राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अरणोद की जागीर दी। उसने अरणोद के पट्टे में अपने नाम पर लाल- पुरा गांव बसाकर वहां गढ़ बनवाया, जो लालगढ़ कहलाता है। वि० सं० १८८६ (ई० स० १८२६) में लालसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र अर्जुन- सिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसका जन्म वि० सं० १८७६ (ई० स० १८१६) में हुआ था। अर्जुनसिंह का वि० सं० १९११ (ई० स० १८५४) में देहांत हुआ। तब उसका पुत्र खुशहालसिंह वहां का महाराज हुआ, परंतु वह कुछ वर्ष ही जीवित रहा और वि० सं० १९१४ चैत्र वदि ११ (ई० स० १८५८ ता० ११ मार्च) को परलोक सिधारा। तदनंतर उसके स्थान पर उसका बालक पुत्र रघुनाथसिंह अरणोद का स्वामी बना। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में प्रतापगढ़ के स्वामी महा- रावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत होने पर अरणोद से महाराज रघु- नाथसिंह गोद जाकर प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठा। उस समय उसके दो कुंवर प्रतापसिंह और मानसिंह विद्यमान थे। रघुनाथसिंह के गद्दी बैठने पर प्रतापसिंह पाटवी राजकुमार माना गया और अरणोद की जागीर मानसिंह के नाम पर रखी गई। इसके थोड़े ही समय बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई। तब मानसिंह युवराज बनाया गया। वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि द्वितीय १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) को महारावत रघुनाथसिंह के छोटे कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर महारावत ने वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितंबर) को गोवर्धनसिंह को अरणोद की जागीर प्रदान की और उस (गोवर्धनसिंह) की उपाधि "महाराज" हुई। महाराज गोवर्धनसिंह ने अजमेर के मेयो कॉलेज में डिप्लोमा तक अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा प्राप्त की है। वह व्यवहार-कुशल व्यक्ति है। महारावत रघुनाथसिंह के समय उसको चंवर रखने का सम्मान प्राप्त हुआ। उस (गोवर्धनसिंह) के दो पुत्र—गोपालसिंह और भीमसिंह— हैं, जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।