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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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धमोतर ३६३

राज़ की वि० सं० १७७७ (ई० स० १७२०) में मृत्यु हुई । उसने वहां तालाब की पाल बनवाई । उसके पीछे फ़तहसिंह' और फिर उसका पुत्रं

धमोतर के ठाकुरों के दग्ध-स्थान में ठाकुर जसकरण की स्मारक छत्री बनी हुई है, जिसमें उसका वि० सं० १७७१ भाद्रपद सुदि १५ (ई० स० १७१४ ता० १२ सितम्बर) को देहान्त होने, उसके साथ उसकी पत्नी राठोड़ आसकुंवरी के सती होने और उस (जस- करण) के पुत्र पृथ्वीराज द्वारा ६२४१ रुपये लगाकर उस छत्री के बनवाये जाने का उल्लेख है ।

(१) ख्यातों में लिखा है कि कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का ज्येष्ठ पुत्र भगवतसिंह महारावत गोपालसिंह का बड़ा कृपापात्र था । उस (भगवतसिंह) ने धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह के विरुद्ध महारावत को बहकाया, जिससे धमोतरवालों से महारावत अप्रसन्न रहने लगा । इस बात का पता पाकर धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह ने भगवंतसिंह को मरवा डाला, जिससे महारावत की उसपर अधिक नाराज़गी हो गई । वि० सं० १७७६ (ई० स० १७२२) में धमोतर का ठाकुर फ़तहसिंह मर गया और उसके पीछे उसका पुत्र कुबेरसिंह वहां का स्वामी बना, जिससे उसके चाचा कल्याणसिंह ने धमोतर छीन लिया। परस्पर के द्वेष का यह अच्छा अवसर देख महारावत ने धमोतर के ठिकाने को राज्याधिकार में कर लिया । इसपर वहां के हक़दार होलकर की सेना को मददगार बनाकर चढ़ा लाये । महारावत की तरफ़ से भी मुक़ाबला हुआ और यह बखेड़ा चलता रहा। उन्हीं दिनों महारावत गोपालसिंह का देहान्त हो गया और उसका कुंवर सालिमसिंह सिंहासनारूढ़ हुआ। उस समय उपर्युक्त भगवतसिंह के छोटे भाई दौलतसिंह ने उस (सालिमसिंह) से निवेदन किया कि इस पारस्परिक संघर्ष में व्यर्थ ही शक्ति का ह्रास होगा, इसलिए होलकर की सेना को धमोतर से व्यय दिलाकर विदा कर दिया जावे और धमोतर पीछा वहांवालों को दे दिया जाय । महारावत द्वारा स्वीकृति मिलने पर दौलतसिंह दूसरे पक्ष और होलकर के सेनापति से मिला तथा बात तय हो जाने पर तीन लाख रुपये दिलवाकर उसने उक्त सेना को लौटा दिया । उस समय एक लाख रुपये तो धमोतरवालों ने नक़द दे दिये और दो लाख का रुक़ा लिखने पर राज्य ने दिये, जिसकी वसूली तक धमोतर पर महारावत का अधिकार रहा और जब सब रुपये वसूल हो गये तो उक्त ठिकाना वहांवालों को महारावत ने दे दिया। दौलतसिंह की इस सेवा के बदले में महारावत ने प्रसन्न होकर देवद की जागीर उसे प्रदान की, परन्तु भगवतसिंह को मरवा डालने का धमोतर और कल्याणपुरावालों के बीच वैर बना ही रहा, जिसकी सफ़ाई धमोतर के ठाकुर केसरीसिंह ने कल्याणपुरा के ठाकुर तख़्तसिंह से कर पुराना वैमनस्य मिटा दिया।