राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार राजपूताना के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश भूमि भी सरदारों में बंटी हुई है । उनके अतिरिक्त कुछ कर्मचारियों को भी राज्य की तरफ़ से जागीरें दी गई हैं । देवमंदिरों, ब्राह्मणों, चारणों और रावों को भी कई गांव और भूमि नरेशों की ओर से दी गई है, जिसकी गणना माफ़ी में होती है । राजपूत-सरदारों को जागीर के एवज़ में खुद और सवार तथा पैदलों से राज्य की सेवा करनी पड़ती है एवं उनसे कुछ रक़म "टांका" अर्थात् खिराज के नाम से ली जाती है । सरदारों की नौकरी का कोई समय और सवार-सिपाहियों की संख्या का यहां पर कोई क्रम नहीं है । जितने सवार-सिपाही राज्य से मांगे जावें, उनके साथ हाज़िर होकर जब तक उनको रुख़सत न दी जावे तब तक नौकरी देने के लिए वे प्रत्येक समय तैयार रहते हैं । राजपूत जागीरदारों के वहां तीन दर्जे हैं । पहले दर्जे के जागीरदार नगारबंद अर्थात् उमराव कहलाते हैं, दूसरे दर्जे के जागीरदार ताज़ीमी और तीसरे दर्जे के जागीरदार ग़ैरताज़ीमी कहलाते हैं । इस राज्य में जागीरदारों को जो जागीरें आदि दी गई हैं, वे वंश- परंपरागत उनके उत्तराधिकारियों के अधिकार में रहती है । राजपूत जागीरदारों में से अधिकांश को भाईबंट में एवं कितनेक को उनकी अच्छी सेवाओं के उपलक्ष में तथा बाहर से आकर रहने पर निर्वाह के लिए