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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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जागीरें दी गई हैं। वहां के अधिकांश सरदार महारावत के सगोत्री सीसोदिया राजपूत हैं और दूसरे थोड़े। प्रथम वर्ग के सरदारों को ताज़ीम के अतिरिक्त नक़ारा, निशान और पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने आदि का सम्मान प्राप्त है। उनकी संख्या इस समय ११ है। उनमें महारावत के निकट संबंधियों में अरगोद का ठिकाना भी है। दूसरे दर्जे के जागीरदारों में कई पुराने और कुछ नये ठिकाने हैं। महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक उनमें बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। ठिकानेदार अपनी जागीर किसी को रेहन अथवा बै नहीं कर सकते और न अपनी जागीर का कोई भाग दूसरों को दान में दे सकते हैं। उत्तराधिकारी के अभाव में वे बिना राज्य की आज्ञा के दत्तक पुत्र नहीं रख सकते हैं। प्रथम वर्ग के सब सरदार सीसोदिया हैं। उनकी प्रतिष्ठा भाइयों के समान है एवं, उनको दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के सुनने का भी अधिकार दिया गया है। जब नवीन सरदार ठिकाने पर नियत होता है, तब राज्य में उससे तलवारबंदी का नज़राना लिया जाता है। इसके अतिरिक्त महारावत की गद्दीनशीनी, विवाह आदि के अवसरों पर भी सरदारों के नज़राना वग़ैरा दाख़िल करने का प्राचीन रिवाज है।

महारावत के निकट सम्बन्धी

अरगोद

अरगोद के स्वामी महारावत सालिमसिंह के छोटे पुत्र लालसिंह के वंशधर हैं¹। उनकी उपाधि “महाराज” है। लालसिंह का वि० सं० १८२४ ( ई० स० १७६७) में जन्म हुआ था। फिर महारावत सामन्तसिंह ने उस(लालसिंह)को अपने छोटे भाई के तरीक़े

( १ ) वंशक्रम—[ १ ] लालसिंह [ २ ] अर्जुनसिंह [ ३ ] खुशहालसिंह [ ४ ] रघुनाथसिंह और [ ५ ] गोवर्धनसिंह ।