाया, जो लालगढ़ कहलाता है। वि० सं० १८८६ (ई० स० १८२६) में लालसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र अर्जुन- सिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसका जन्म वि० सं० १८७६ (ई० स० १८१६) में हुआ था। अर्जुनसिंह का वि० सं० १९११ (ई० स० १८५४) में देहांत हुआ। तब उसका पुत्र खुशहालसिंह वहां का महाराज हुआ, परंतु वह कुछ वर्ष ही जीवित रहा और वि० सं० १९१४ चैत्र वदि ११ (ई० स० १८५८ ता० ११ मार्च) को परलोक सिधारा। तदनंतर उसके स्थान पर उसका बालक पुत्र रघुनाथसिंह अरणोद का स्वामी बना। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में प्रतापगढ़ के स्वामी महा- रावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत होने पर अरणोद से महाराज रघु- नाथसिंह गोद जाकर प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठा। उस समय उसके दो कुंवर प्रतापसिंह और मानसिंह विद्यमान थे। रघुनाथसिंह के गद्दी बैठने पर प्रतापसिंह पाटवी राजकुमार माना गया और अरणोद की जागीर मानसिंह के नाम पर रखी गई। इसके थोड़े ही समय बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई। तब मानसिंह युवराज बनाया गया। वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि द्वितीय १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) को महारावत रघुनाथसिंह के छोटे कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर महारावत ने वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितंबर) को गोवर्धनसिंह को अरणोद की जागीर प्रदान की और उस (गोवर्धनसिंह) की उपाधि "महाराज" हुई। महाराज गोवर्धनसिंह ने अजमेर के मेयो कॉलेज में डिप्लोमा तक अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा प्राप्त की है। वह व्यवहार-कुशल व्यक्ति है। महारावत रघुनाथसिंह के समय उसको चंवर रखने का सम्मान प्राप्त हुआ। उस (गोवर्धनसिंह) के दो पुत्र—गोपालसिंह और भीमसिंह— हैं, जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

धमोतर ३६१ प्रथम वर्ग के सरदार धमोतर धमोतर के सरदार महारावत सूरजमल के छोटे पुत्र सैंसमल- (सहसमल) के वंशधर हैं१ और वे सिंहावत (सहसावत) कहलाते हैं। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। इस राज्य में इस ठिकाने की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है और आय में भी इस ठिकाने के बराबर दूसरा कोई ठिकाना नहीं है। ख्यातों में लिखा है कि सैंसमल उदयपुर के महाराणाओं की सेवा में रहता था, इसलिए वहां से उसको नींबाहेड़ा और खोडीप की जागीर मिली और वह महाराणा की तरफ़ से युद्ध करता हुआ काम आया। तदनंतर उसका पुत्र कांधल वहां का स्वामी हुआ, जो मेवाड़ छोड़- कर महारावत विक्रमसिंह (बीका) के साथ कांठल में गया और वहां उसका प्रभुत्व स्थिर करने में सदा उस (विक्रमसिंह) का साथी रहा। इसपर उसको वहां से धमोतर का पट्टा जागीर में मिला। बादशाह अकबर के समय आंबेर (जयपुर राज्य) के कछुवाहा कुंवर मानसिंह ने उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) पर चढ़ाई की, उस समय देव- लिया से महाराणा की सहायतार्थ जो सेना गई, उसमें ठाकुर कांधल भी था और वह हल्दीघाटी के युद्ध-क्षेत्र में शाही सेना से वीरतापूर्वक लड़कर काम आया। कांधल का पुत्र गोपालदास था, जो बांसवाड़ा के महारावल की सहायतार्थ किसी युद्ध में लड़कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। गोपालदास के ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] सैंसमल. [ २ ] कांधल [ ३ ] गोपालदास [ ४ ] जोधसिंह [ ५ ] जोगीदास [ ६ ] जसकरण [ ७ ] पृथ्वीराज (पृथ्वीसिंह) [ ८ ] फ़तहसिंह [ ६ ] कुबेरसिंह [ १० ] कल्याणसिंह [ ११ ] नाथूराम (नाथूसिंह) [ १२ ] हरीसिंह [ १३ ] मोहकमसिंह [ १४ ] रोड़सिंह [ १५ ] हमीरसिंह [ १६ ] केसरीसिंह [ १७ ] हिंदू सिंह और [ १८ ] दयालसिंह। ४६

३६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पुत्र जोधसिंह और पूरा¹ हुए । उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (प्रथम) के समय देवलिया के महारावत जसवन्तसिंह को कुंवर महासिंह-सहित उक्त महाराणा ने अपनी सेना भेज चंपा बाग में मरवा डाला और देवलिया पर भी सेना भेज अधिकार कर लिया। उस समय जोधसिंह महारावत जसवंतसिंह के दूसरे पुत्र हरिसिंह को लेकर बादशाह शाहजहां के दरबार में गया और महारावत का देवलिया आदि पर अधिकार कराने में प्रयत्न- शील रहा । फिर बादशाह ने सेना भेजकर महारावत हरिसिंह का देवलिया पर अधिकार करा दिया। जोधसिंह की वि० सं० १७०३ (ई० स० १६४६) में मृत्यु हुई² । तदनंतर उसका पुत्र जोगीदास धमोतर का स्वामी हुआ। उसने धमोतर में लक्ष्मीनारायण का मंदिर और गढ़ में महल आदि बनवाये । उसका छोटा भाई भोगीदास था, जिसने देवलिया में एक बावड़ी बनवाई, जो भोगीदास की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध है³ । जोगीदास का पुत्र जसकरण⁴ और पौत्र पृथ्वीराज हुआ । पृथ्वी- (१) पूरा के नाम से पूरावत शाखा चली। प्रतापगढ़ राज्य में इस समय पूरावतों का जाजली का ठिकाना प्रथम वर्ग में और बरखेड़ी द्वितीय वर्ग में है, जिनका उल्लेख आगे किया जायगा । (२) धमोतर में तालाब के किनारे ठाकुर जोधसिंह का स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७०३ शाके १५६८ मार्गशीर्ष सुदि २ (ई० स० १६४६ ता० २६ नवम्बर) को उसका देहान्त होने और उसके साथ उसकी राठोड़ पत्नी के सती होने का उल्लेख है । (३) कल्याण कवि-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य से ठाकुर जोगीदास का महारावत हरिसिंह का समकालीन होना प्रकट है। उक्त प्रशस्ति में उस- (जोगीदास) के छोटे भाई भोगीदास की धार्मिकता आदि का वर्णन है। देवलिया में भोगीदास की बनवाई हुई बावड़ी के समीप उसका स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर उस (भोगीदास) की वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ (ई० स० १६७९ ता० १६ जून) को मृत्यु होने का उल्लेख है । (४) ठाकुर जसकरण का भी उपर्युक्त "प्रताप-प्रशस्ति" में वर्णन है और उसमें उसको महारावत प्रतापसिंह का सामन्त बतलाते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है।