राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
सातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार राजपूताना के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश भूमि भी सरदारों में बंटी हुई है । उनके अतिरिक्त कुछ कर्मचारियों को भी राज्य की तरफ़ से जागीरें दी गई हैं । देवमंदिरों, ब्राह्मणों, चारणों और रावों को भी कई गांव और भूमि नरेशों की ओर से दी गई है, जिसकी गणना माफ़ी में होती है । राजपूत-सरदारों को जागीर के एवज़ में खुद और सवार तथा पैदलों से राज्य की सेवा करनी पड़ती है एवं उनसे कुछ रक़म "टांका" अर्थात् खिराज के नाम से ली जाती है । सरदारों की नौकरी का कोई समय और सवार-सिपाहियों की संख्या का यहां पर कोई क्रम नहीं है । जितने सवार-सिपाही राज्य से मांगे जावें, उनके साथ हाज़िर होकर जब तक उनको रुख़सत न दी जावे तब तक नौकरी देने के लिए वे प्रत्येक समय तैयार रहते हैं । राजपूत जागीरदारों के वहां तीन दर्जे हैं । पहले दर्जे के जागीरदार नगारबंद अर्थात् उमराव कहलाते हैं, दूसरे दर्जे के जागीरदार ताज़ीमी और तीसरे दर्जे के जागीरदार ग़ैरताज़ीमी कहलाते हैं । इस राज्य में जागीरदारों को जो जागीरें आदि दी गई हैं, वे वंश- परंपरागत उनके उत्तराधिकारियों के अधिकार में रहती है । राजपूत जागीरदारों में से अधिकांश को भाईबंट में एवं कितनेक को उनकी अच्छी सेवाओं के उपलक्ष में तथा बाहर से आकर रहने पर निर्वाह के लिए
जागीरें दी गई हैं। वहां के अधिकांश सरदार महारावत के सगोत्री सीसोदिया राजपूत हैं और दूसरे थोड़े। प्रथम वर्ग के सरदारों को ताज़ीम के अतिरिक्त नक़ारा, निशान और पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने आदि का सम्मान प्राप्त है। उनकी संख्या इस समय ११ है। उनमें महारावत के निकट संबंधियों में अरगोद का ठिकाना भी है। दूसरे दर्जे के जागीरदारों में कई पुराने और कुछ नये ठिकाने हैं। महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक उनमें बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। ठिकानेदार अपनी जागीर किसी को रेहन अथवा बै नहीं कर सकते और न अपनी जागीर का कोई भाग दूसरों को दान में दे सकते हैं। उत्तराधिकारी के अभाव में वे बिना राज्य की आज्ञा के दत्तक पुत्र नहीं रख सकते हैं। प्रथम वर्ग के सब सरदार सीसोदिया हैं। उनकी प्रतिष्ठा भाइयों के समान है एवं, उनको दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के सुनने का भी अधिकार दिया गया है। जब नवीन सरदार ठिकाने पर नियत होता है, तब राज्य में उससे तलवारबंदी का नज़राना लिया जाता है। इसके अतिरिक्त महारावत की गद्दीनशीनी, विवाह आदि के अवसरों पर भी सरदारों के नज़राना वग़ैरा दाख़िल करने का प्राचीन रिवाज है।
महारावत के निकट सम्बन्धी
अरगोद
अरगोद के स्वामी महारावत सालिमसिंह के छोटे पुत्र लालसिंह के वंशधर हैं¹। उनकी उपाधि “महाराज” है। लालसिंह का वि० सं० १८२४ ( ई० स० १७६७) में जन्म हुआ था। फिर महारावत सामन्तसिंह ने उस(लालसिंह)को अपने छोटे भाई के तरीक़े
( १ ) वंशक्रम—[ १ ] लालसिंह [ २ ] अर्जुनसिंह [ ३ ] खुशहालसिंह [ ४ ] रघुनाथसिंह और [ ५ ] गोवर्धनसिंह ।
३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अरणोद की जागीर दी। उसने अरणोद के पट्टे में अपने नाम पर लाल- पुरा गांव बसाकर वहां गढ़ बनवाया, जो लालगढ़ कहलाता है। वि० सं० १८८६ (ई० स० १८२६) में लालसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र अर्जुन- सिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसका जन्म वि० सं० १८७६ (ई० स० १८१६) में हुआ था। अर्जुनसिंह का वि० सं० १९११ (ई० स० १८५४) में देहांत हुआ। तब उसका पुत्र खुशहालसिंह वहां का महाराज हुआ, परंतु वह कुछ वर्ष ही जीवित रहा और वि० सं० १९१४ चैत्र वदि ११ (ई० स० १८५८ ता० ११ मार्च) को परलोक सिधारा। तदनंतर उसके स्थान पर उसका बालक पुत्र रघुनाथसिंह अरणोद का स्वामी बना। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में प्रतापगढ़ के स्वामी महा- रावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत होने पर अरणोद से महाराज रघु- नाथसिंह गोद जाकर प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठा। उस समय उसके दो कुंवर प्रतापसिंह और मानसिंह विद्यमान थे। रघुनाथसिंह के गद्दी बैठने पर प्रतापसिंह पाटवी राजकुमार माना गया और अरणोद की जागीर मानसिंह के नाम पर रखी गई। इसके थोड़े ही समय बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई। तब मानसिंह युवराज बनाया गया। वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि द्वितीय १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) को महारावत रघुनाथसिंह के छोटे कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर महारावत ने वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितंबर) को गोवर्धनसिंह को अरणोद की जागीर प्रदान की और उस (गोवर्धनसिंह) की उपाधि "महाराज" हुई। महाराज गोवर्धनसिंह ने अजमेर के मेयो कॉलेज में डिप्लोमा तक अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा प्राप्त की है। वह व्यवहार-कुशल व्यक्ति है। महारावत रघुनाथसिंह के समय उसको चंवर रखने का सम्मान प्राप्त हुआ। उस (गोवर्धनसिंह) के दो पुत्र—गोपालसिंह और भीमसिंह— हैं, जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
धमोतर ३६१ प्रथम वर्ग के सरदार धमोतर धमोतर के सरदार महारावत सूरजमल के छोटे पुत्र सैंसमल- (सहसमल) के वंशधर हैं१ और वे सिंहावत (सहसावत) कहलाते हैं। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। इस राज्य में इस ठिकाने की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है और आय में भी इस ठिकाने के बराबर दूसरा कोई ठिकाना नहीं है। ख्यातों में लिखा है कि सैंसमल उदयपुर के महाराणाओं की सेवा में रहता था, इसलिए वहां से उसको नींबाहेड़ा और खोडीप की जागीर मिली और वह महाराणा की तरफ़ से युद्ध करता हुआ काम आया। तदनंतर उसका पुत्र कांधल वहां का स्वामी हुआ, जो मेवाड़ छोड़- कर महारावत विक्रमसिंह (बीका) के साथ कांठल में गया और वहां उसका प्रभुत्व स्थिर करने में सदा उस (विक्रमसिंह) का साथी रहा। इसपर उसको वहां से धमोतर का पट्टा जागीर में मिला। बादशाह अकबर के समय आंबेर (जयपुर राज्य) के कछुवाहा कुंवर मानसिंह ने उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) पर चढ़ाई की, उस समय देव- लिया से महाराणा की सहायतार्थ जो सेना गई, उसमें ठाकुर कांधल भी था और वह हल्दीघाटी के युद्ध-क्षेत्र में शाही सेना से वीरतापूर्वक लड़कर काम आया। कांधल का पुत्र गोपालदास था, जो बांसवाड़ा के महारावल की सहायतार्थ किसी युद्ध में लड़कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। गोपालदास के ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] सैंसमल. [ २ ] कांधल [ ३ ] गोपालदास [ ४ ] जोधसिंह [ ५ ] जोगीदास [ ६ ] जसकरण [ ७ ] पृथ्वीराज (पृथ्वीसिंह) [ ८ ] फ़तहसिंह [ ६ ] कुबेरसिंह [ १० ] कल्याणसिंह [ ११ ] नाथूराम (नाथूसिंह) [ १२ ] हरीसिंह [ १३ ] मोहकमसिंह [ १४ ] रोड़सिंह [ १५ ] हमीरसिंह [ १६ ] केसरीसिंह [ १७ ] हिंदू सिंह और [ १८ ] दयालसिंह। ४६
३६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पुत्र जोधसिंह और पूरा¹ हुए । उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (प्रथम) के समय देवलिया के महारावत जसवन्तसिंह को कुंवर महासिंह-सहित उक्त महाराणा ने अपनी सेना भेज चंपा बाग में मरवा डाला और देवलिया पर भी सेना भेज अधिकार कर लिया। उस समय जोधसिंह महारावत जसवंतसिंह के दूसरे पुत्र हरिसिंह को लेकर बादशाह शाहजहां के दरबार में गया और महारावत का देवलिया आदि पर अधिकार कराने में प्रयत्न- शील रहा । फिर बादशाह ने सेना भेजकर महारावत हरिसिंह का देवलिया पर अधिकार करा दिया। जोधसिंह की वि० सं० १७०३ (ई० स० १६४६) में मृत्यु हुई² । तदनंतर उसका पुत्र जोगीदास धमोतर का स्वामी हुआ। उसने धमोतर में लक्ष्मीनारायण का मंदिर और गढ़ में महल आदि बनवाये । उसका छोटा भाई भोगीदास था, जिसने देवलिया में एक बावड़ी बनवाई, जो भोगीदास की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध है³ । जोगीदास का पुत्र जसकरण⁴ और पौत्र पृथ्वीराज हुआ । पृथ्वी- (१) पूरा के नाम से पूरावत शाखा चली। प्रतापगढ़ राज्य में इस समय पूरावतों का जाजली का ठिकाना प्रथम वर्ग में और बरखेड़ी द्वितीय वर्ग में है, जिनका उल्लेख आगे किया जायगा । (२) धमोतर में तालाब के किनारे ठाकुर जोधसिंह का स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७०३ शाके १५६८ मार्गशीर्ष सुदि २ (ई० स० १६४६ ता० २६ नवम्बर) को उसका देहान्त होने और उसके साथ उसकी राठोड़ पत्नी के सती होने का उल्लेख है । (३) कल्याण कवि-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य से ठाकुर जोगीदास का महारावत हरिसिंह का समकालीन होना प्रकट है। उक्त प्रशस्ति में उस- (जोगीदास) के छोटे भाई भोगीदास की धार्मिकता आदि का वर्णन है। देवलिया में भोगीदास की बनवाई हुई बावड़ी के समीप उसका स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर उस (भोगीदास) की वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ (ई० स० १६७९ ता० १६ जून) को मृत्यु होने का उल्लेख है । (४) ठाकुर जसकरण का भी उपर्युक्त "प्रताप-प्रशस्ति" में वर्णन है और उसमें उसको महारावत प्रतापसिंह का सामन्त बतलाते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है।
धमोतर ३६३
राज़ की वि० सं० १७७७ (ई० स० १७२०) में मृत्यु हुई । उसने वहां तालाब की पाल बनवाई । उसके पीछे फ़तहसिंह' और फिर उसका पुत्रं
धमोतर के ठाकुरों के दग्ध-स्थान में ठाकुर जसकरण की स्मारक छत्री बनी हुई है, जिसमें उसका वि० सं० १७७१ भाद्रपद सुदि १५ (ई० स० १७१४ ता० १२ सितम्बर) को देहान्त होने, उसके साथ उसकी पत्नी राठोड़ आसकुंवरी के सती होने और उस (जस- करण) के पुत्र पृथ्वीराज द्वारा ६२४१ रुपये लगाकर उस छत्री के बनवाये जाने का उल्लेख है ।
(१) ख्यातों में लिखा है कि कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का ज्येष्ठ पुत्र भगवतसिंह महारावत गोपालसिंह का बड़ा कृपापात्र था । उस (भगवतसिंह) ने धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह के विरुद्ध महारावत को बहकाया, जिससे धमोतरवालों से महारावत अप्रसन्न रहने लगा । इस बात का पता पाकर धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह ने भगवंतसिंह को मरवा डाला, जिससे महारावत की उसपर अधिक नाराज़गी हो गई । वि० सं० १७७६ (ई० स० १७२२) में धमोतर का ठाकुर फ़तहसिंह मर गया और उसके पीछे उसका पुत्र कुबेरसिंह वहां का स्वामी बना, जिससे उसके चाचा कल्याणसिंह ने धमोतर छीन लिया। परस्पर के द्वेष का यह अच्छा अवसर देख महारावत ने धमोतर के ठिकाने को राज्याधिकार में कर लिया । इसपर वहां के हक़दार होलकर की सेना को मददगार बनाकर चढ़ा लाये । महारावत की तरफ़ से भी मुक़ाबला हुआ और यह बखेड़ा चलता रहा। उन्हीं दिनों महारावत गोपालसिंह का देहान्त हो गया और उसका कुंवर सालिमसिंह सिंहासनारूढ़ हुआ। उस समय उपर्युक्त भगवतसिंह के छोटे भाई दौलतसिंह ने उस (सालिमसिंह) से निवेदन किया कि इस पारस्परिक संघर्ष में व्यर्थ ही शक्ति का ह्रास होगा, इसलिए होलकर की सेना को धमोतर से व्यय दिलाकर विदा कर दिया जावे और धमोतर पीछा वहांवालों को दे दिया जाय । महारावत द्वारा स्वीकृति मिलने पर दौलतसिंह दूसरे पक्ष और होलकर के सेनापति से मिला तथा बात तय हो जाने पर तीन लाख रुपये दिलवाकर उसने उक्त सेना को लौटा दिया । उस समय एक लाख रुपये तो धमोतरवालों ने नक़द दे दिये और दो लाख का रुक़ा लिखने पर राज्य ने दिये, जिसकी वसूली तक धमोतर पर महारावत का अधिकार रहा और जब सब रुपये वसूल हो गये तो उक्त ठिकाना वहांवालों को महारावत ने दे दिया। दौलतसिंह की इस सेवा के बदले में महारावत ने प्रसन्न होकर देवद की जागीर उसे प्रदान की, परन्तु भगवतसिंह को मरवा डालने का धमोतर और कल्याणपुरावालों के बीच वैर बना ही रहा, जिसकी सफ़ाई धमोतर के ठाकुर केसरीसिंह ने कल्याणपुरा के ठाकुर तख़्तसिंह से कर पुराना वैमनस्य मिटा दिया।
३६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कुवेरसिंह वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७३२ ) में धमोतर का स्वामी हुआ; किंतु कुवेरसिंह के हाथ से धमोतर निकल गया और वहां उसका पितृव्य कल्याणसिंह (फ़तहसिंह का छोटा भाई ) अधिकार कर बैठा, जिसकी वि० सं० १८०० ( ई० स० १७४३ ) में मृत्यु हुई। तदनंतर नाथूराम, हरिसिंह, मोहकमसिंह और रोड़सिंह क्रमशः धमोतर के ठाकुर हुए। रोड़सिंह का वि० सं० १६०५ ( ई० स० १८४८) में देहांत हुआ। उसके तीन पुत्र हमीरसिंह, गंभीरसिंह, और भवानीसिंह हुए। ठाकुर हमीरसिंह की बहिन गुलाबकुंवरी का विवाह अहमदनगर- ( ईडर राज्य ) के स्वामी महाराज तख्तसिंह के साथ हुआ था, जिसके उदर से जसवंतसिंह का जन्म हुआ। इस वैवाहिक सम्बन्ध के कारण तख्तसिंह ने महाराजा मानसिंह की मृत्यु हो जाने पर ( वि० सं० १६०० = ई० स० १८४३ में ) जोधपुर की गद्दी पर बैठने के बाद हमीरसिंह के छोटे भाई गंभीरसिंह को बुला लिया और जागीर में झालामंड का ठिकाना दिया । जोधपुर का स्वामी होने के पीछे भी वि० सं० १६०३ (ई० स० १८४६) में तख्तसिंह का एक विवाह ठाकुर हमीरसिंह के कुटुंबी लक्ष्मणसिंह१ की पुत्री उदयकुंवरी के साथ हुआ था। फिर तख्तसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके कुंवर जसवन्तसिंह ने जोधपुर राज्य का स्वामी होने पर अपने मामा हमीरसिंह को जोधपुर बुलाकर ताज़ीम, बांहपसाव, एक चंवर और पालकी- ( पीनस ) में बैठने की प्रतिष्ठा देकर अपने दाहिने पार्श्व में बैठने का सम्मान दिया । हमीरसिंह निःसंतान था, इसलिए उसके छोटे भाई गंभीरसिंह का पुत्र केसरीसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ । केसरीसिंह के दो पुत्र हिंदूसिंह और पृथ्वीसिंह हुए, जिनमें से हिंदूसिंह वि० सं० १६५० ( १ ) लक्ष्मणसिंह धमोतर के ठाकुर हरिसिंह के छोटे पुत्र वीरमदेव का बेटा था। उस (लक्ष्मणसिंह) की पौत्री और दलेलसिंह की पुत्री प्रतापकुंवरी का विवाह जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह के पुत्र बहादुरसिंह के साथ वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) में हुआ था। इस प्रसङ्ग से महाराजा जसवन्तसिंह ने वि० सं० १६३३ (ई० स० १८७६) में उसको भी पैर में स्वर्णाभूषण पहिनने की प्रतिष्ठा दी थी।
कोई OCR पाठ नहीं।
३६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हुआ, जो महारावत प्रतापसिंह का समकालीन था । उसका पुत्र केसरीसिंह पिता की विद्यमानता में ही मर गया, इसलिए केसरीसिंह का पुत्र फ़तहसिंह अपने दादा (रणछोड़दास) का उत्तराधिकारी हुआ । फिर उसका पौत्र हरिसिंह (भगवंतसिंह का पुत्र) कल्याणपुरा का ठाकुर हुआ । हरिसिंह के चिमनसिंह तथा पहाड़सिंह नामक दो पुत्र थे, जो क्रमशः कल्याणपुरा के स्वामी हुए । पहाड़सिंह का पुत्र लालसिंह और उस- (लालसिंह) का तख़्तसिंह हुआ । तत्पश्चात् देवीसिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसकी वि० सं० १६८१ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १६२५ ता० १८ अप्रेल) को मृत्यु होने पर उसका पुत्र संग्रामसिंह कल्याणपुरा का स्वामी हुआ, जो वहां का वर्तमान ठाकुर है । आंवीरामा आंवीरामा के ठाकुर, महारावत बाघसिंह के छोटे पुत्र ख़ान के वंशधर हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है । ख़ान का पुत्र दुर्गादास और उस (दुर्गादास) का सबलसिंह हुआ, जिसको महारावत सिंहा के समय आंवीरामा जागीर में दिया गया । सबलसिंह का पुत्र गोपीनाथ हुआ, जिसके पीछे चंद्रसिंह, पृथ्वीसिंह, खुम्माणसिंह एवं अखैराज क्रमशः आंवीरामा के स्वामी हुए । अखैराज का पुत्र कुशलसिंह हुआ, जिसका पुत्र केसरीसिंह पिता की विद्यमानता में महारावत उदयसिंह के समय बोरी-राँछड़ी के सीमा-संबंधी झगड़े में बांसवाड़ा राज्य की तरफ़ से आक्रमण होने पर लड़कर मारा गया । तब उस (केसरीसिंह) का पुत्र विभूतिसिंह अपने दादा का उत्तराधिकारी हुआ । विभूतिसिंह का पुत्र शंभुसिंह आंवीरामा का वर्तमान सरदार है । ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] ख़ान [ २ ] दुर्गादास [ ३ ] सबलसिंह [ ४ ] गोपी- नाथ [ ५ ] चन्द्रसिंह [ ६ ] पृथ्वीसिंह [ ७ ] खुम्माणसिंह [ ८ ] अखैराज [ ६ ] कुशलसिंह [ १० ] विभूतिसिंह और [ ११ ] शंभुसिंह ।
रायपुर ३६७
रायपुर रायपुर के सरदार महारावत विक्रमसिंह के पुत्र सुर्जनदास के बेटे रामदास के वंशधर हैं¹ और उनकी उपाधि “ठाकुर” है। वहां के सरदार को महारावत के दरबार में बांई ओर की प्रथम बैठक तथा ताज़ीम आदि का सम्मान प्राप्त है। रामदास² ने वि० सं० १६६५ (ई० स० १६०८) के लगभग महा- रावत सिंह के राज्यकाल में नीनोर-बोरदिया के निवासी जलखेड़िया राठोड़ों को परास्तकर रायपुर बसाया। रामदास का पुत्र द्वारिकादास वि० सं० १६६२ (ई० स० १६३५) में अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। उसके छोटे भाई मानसिंह ने मानपुरा और कानसिंह ने कानगढ़ बसाया, जो अब तक उनके वंशजों के अधिकार में है। द्वारिकादास का पुत्र दलपतसिंह³ और इस(दलपतसिंह) का पौत्र गोपालसिंह था, जिसने बोरी-राँछड़ी पर अधिकार किया। उसका पुत्र गुमानसिंह रायपुर का ठाकुर बना, जिसको देवलिया के राज-महलों में पूरावत अक्षयसिंह और हरिसिंह ने मारकर रायपुर पर वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) के लगभग अपना अधिकार कर लिया। फिर गुमानसिंह के पुत्र दलसिंह ने वि० सं० १८४१ (ई० स० १७८४) के (१) वंशक्रम—[ १ ] सुर्जनदास [ २ ] रामदास [ ३ ] द्वारिकादास [ ४ ] दलपतसिंह [ ५ ] नगसिंह [ ६ ] गोपालसिंह [ ७ ] रत्नसिंह [ ८ ] गुमानसिंह [ ६ ] दलसिंह [ १० ] केसरीसिंह [ ११ ] हिंदू सिंह [ १२ ] रत्नसिंह (दूसरा) और [ १३ ] प्रतापसिंह। (२) रामदास के समय का एक ताम्रपत्र वि० सं० १६८५ माघ सुदि ५ (ई० स० १६२६ ता० १६ जनवरी) सोमवार का मिला है, जिसमें उसकी उपाधि “महाराज” लिखी है एवं उसके पुत्र का नाम कुंवर द्वारिकादास देकर देराश्री जगन्नाथ -शुक्ल को पचास बीघा ज़मीन रायपुर में पुण्य देने का उल्लेख है। (३) "प्रतापप्रशस्ति" खंडित काव्य में कवि कल्याण ने दलपतसिंह का भी उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट है कि वह महारावत प्रतापसिंह का समकालीन था।
३६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लगभग महारावत सामन्तसिंह की आज्ञा से पूरावतों को वहां से निकालकर रायपुर पर पीछा अपना क़ब्ज़ा स्थिर किया। दलसिंह की वि० सं० १८८८ (ई० स० १८३१) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र केसरीसिंह रायपुर का स्वामी हुआ, पर उसके कोई संतान नहीं हुई, अतएव उसके लघु भ्राता रघु- नाथसिंह का पुत्र हिंदूंसिंह, केसरीसिंह के दत्तक गया। उस (हिंदूंसिंह)- का पुत्र रत्नसिंह (दूसरा) हुआ, किंतु उसके भी संतति न थी, इसलिए उसने उपर्युक्त गुमानसिंह के भाई (बदनसिंह) के वंशधर दुलहसिंह- (पहाड़सिंह का पुत्र) को वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०६) में गोद लिया, जिसको महारावत ने स्वीकार नहीं किया। वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में रत्नसिंह का देहांत होने पर रायपुर ठिकाना राज्याधिकार में ले लिया गया, परन्तु फिर महारावत रघुनाथसिंह ने अपनी विशेष कृपा प्रदर्शित करते हुए इस ठिकाने को बनाये रखना स्थिर किया और दुलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को रायपुर का ठाकुर बनाकर नज़राने के २५००१ रुपये वसूल होने तथा वार्षिक खिराज में ५०० रुपये की वृद्धि करने की आज्ञा दी। वह ३२७५ रुपये वार्षिक खिराज राज्य को देता है। झांतला झांतला के ठाकुर, महारावत जसवंतसिंह के पुत्र केसरीसिंह के वंशज हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। महारावत हरिसिंह ने केसरीसिंह को निर्वाह के लिए झांतला की जागीर दी थी। केसरीसिंह के चतुर्थ वंशधर अमानसिंह का पुत्र चिमनसिंह और पौत्र दलेलसिंह था। दलेलसिंह के पीछे उसका पुत्र अजीतसिंह हुआ। वह निःसंतान था, इसलिए महारावत हरिसिंह के (१) वंशक्रम-- [१] केसरीसिंह [२] कुशालसिंह [३] बख़्तसिंह [४] सूरतसिंह [५] अमानसिंह [६] चिमनसिंह [७] दलेलसिंह [८] अजीतसिंह [६] प्रतापसिंह [१०] बाजसिंह [११] तख़्तसिंह और [१२] उम्मेदसिंह।
छोटे पुत्र अमरसिंह के वंशधर वैरीशाल बगड़ावदवाले के पुत्र बुधसिंह को उसने अपना दत्तक बनाया, परंतु उसकी मृत्यु के बाद उसकी गर्भवती स्त्री से उसके पुत्र प्रतापसिंह का जन्म हो गया, जिससे बुधसिंह भांतला के ठिकाने से वंचित रहा और प्रतापसिंह का वहां अधिकार हुआ। प्रतापसिंह का पुत्र लालसिंह, रतलाम इलाक़े के अमरेठा के महाराज सामंतसिंह के हाथ की गोली लगने से मारा गया। तब उस (लालसिंह)- का पुत्र तख़्तसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसकी वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०६) में मृत्यु होने पर उसका पौत्र उम्मेदसिंह (पर्वतसिंह का पुत्र) भांतला ठिकाने का स्वामी हुआ, जो वहां का वर्तमान सरदार है। उसने मेयो कॉलेज, अजमेर में शिक्षा प्राप्त की है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है।
सालिमगढ़
सालिमगढ़ के सरदार महारावत हरिसिंह के छोटे पुत्र मोहकमसिंह के वंशधर हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। मोहकमसिंह को प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से जागीर मिली, जिसमें उसके पुत्र मोहनसिंह ने अपने नाम से मोहनगढ़ गांव बसाकर वहां अपन ठिकाना नियत किया, जो सालिमगढ़ के पास एक वीरान गांव है। कई वर्ष तक इस ठिकाने का मुख्य स्थान मोहनगढ़ रहा। मोहनसिंह का पुत्र जोरावरसिंह और पौत्र हिम्मतसिंह हुआ, जिसके दो बेटे उदयसिंह और सरदारसिंह थे, परंतु वे पिता की विद्यमानता में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। अतएव मोहकमसिंह के भाई अमरसिंह के वंशधर, बड़ी-साखथली के ठाकुर दलसिंह का पुत्र मोहबतसिंह गोद जाकर सालिमगढ़ का स्वामी हुआ किन्तु उसके भी संतान नहीं हुई, इसलिए उसने अपने चचेरे
(१) वंशक्रम—[१] मोहकमसिंह [२] मोहनसिंह [३] जोरावरसिंह [४] हिम्मतसिंह [५] मोहबतसिंह [६] सरदारसिंह [७] शिवसिंह [८] खुशहालसिंह और [९] हिंदू सिंह। ४७
३७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
भाई सरदारसिंह ( बगड़ावद के ठाकुर वैरीशाल के पुत्र ) को अपना
उत्तराधिकारी बनाया । सरदारसिंह का पुत्र शिवसिंह और, उसका
खुशहालसिंह हुआ । खुशहालसिंह भी निःसंतान था, इसलिए अमरसिंह
के चतुर्थ वंशधर दुलहसिंह के प्रपौत्र कीर्तिसिंह का पुत्र। हिन्दू सिंह गोद
जाकर सालिमगढ़ का अधिकारी हुआ, जो वहां का वर्तमान सरदार है।
अचलावदा
महारावत हरिसिंह के छोटे पुत्र माधवसिंह को प्रतापगढ़ राज्य
की तरफ़ से अचलावदा की जागीर मिली । उस ( माधवसिंह ) के वंशज१
अचलावदा के स्वामी हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है।
माधवसिंह के बेटे जगतसिंह के तीन पुत्र जोधसिंह, ज़ालिमसिंह
और दौलतसिंह हुए । जोधसिंह और ज़ालिमसिंह का वंश न चला और
वे पिता की जीवितावस्था में मर गये, इसलिए उनका छोटा भाई दौलत-
'सिंह अपने पिता का क्रमानुयायी हुआ । तदनंतर चिमनसिंह, लक्ष्मणसिंह,
भीमसिंह, रत्नसिंह और माधवसिंह (दूसरा) क्रमशः वहां के स्वामी
हुए। माधवसिंह के दो पुत्र - भवानीसिंह और गोपालसिंह हुए- जिनमें
से भवानीसिंह अपने पिता का अधिकारी हुआ और वहां का वर्तमान
सरदार है।
वरडिया
वरडिया के सरदार मेवाड़ के सुप्रसिद्ध रावत चूंडा के वंशधर हैं²।
उनकी उपाधि "ठाकुर" है।
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( १ ) वंशक्रम - [ १ ] माधवसिंह [ २ ] जगतसिंह [ ३ ] दौलतसिंह [ ४ ]
चिमनसिंह [ ५ ] लक्ष्मणसिंह [ ६ ] भीमसिंह [ ७ ] रत्नसिंह [ ८ ] माधवसिंह
(दूसरा) और [ ६ ] भवानीसिंह ।
( २ ) वंशक्रम - [ १ ] मनोहरदास [ २ ] लालसिंह [ ३ ] अजबसिंह [ ४ ]
कुशालसिंह [ ५ ] सामंतसिंह [ ६ ] जगतसिंह [ ७ ] मोहकमसिंह [ ८ ] चिमनसिंह
बरडिया ३७१ सलूंबर (मेवाड़) के स्वामी रावत किशनदास का छोटा पुत्र भामा था, जिसको उदयपुर राज्य की तरफ़ से खोड़ीप की जागीर मिली थी । भामा का पुत्र मनोहरदास था, जिसको देवलिया के स्वामी महारावत प्रतापसिंह ने सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर दी । मनोहरदास का पुत्र लालसिंह हुआ । लालसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अजबसिंह हुआ । उसका पुत्र शिवसिंह पिता की विद्यमानता में गुज़र गया, इसलिए शिवसिंह का पुत्र कुशलसिंह, अजबसिंह के पीछे बरडिया का स्वामी बना । तदनन्तर सामंतसिंह, जगतसिंह, मोहकमसिंह, चिमनसिंह और लालसिंह (दूसरा) क्रमशः वरडिया के ठाकुर हुए । लालसिंह (दूसरा) की वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र सामंतसिंह (दूसरा) वरडिया का स्वामी हुआ, परंतु उसके संतान न थी, अतएव उसने अपने भतीजे दौलतसिंह को, जो [६] लालसिंह (दूसरा) [१०] सामंतसिंह (दूसरा) और (११) दौलतसिंह । राजपूताना और अजमेर की लिस्ट ऑव् रूलिंग प्रिंसेज़, चीफ्स ऐंड लीडिंग परसो- नेजिज़ (ई० स० १६३१ का संस्करण) में तथा अन्य कुछ स्थलों पर महारावत विक्रमसिंह- (बीका) के छोटे पुत्र किशनदास के बेटे जेठसिंह का मेवाड़ के सलूंबर के स्वामी की गोद जाना और इस प्रसङ्ग से किशनदास के अन्य पुत्रों का भी सलूंबर में जाकर रहना तथा जेठसिंह के भाई जामा (भामा) के पुत्र मनोहरदास को महारावत प्रतापसिंह का सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर देने का उल्लेख है, जो विश्वसनीय नहीं है । "वीरविनोद" आदि में इस ठिकाने के सरदार को स्पष्ट शब्दों में चूंडावत लिखा है, जिसका अर्थ चूंड़ा का वंशधर होता है । सलूंबर ठिकाने की ख्यात में बरडिया के सरदार का मूलपुरुष भामा दिया है और उसको सलूंबर के रावत कृष्णदास का आठवां पुत्र बतलाया है तथा सेलारपुरे का ठिकाना वरडियावालों की छोटी शाखा में होना लिखा है। बरडियावालों का जो ऐतिहासिक हाल प्रतापगढ़ राज्य के द्वारा हमें प्राप्त हुआ उसमें भी सलूंबर के रावत कृष्णदास के छोटे पुत्र भामा को उसका मूलपुरुष लिखा है। उपर्युक्त पुस्तकों का यह कथन कि प्रतापगढ़ के स्वामी विक्रमसिंह (बीका) के बेटे किशनदास का पुत्र जेठसिंह (जेतसिंह) सलूंबर गोद गया, संभव नहीं हो सकता; क्योंकि रावत चूंड़ा के वंशधरों में कई व्यक्ति मौजूद होते हुए जैतसिंह का दूर की शाखा देवलिया के राजवंश से गोद जाना विपरीत बात है ।
३७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास फ़ौजसिंह का पुत्र था, गोद लिया । वि० सं० १६७० ( ई० स० १६१३) में सामंतसिंह का देहांत होने पर दौलतसिंह घरडिया का सरदार बना, जो वहां का वर्तमान ठाकुर है। उसके दो पुत्र भगवतसिंह और प्रह्लादसिंह हैं। बोड़ी-साखथली बोड़ी-साखथली के सरदार महारावत बाघसिंह के पुत्र खान के वंशधर हैं¹ और उनकी उपाधि "ठाकुर" है । खान का पुत्र दुर्गादास अपने बेटों सहित महारावत भानुसिंह के साथ जीरण में मारा गया । फिर महारावत सिंहा ने दुर्गादास के पौत्र रणछोड़दास को बोड़ी-साखथली की जागीर प्रदान की । रणछोड़दास के पीछे अजबसिंह, गोपालसिंह, किशनसिंह और हरिसिंह क्रमशः वहां के ठाकुर हुए। हरिसिंह का पुत्र रतनसिंह तथा पौत्र छत्रसाल (शत्रुसाल) था। छत्रसाल के निःसंतान होने से ठिकाना राज्याधिकार में चला गया, परन्तु महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६४८( ई० स० १८६१) में उस- (छत्रसाल) के चाचा सूरजमल के पुत्र बलवंतसिंह (जो वहां का वर्तमान सरदार है) को प्रदानकर उसको वहां का सरदार बनाया । फिर उसने उसको प्रथम वर्ग के सरदारों में दाख़िल किया एवं वि० सं० १६७७ वैशाख वदि १४ ( ई० स० १६२० ता० १७ अप्रेल) को उसे दीवानी तथा फ़ौजदारी के मुक़दमे करने के अधिकार भी दे दिये। उसके पांच पुत्र—भैरवसिंह, बहादुरसिंह, नाहरसिंह, शेरसिंह और पर्वतसिंह—हैं। जाजली इस ठिकाने के स्वामी महारावत सूरजमल के छोटे पुत्र सहसमल के पौत्र गोपालदास (धमोतर का स्वामी) के छोटे पुत्र पूरा के वंशधर (१) वंशक्रम - [ १ ] खान [ २ ] दुर्गादास [ ३ ] ईश्वरदास [ ४ ] रणछोड़दास [ ५ ] अजबसिंह [ ६ ] गोपालसिंह [ ७ ] किशनसिंह [ ८ ] हरिसिंह [ ६ ] रतनसिंह [ १० ] छत्रसाल और [ ११ ] बलवंतसिंह ।
अनघोरा ३७३
हैं' और पूरा के नाम से उसकी सन्तान पूरावत कहलाती है। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। पूरा का पुत्र सुंदर और उसका बाघसिंह हुआ, जिसको देवलिया राज्य की तरफ़ से बिलेसरी की जागीर मिली। बाघसिंह का बेटा अजबसिंह और उसका माधवसिंह हुआ। उस (माधवसिंह) के दो पुत्र जोरावरसिंह और जगतसिंह हुए। उनमें से जोरावरसिंह का बिलेसरी पर स्वत्व रहा और जगतसिंह को जाजली की नवीन जागीर दी गई। जगतसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र तेजसिंह हुआ। उसके पीछे गुलाबसिंह, भैरवसिंह और बलवन्तसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। बलवन्तसिंह का पुत्र रघुनाथसिंह वहां का वर्तमान ठाकुर है। उसने अजमेर के मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में उस (रघुनाथसिंह)- को प्रथम वर्ग के सरदारों में दाख़िल किया है।
द्वितीय वर्ग के सरदार
अनघोरा
अनघोरा के महाराज जोधा राठोड़ हैं। किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह के छोटे पुत्र बाघसिंह को फ़तहगढ़ की जागीर मिली। बाघसिंह के चार बेटे थे। उनमें से दूसरे बलदेवसिंह को भाई-बंट में ढोस गांव और सदापुरा की भोम मिली। बलदेवसिंह के छोटे भाई किशोरसिंह के, जो जोरावरपुरे का स्वामी था, निःसंतान मर जाने पर झगड़ा खड़ा हो गया। बलदेवसिंह के बड़े भाई चांदसिंह ने किशोरसिंह के ठिकाने पर अपने छोटे बेटे गोपालसिंह को नियत कर दिया। इसपर बलदेवसिंह और उसके तीसरे भाई भीमसिंह (जो
( १ ) वंशक्रम—[ १ ] पूरा [ २ ] सुन्दर [ ३ ] बाघसिंह [ ४ ] अजबसिंह [ ५ ] माधवसिंह, [ ६ ] जगतसिंह [ ७ ] तेजसिंह [ ८ ] गुलाबसिंह [ ६ ] भैरवसिंह [ १० ] बलवन्तसिंह और [ ११ ] रघुनाथसिंह।
३७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास . कछोशिया का महाराज था ) ने फ़साद किया । अंत में कोटा के दीवान झाला ज़ालिमसिंह (झालावाड़ राज्य का संस्थापक) ने उनके इस झगड़े को मिटाकर उन दोनों को कोटे में बुला लिया और वहां जागीर दिलवाई, किन्तु बलदेवसिंह ने अपना आचरण ठीक न रखा, इसलिए वह जागीर जाती रही । बलदेवसिंह का पुत्र भौमसिंह¹ था। वह अपनी रिश्तेदारी के सबब प्रतापगढ़ राज्य में चला गया । जहां अनघोरा और रोजवानी नामक दो गांव उसको जागीर में मिले । महारावत दलपतसिंह फ़तहगढ़वालों का भानजा था, इस कारण उसने भौमसिंह की जागीर में और भी वृद्धि की तथा उसे वि० सं० १६१२ श्रावण सुदि ७ (ई० स० १८५५ ता० २० अगस्त) को नानणा तथा खड़ियाखेड़ी नामक दो गांव और वि० सं० १६१६ ज्येष्ठ वदि ११ (ई० स० १८६२ ता० २४ मई) को कंथार गांव जागीर में दिये । भौमसिंह के हिम्मतसिंह, ज़ालिमसिंह और धनपतसिंह नामक तीन पुत्र हुए । उनमें से ज़ालिमसिंह को हिम्मतसिंह ने मार डाला, जिससे वह (हिम्मतसिंह) अपने पिता की संपत्ति से वंचित रहा और धनपतिसिंह पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ । तदनन्तर तेजसिंह और मोहनसिंह ढोस और अनघोरा के स्वामी हुए । मोहनसिंह का पुत्र प्रतापसिंह, वहां का वर्तमान सरदार है । वरखेड़ी धमोतर के ठाकुर गोपालदास का सब से छोटा पुत्र पूरा था । पूरा के पांचवे वंशधर अक्षयसिंह² को महारावत सालिमसिंह ने वि० सं० १८२१ (ई० स० १७६४) के लगभग मंडावरा गांव जागीर में दिया था । ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] भौमसिंह [ २ ] धनपतिसिंह [ ३ ] तेजसिंह [ ४ ] मोहनसिंह और [ ५ ] प्रतापसिंह । ( २ ) वंशक्रम—[ १ ] अक्षयसिंह [ २ ] हरिसिंह [ ३ ] संग्रामसिंह [ ४ ] रत्नसिंह [ ५ ] भवानीसिंह [ ६ ] लालसिंह और [ ७ ] तेजसिंह ।
बरखेड़ी ३७५ अक्षयसिंह ने वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) में रायपुर के ठाकुर गुमानसिंह को देवलिया के राजमहलों में मार डाला और रायपुर पर अधिकार कर लिया। वि० सं० १८५१ (ई० स० १७९४) में वह (अक्षयसिंह) अपने पुत्र हरिसिंह के साथ दशहरे के अवसर पर देवलिया में नौकरी के लिए गया उस समय महारावत की हस्तिशाला का एक हाथी मदमत्त होकर सरदारों के ढेरों की तरफ़ गया। इसपर अक्षयसिंह ने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई, जिससे वह हाथी मर गया। इस घटना से महारावत सामन्तसिंह उस (अक्षयसिंह) से अप्रसन्न हो गया। वह अवसर उपयुक्त देख रायपुर के ठाकुर दलसिंह ने अपने पिता गुमानसिंह का बदला लेने की भावना से प्रेरित होकर महारावत की आज्ञा से रायपुर पर चढ़ाई कर पूरावतों का संहार किया और वहां पीछा अपना अधिकार स्थिर किया। उस समय हरिसिंह का पुत्र संग्रामसिंह गुप्त रूप से वहां से निकाल दिया गया था, जो बच गया। फिर संग्रामसिंह देवलिया राज्य से निकलकर वागड़ में जा रहा। तदनन्तर वह वहां से अपने बहनोई, मूल- थान (मालवा) के स्वामी महाराज सवाईसिंह के पास चला गया। कुछ वर्ष पीछे सवाईसिंह की मृत्यु होने पर उस (सवाईसिंह) का पुत्र दलपत- सिंह मूलथान का स्वामी हुआ, जिसकी आयु कम होने से सारा काम संग्रामसिंह चलाता था। उन दिनों सीमा-सम्बन्धी झगड़े के कारण बखत- गढ़ (मालवा) के कामदार भूराखां ने पांचसौ आदमियों की भीड़-भाड़ लेकर मूलथान पर चढ़ाई कर दी, उस समय संग्रामसिंह ने वीरतापूर्वक बखतगढ़वालों का मुक़ाबला कर भूराखां का सिर काट लिया, जिसपर मूलथान के स्वामी दलपतसिंह ने संग्रामसिंह को संदला जागीर में प्रदान किया। संग्रामसिंह के पुत्र रतनसिंह¹ को महारावत रघुनाथसिंह ने (१) ठाकुर रतनसिंह के छोटे भाई हिम्मतसिंह और प्रतापसिंह थे। हिम्मत- सिंह का पुत्र प्रह्लादसिंह और पौत्र मोतीसिंह हुआ, जिसकी निःसन्तान मृत्यु हुई। प्रतापसिंह का पुत्र तख़्तसिंह और चार पौत्र खुशहालसिंह, सालिमसिंह, मदनसिंह और गोवर्धनसिंह हुए। उनमें से मदनसिंह का जन्म वि० सं० १९५६ फाल्गुन वदि ७
३७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० १९४८ (ई० स० १८६१) में वरखेड़ी गांव जागीर में प्रदानकर ताज़ीम का सम्मान दिया। रत्नसिंह के पीछे भवानीसिंह और लालसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। लालसिंह का पुत्र तेजसिंह वहां का वर्तमान सरदार है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है। नागदी महारावत सिंहा का छोटा पुत्र जगन्नाथसिंह¹ था, जिसको प्रतापगढ़ के महारावत की तरफ़ से खरखड़ा, मोवाई, देघाला, नागदी और मोहेड़ा नामक पांच गांव जागीर में मिले थे। जगन्नाथसिंह का पुत्र जोगीदास था, जिसने खरखड़े में एक छोटा मन्दिर और तालाब बनवाया। (ई० स० १९०० ता० २१ फ़रवरी) को हुआ। बाल्यकाल से ही प्रतिभाशाली होने से सरस्वती की मदनसिंह पर कृपा हुई और वह अंग्रेज़ी भाषा की परीक्षाओं में सम्मान- पूर्वक उत्तीर्ण होता रहा। वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी की एम० ए०, तथा एल-एल० बी० की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। उसकी पढ़ाई का संपूर्ण व्यय महारावत रघुनाथसिंह ने दिया। मदनसिंह की योग्यता और कार्य-कुशलता का परिचय- पाकर मेयो कालेज अजमेर के अधिकारियों ने उसको उच्च ग्रेड में अपने यहां के कालेज में सीनियर अध्यापक नियत किया। चरित्रवान और अनुभवी होने के कारण वह भिणाय (अजमेर) के बालक राजा कल्याणसिंह का अभिभावक (गार्डियन) भी बनाया गया। फलतः उपर्युक्त भिणाय के स्वामी की शिक्षा-दीक्षा सब उसकी देख-रेख में हुई। ई० स० १९३४ (वि० सं० १९६१) में राजा कल्याणसिंह की मेयो कालेज की शिक्षा समाप्त होने पर ठाकुर मदनसिंह इस दायित्व से मुक्त हुआ। तदनन्तर उसको जयपुर के वर्तमान महाराजा साहब ने मेयो कालेज, अजमेर से (जुलाई ई० स० १९४० में) मांगकर अपने यहां के "मान नोबुल्स स्कूल" का प्रिंसिपल नियत किया है। प्रतापगढ़ राज्य के राजपूत सरदारों में उपर्युक्त मदनसिंह का शिक्षा के लिए विशिष्ट स्थान है और वही पहला व्यक्ति है, जिसने सम्मान के साथ विश्वविद्यालय की उच्च परीक्षाएं पास की हैं। वह गंभीर और विनयशील पुरुष है। (१) वंशक्रम—[१] जगन्नाथसिंह [२] जोगीदास [३] नाथूसिंह [४] गुमानसिंह [५] तख़्तसिंह [६] तेजसिंह [७] जोरावरसिंह [८] भैरवसिंह [९] बख़्रावरसिंह और [१०] सरदारसिंह।
देवद ३७७
जोगीदास के पुत्र नाथूसिंह के समय उसकी जागीर के गांव खालसा हो गये। उनमें से नागदी गांव उस (नाथूसिंह) के छोटे भाई देवकर्ण के पौत्र गुमानसिंह को वापस मिला। तदनन्तर तख़्तसिंह, तेजसिंह, जोरावरसिंह और भैरवसिंह क्रमशः नागदी के स्वामी हुए। भैरवसिंह के पुत्र बख़्तावरसिंह को महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान प्रदान किया। बख़्तावरसिंह का पुत्र सरदारसिंह वहां का वर्तमान सरदार है।
देवद
कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का छोटा पुत्र दौलतसिंह महारावत सालिमसिंह की सेवा में रहता था। उसको वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में उक्त महारावत ने देवद गांव जागीर में प्रदान किया। प्रतापगढ़ के महाजनों तथा व्यापारियों के अप्रसन्न होकर मंदसोर चले जाने पर दौलतसिंह का तृतीय वंशधर खुम्माणसिंह उनको महारावत सामंतसिंह की आज्ञानुसार समझाकर पुनः प्रतापगढ़ ला रहा था। उस समय मार्ग में राजपुरिया गांव के पास मंदसोर के सूबेदार से झगड़ा हुआ, जिसमें वह मारा गया। महारावत दलपतसिंह ने खुम्माणसिंह के पौत्र शत्रुसाल (छत्रसाल) के छोटे पुत्र रणजीतसिंह को गांव आंबावा का खेड़ा जागीर में प्रदान किया था; परंतु रणजीतसिंह निःसंतान मर गया, जिससे वह गांव ज़ब्त हो गया। फिर महारावत उदयसिंह ने उक्त गांव रणजीतसिंह के छोटे भाई बलवन्तसिंह को प्रदान किया। बलवन्तसिंह का पुत्र भीमसिंह हुआ, जिसे महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान दिया। उसका पुत्र भारतसिंह वहां का वर्तमान सरदार है, जो अभी नाबालिग़ है।
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